लेख
28-Apr-2026
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भारत में इस समय संविधान, कानूनों और नियमों का उपयोग गैर कानूनी एवं अनैतिक तरीके से हो रहा है। संविधान, नियम और कानून का पालन कराने वाले जो लोग कुर्सियों पर विराजमान हैं, वह इन कानूनो का दुरुपयोग करने वालों का संरक्षण कर रहे हैं। जिसके कारण नियम और कानूनो को लेकर आम आदमी का विश्वास धीरे-धीरे खत्म होता चला जा रहा है। यह देश के लिए एक चिंताजनक स्थिति है। भारत में दल बदल कानून इसलिए बनाया गया था, ताकि राजनीतिक दलों में जो लोग किसी पार्टी और विचारधारा से चुनाव जीतकर आते हैं। वह दल बदल करके अपने निजी लाभ के लिए अनैतिक काम न करने पाएं। उसको रोकने 1985 में संविधान में 52वां संशोधन करके दल बदल कानून बनाया गया था। इस कानून में विभाजन, मर्जर, विलय जैसी स्थितियों को परिभाषित किया गया था। 2003 में संविधान में 91 संशोधन के जरिए पुन: संशोधन करना पड़ा। विलय को पुनः परिभाषित किया गया। नियम और कानून में संविधान में संशोधन के बाद भी दल बदल बड़े पैमाने पर होता रहा। 2014 के बाद दल बदल की घटनाएं और भी तेजी के साथ बढ़ना शुरू हो गईं। आज दल बदल कानून एक ऐसा कानून बन गया है, जिसकी आड़ में बड़े पैमाने पर दल बदल हो रहा है। राजनीति में भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी को बढ़ा दिया है। सांसदों और विधायकों के संसद और विधानसभा में अभिव्यक्ति के अधिकार को सीमित कर दिया है। निर्वाचित सांसद या विधायक किसी बिल पर सहमत नहीं हों, उसे खुलकर बहस में भाग लेने या मतदान करने की अनुमति नहीं होती है। पार्टी लाइन के विरोध में मतदान करना चाहेगा, तो उसकी सदस्यता खत्म हो जाएगी। दल बदल कानून के अंतर्गत निर्वाचित सांसदों और विधायकों की अपने मतदाताओं और अपने कर्तव्यों को लेकर अपनी राय जाहिर करने का अधिकार भी खत्म हो गया है। अब पार्टी तय करती है, सांसदों और विधायकों को पार्टी लाइन पर ही मतदान करना होगा, अन्यथा उसकी सदस्यता चली जाएगी। जिसके कारण दल बदल कानून भारतीय लोकतंत्र और भारतीय संविधान का काला कानून बन गया है। कानून और नियम तभी तक स्वीकार्य होते हैं, जब समाज में नैतिकता होती है। यदि नागरिक, नेता, अधिकारी और जिनके कंधों पर जिम्मेदारी है, वह नैतिक और जिम्मेदार नहीं होंगे। जिस तरह से पिछले तीन-चार दशकों में नैतिकता का स्थान अब अनैतिकता ने ले लिया है। जो जीता वही सिकंदर की तर्ज पर नियम और कानूनो का दुरुपयोग शुरू हुआ है। उसके बाद स्थितियां बद से बदतर होती चली जा रही हैं। संविधान ने न्यायपालिका को सर्वोच्च स्थान पर रखा था। न्यायपालिका के पास सीधे कोई अधिकार नहीं है। कानून बनाने की विधायिका को, कार्यपालिका को यह जिम्मेदारी दी गई, जो भी नियम-कानून बनाए जाते हैं, उनके अनुसार कार्यपालिका की जिम्मेदारी तय है। संविधान ने न्यायपालिका को दोनों संवैधानिक संस्थाओं के कार्यों की समीक्षा का अधिकार दिया। नागरिकों के मौलिक अधिकारों का संरक्षण, नियम, कानून और कायदे से कार्यपालिका और विधायिका काम कर रही है, या नहीं। इसकी समीक्षा का अधिकार न्यायपालिका के पास है। न्यायपालिका के आदेशों का पालन करना कार्यपालिका और विधायिका के लिए अनिवार्य है। पिछले कुछ वर्षों में न्यायपालिका संविधान के प्रति अपनी जवाबदेही और कर्तव्यों को लेकर कमजोर होती हुई दिख रही है। न्यायपालिका में भी सरकारी दबाव, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, जवाबदेही का अभाव स्पष्ट रूप से दिखने लगा है। जिसके कारण अब न्यायपालिका के प्रति लोगों का वह विश्वास खत्म हो रहा है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार अपने हर निर्णय को सही ठहराती है। जब उनका विरोध होता है, तब सरकार कहती है न्यायपालिका चले जाओ। न्यायपालिका जाने पर भी वर्षों तक न्याय नहीं मिलता है। तारीख पर तारीख मिलती रहती है, जो फैसले आ रहे हैं, वह आधे अधूरे होते हैं। जिसके कारण कानून के प्रति आम आदमी को विश्वास नहीं रहा। दल बदल कानून का जिस तरह से दुरुपयोग हुआ है। आसंदी में बैठे हुए अध्यक्ष एवं सभापति जो बहुमत के आधार पर चुने जाते हैं। उन्होंने अपने अधिकारों का पार्टी के हितों के लिए दुरुपयोग किया है। सही समय पर फैसला नहीं दिया, फैसला दिया तो वह नियम और कानून के अनुसार नहीं था। जिसकी लाठी, उसकी भैंस का जो कानून हजारों लाखों वर्ष से चला आ रहा था, वही कानून अब लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी स्थान ले रहा है। दल बदल कानून में आसंदी अपनी राजनीतिक निष्ठा के अनुसार अलग-अलग निर्णय देती हैं। कुछ इसी तरह की स्थिति हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की भी देखने को मिलने लगी है। महाराष्ट्र में जब दल बदल हुआ था, सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के निर्णय और दल बदल को गैर संवैधानिक बताया। इसके बाद भी सरकार चलती रही। महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष के निर्णय की न्यायिक समीक्षा समय पर नहीं हुई। दल बदलू सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा कर लिया। उसके बाद दूसरा चुनाव भी हो गया। आम आदमी पार्टी के 7 सांसदों ने राज्यसभा में आम आदमी पार्टी से इस्तीफा देकर भाजपा में चले गए है। जैसे ही उन्होंने दल बदलने का आवेदन किया। राज्यसभा के सभापति ने बिना किसी सुनवाई के उन्हें भाजपा का सांसद मान लिया। आम आदमी पार्टी की सरकार पंजाब में है, उसके विधायक हैं राष्ट्रीय स्तर की पार्टी है, राज्यसभा के सभापति ने यह देखने की जहमत नहीं उठाई, दल बदल कानून में नियमों का पालन हुआ है, या नहीं, जबकि आम आदमी पार्टी ने अपनी आपत्ति राज्यसभा सचिवालय को सौंप दी थी। वर्तमान हालात को देखते हुए यही कहा जा सकता है। संविधान, लोकतंत्र, कानून का राज, लट्ठ तंत्र के अधीन है। जिसके पास लाठी की ताकत है, कानून उसका ही चलेगा। विधायिका हो, चाहे न्यायपालिका हो या कार्य पालिका हो, लाठी की ताकत से सभी को नियंत्रित होना ही होता है। संविधान की लाठी कमजोर हो गई है। सत्ता पक्ष की लाठी ज्यादा मजबूत है। जो मजबूत है, वहीं शासन कर सकता है। अनादि काल से यही सत्य देखते आ रहे हैं, यही सत्य अंत तक बना रहेगा। ईएमएस / 28 अप्रैल 26