राज्य
29-Apr-2026
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- नौरादेही टाइगर रिजर्व पैदा करेगा नई जेनेटिक्स वाली नस्ल भोपाल (ईएमएस)। गुजरात के गिर के शेर और मध्य प्रदेश के बारहसिंघा संकट में आ गए थे, क्योंकि एक जगह पर सिमटे होने के कारण अंत:प्रजनन की समस्या के चलते इनकी नस्ल कमजोर हो रही थी और धीरे-धीरे इनकी आबादी पर संकट आ रहा था। इन दो बड़ी प्रजातियों पर आज संकट को देखते हुए टाइगर स्टेट मध्य प्रदेश ने एक बड़ी सीख ली और दुनिया भर में अपने बाघों के लिए मशहूर मध्य प्रदेश के बाघ अंत:प्रजनन की समस्या का शिकार ना हो जाए और उनकी नस्ल कमजोर ना हो, इसके लिए मध्य प्रदेश के टाइगर रिजर्व में इस बात का विशेष ध्यान रखा गया। इसका सबसे बड़ा उदाहरण मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा टाइगर रिजर्व वीरांगना रानी दुर्गावती रिजर्व है। यह प्रयोग ज्यादातर मध्य प्रदेश के उन टाइगर रिजर्व में किया जा रहा है, जो नए हैं और दूसरे टाइगर रिजर्व से गलियारे के तौर पर जुड़े हुए हैं, ताकि वहां के बाद दूसरे जंगलों में विचरण करें और नए साथी के साथ समागम कर आनुवांशिक तौर पर उत्तम नस्ल तैयार करें, ताकि भविष्य में मध्य प्रदेश के बाघों की नस्ल सर्वश्रेष्ठ नस्ल हो। बाघों की नस्ल की सुधार के दिशा में किए जा रहे प्रयासों को समझने के लिए सबसे पहले अंत:प्रजनन और उससे जुड़ी चुनौतियों को समझना होगा। नौरादेही टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर रजनीश कुमार सिंह बताते हैं कि जैसे भारतीय परंपरा में सगोत्रीय विवाह नहीं किए जाते हैं। यह एक तरह से अंत:प्रजनन को रोकने का ही प्रयास है, क्योंकि सगोत्रीय विवाह होगा, तो बहुत संभावना है कि आनुवांशिक तौर पर बहन और भाई का विवाह हो जाएगा। विज्ञान में इसे ही अंत:प्रजनन कहा गया है। भारतीय संस्कृति विज्ञान से ही जन्मी है। हमारे ऋषि मुनियों और अध्येताओं ने विज्ञान को समझा और परंपरा का रूप दिया है। सभी को पता है कि मानव शरीर के अंदर जीव और क्रोमोसोम होते हैं। इनमें एक्स माता से और वाय पिता से प्राप्त होता है। वहीं लड़कियों के लिए दोनों एक्सएक्स माता और पिता से प्राप्त होते हैं। मानव शरीर में चाहे रंग, बाल, नाक, कान और दूसरे अंग हैं, वह जीन से ही निर्धारित होते हैं। प्राकृतिक रूप से कुछ जीन प्रभावी और कुछ जीन अप्रभावी होते है। जो प्रभावी जीन होते हैं, वह एक्स या वाय किसी एक में होते हैं और कमजोर जीन एक्स और वाय दोनों में होते हैं। प्रकृति ने ऐसी व्यवस्था बनाई है कि जो बीमारियां हैं, वह अप्रभावी या कमजोर प्रकृति के होते है। यह जीन मां-बाप दोनों से आते हैं। अगर भाई-बहन में समागम होगा, तो मां-बाप से जीन आने की संभावना बढ़ती है। सिकल सेल एनीमिया और थैलीसीमिया जैसी समस्याएं इसी वजह से होती हैं। इसलिए विज्ञान भी कहता है कि शादी के समय आप कुंडली मिलाओ या ना मिलाओ, लेकिन आरएच फैक्टर जरूर मिलाओ। वाइल्ड लाइफ कॉरिडोर पर संकट के कारण बनी समस्या नौरादेही टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर बताते है कि इंसानों की तरह अंत:प्रजनन की समस्या वन्यप्राणियों में भी होती है। प्राकृतिक रूप से देखा जाए, तो 50-100 साल पहले वन्यप्राणी एक कॉरिडोर के रूप में एक दूसरे से जुड़े हुए थे। ऐसे में वन्यप्राणी अपने साथी की तलाश में कभी कान्हा से अचानक किसी दूसरे जंगल में चले जाते थे। इस वजह से उनमें की अंत:प्रजनन समस्या नहीं हो पाती थी, क्योंकि उनको अलग-अलग जगह के जीन मिलते थे, लेकिन धीरे-धीरे हमारे कॉरिडोर खत्म होते गए जंगलों को काट दिया गया और जंगल एक तरह से द्वीप में तब्दील हो रहे हैं। इनमें जो जानवर फंस कर रह गए, वह आपस में अंत:प्रजनन करते रहेंगे। इसका सबसे बड़ा उदाहरण गुजरात में सिंह और मध्य प्रदेश में बारहसिंघा के साथ देखने मिला है। मध्य प्रदेश में अंत:प्रजनन की वजह से 1970 में केवल 70 बारहसिंघा बचे थे। इसलिए बारहसिंघा को सतपुड़ा और वनविहार के साथ-साथ बांधवगढ़ में भेजा गया। कुछ सालों तक अलग-अलग रहने के बाद जब बारहसिंघा की मेटिंग कराएंगे, तो जेनेटिक वेरिएशन के कारण अलग गुण विकसित हो जाएंगे। बारहसिंघा के साथ समस्या थी कि यहां जो प्रजाति थी, वो दुनिया में कहीं नहीं थी। बाघों की उन्नत नस्ल विकसित करने की कोशिश रजनीश कुमार सिंह बताते है कि जिस तरह गुजरात में शेर और एमपी में बारहसिंघा के साथ समस्या खड़ी हुई। प्रदेश में बाघों में अंत:प्रजनन की समस्या ना हो, इसलिए जब नौरादेही वन्यजीव अभ्यारण में 2011 में बाघ खत्म हो गए और 2018 में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण परियोजना के तहत नए सिरे से बाघों की बसाने की बात आई, तो सोचा गया कि जब नौरादेही में बाहर से ही बाघों को लाना है, तो अलग-अलग जगह के बाघ क्यों ना लाए जाएं। ताकि अंत:प्रजनन की थोड़ी बहुत समस्या भी खत्म हो जाए। इसलिए यहां जो बाघिन राधा लाई गयी, वह मूल रूप से पेंच की थी और उसे कान्हा से यहां लाया गया था। वहीं बाघ किशन बांधवगढ़ से लाया गया था और तीसरा बाघ घूमते फिरते यहां आ गया। इस मानो प्रकृति ने भेज दिया है कि थोड़ी बहुत समस्या हो, तो वही खत्म हो जाए। मध्य प्रदेश के नए टाइगर रिजर्व में चल रहा प्रयोग इस तरह मध्य प्रदेश में उन्नत नस्ल के बाघ हों, यह प्रयोग वहीं ज्यादा किया जा रहे हैं, जो नए टाइगर रिजर्व बन रहे हैं, क्योंकि ज्यादातर पुराने टाइगर रिजर्व आपस में गलियारा के जरिए जुड़े हुए हैं। कान्हा और पेंच टाइगर रिजर्व का गलियारा इतना मजबूत है कि इसे बेस्ट टाइगर कॉरिडोर कहा जाता है। पेंच सतपुड़ा कॉरिडोर भी है, लेकिन कोयला खदानों के कारण थोड़ा अवस्थित हो गया है। नौरादेही की बात करें, तो रातापानी और पन्ना से बहुत अच्छी कनेक्टिविटी है। बांधवगढ़ से भी कनेक्टिविटी है, लेकिन थोड़ा सा बीच में दिक्कत है। वहीं नौरादेही के दक्षिण में पेंच और सतपुड़ा से बहुत अच्छी नहीं, लेकिन कनेक्टिविटी है। अगर हम इसको बनाए रखने में सफल हो गए, तो आने वाले समय में बाघ एक जगह से दूसरी जगह आएंगे और जेनेटिक मजबूती बनी रहेगी। - 29 अप्रैल 26