राज्यसभा में आम आदमी पार्टी (आप) के दो-तिहाई से ज्यादा 7 सदस्यों द्वारा संसदीय दल (राज्य सभा) का विभाजन कर भाजपा में शामिल होना कई सवाल खड़े करता है। इस घटनाक्रम ने अनायास ही फिल्म “हम आप के हैं कौन?” की याद दिला दी—पर यहाँ सवाल रिश्तों का नहीं, बल्कि राजनीतिक पहचान का है। “नाम बड़े और दर्शन छोटे खोटे?” “आम आदमी” के नाम पर कुछ खास करने राजनीति में उतरी पार्टी क्या अब कुछ “खास” की होकर सत्ता की चमक-दमक में अपने मूल स्वरूप से दूर हो गई है? कभी ‘तुम’ के अपनत्व से ‘आप’ के सम्मान तक की यात्रा करने वाली पार्टी अब कहीं “ऊँची दुकान, फीका पकवान” साबित तो नहीं हो रही? ‘‘आप’’ ‘‘औपचारिक’’ होकर भी थी, लेकिन निसंदेह ‘सम्मानीय’ शब्द था। परन्तु जिस तरह भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले जन आंदोलन खड़ा कर विशिष्ट ‘‘पहचान’’ (‘‘नीति नहीं?’’) लेकर स्थापित हुई ‘‘आप’’ पार्टी भ्रष्टाचार में कंठ तक डूब कर ‘आप’ रूपी ‘‘औपचारिकता’’ को भी इस कदर बदनाम कर दिया कि औपचारिक रूप से ‘‘आप’’ से मिलने में लोग दूरी बनाने लगे। वर्तमान तथ्य व सत्य यही है। ‘‘आम’’ के मौसम में यह तो होना ही था” राजनीति में भी प्रकृति के नियम लागू होते हैं। यदि “आम” समय पर तोड़कर पकाने के लिए सुरक्षित न रखा जाए, तो उसका गिरना तय है। इसी संदर्भ में राघव चड्ढा जैसे नेताओं का पार्टी छोड़ना इस बात का संकेत देता है कि भीतर ही भीतर कुछ “खिचड़ी पक” रही थी। कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ “झाड़ू” लेकर निकली पार्टी आज खुद ही “अपनी ही झाड़ू से भ्रष्टाचार की धूल झाड़ती” नजर आ रही है। सवाल यह है—क्या यह सफाई है या अंदरूनी बिखराव? चूंकि देश में गहराई तक जड़े जमा चुका ‘‘भ्रष्टाचार’’ जो ‘‘शिष्टाचार’’ का आवरण पहन चुका है, को तो वे समाप्त कर नहीं सकते थे। वह इसलिए कि भ्रष्टाचार पर ‘‘झाड़ू’’ लगाने के लिए ‘‘झाड़ू’’ को उर्जा देने वाली शक्ति, ‘‘जन लोकपाल’’ का वास्तविक रूप व अर्थ में वैसा गठन ही नहीं हुआ? जिसकी मांग की गई थी। बल्कि जन हट कर सिर्फ लोकपाल बन गया। “सत्ता का चरित्र बदलना असंभव” पुरानी कहावत है—“सत्ता आदमी को नहीं बदलती, आदमी सत्ता के रंग में रंग जाता है।” अरविंद केजरीवाल ने अन्ना आंदोलन के दौरान जिस व्यवस्था पर तीखे सवाल उठाए, वही सवाल आज उनकी अपनी सरकार पर उठ रहे हैं। याद कीजिए! जन लोकपाल को लेकर दिल्ली के जंतर मंतर में किए गए अन्ना आंदोलन में अरविंद केजरीवाल समय पूर्व भारतीय राजस्व सेवा त्याग कर नौकरशाह से नेता बने (राजनेता नहीं?) दहाड़ कर मंच से चिल्लाते थे, देश की संसद चोर है, जिसमें लगभग 162 से ज्यादा सांसद दागी होकर उन पर आपराधिक प्रकरण चल रहे हैं। तत्समय उन्होंनेे चुनौती देते हुए कहा था कि वे सब संसद से इस्तीफा दे, मुकदमा लड़े, निर्दोष होकर चुनाव जीतकर फिर वापिस संसद में आएं। ‘‘असली लोकतंत्र तो सड़क पर है, संसद में नहीं। प्रकृति का नियम/ कहा जाता है, जब सामने वाले पर दो उंगलियां उठाई जाती है, तो सत्ता ही स्वत: ही तीन उंगलियां अपनी ओर उठ जाती हैं। प्रकृति ने अपना रूप दिखाया। दूसरों पर उंगली उठाने वाले अरविंद केजरीवाल स्वयं पर व उनके अधिकांश मंत्रियों पर भ्रष्टाचार से लेकर विभिन्न अपराधिक आरोप लगे। तब केजरीवाल ने स्वयं के जंतर मंतर के उद्घोष सिद्धांत के अनुसार एक भी आरोपी मंत्री को पद से नहीं हटाया और कहा यह सिर्फ प्रशासनिक ‘‘तंत्रों’’ सत्ता का दुरुपयोग कर भाजपा ने झूठे आरोपों में फंसाया है। यही कहना तो तत्समय उन दागी सांसदों का भी था। स्पष्ट है,जब अपने ही नेताओं पर आरोप लगे, तो “नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली” जैसी स्थिति बनती दिखी। प्रश्न यह नहीं कि आरोप सही हैं या गलत—बल्कि यह कि सिद्धांत और व्यवहार में इतना अंतर क्यों? “आप”: विचारधारा या अवसरवाद?” विचारधारा वाद या सिद्धांत लिए अन्य राजनीतिक दलों के समान आप की स्वयं की कोई विचारधारा नहीं है। आम आदमी पार्टी की उत्पत्ति अन्ना आंदोलन से अन्ना की अनिच्छा के रहते हुये हुई। यह आंदोलन स्वयं अन्ना का न होकर बल्कि भाजपा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा प्रायोजित अन्ना को केन्द्र में रखकर किया गया था, जिसके सूत्रधार पर्दे के पीछे गोविंदाचार्य (संघ प्रचारक)थे। यूपीए सरकार को कथित रूप से अस्थिर करने के लिए यह आंदोलन चलाया गया था, जिसमें केजरीवाल मात्र मोहरे थे। लेकिन बाद में अन्ना आंदोलन की सफलता के चलते अरविंद केजरीवाल की तीव्र राजनीतिक इच्छा जाग्रत हो गई। इसी आप ने न केवल कांग्रेस को बल्कि भाजपा के शिखर पर व केंद्र में मोदी के रहते हुए दिल्ली के 7 सांसदों के रहने के बावजूद दिल्ली विधानसभा में तीन बार कड़ी मात दी। फलत: समय के साथ अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएँ होती रही हैं। कभी आप को भाजपा की “बी टीम” कहा गया, तो कभी कांग्रेस के खिलाफ सबसे मजबूत विपक्ष।यानी “जिसकी लाठी, उसकी भैंस”—राजनीतिक नैरेटिव परिस्थितियों के अनुसार बदलते रहे। दिल्ली और पंजाब में शानदार जीत के बाद “आप” ने साबित किया कि वह “आसमान से गिरी नहीं, जमीन से उगी” पार्टी है। लेकिन हालिया घटनाएँ यह संकेत देती हैं कि पार्टी “दो नावों की सवारी” करने की कोशिश में संतुलन खो रही है। राघव चड्ढा: प्रोफेशनल (सी.ए) से राजनीति के शिखर तक ’’ । राघव चड्ढा ने पार्टी छोड़ते समय कहा कि पार्टी अपने मूल सिद्धांतों से भटक गई है। बड़े दुखी मन से ‘आप’ से दूर जा रहा हूं। वास्तव में वे आप पार्टी या आप (आम जनता) से दूर जा रहे है? मन दुखी क्यों है? यह स्पष्ट नहीं। संस्थापक सदस्य होने के कारण पार्टी छोड़ने का दुख है अथवा अफसोस पार्टी के मूल सिद्धांत से भटक जाने पर उस भाजपा में जाने का दुख है? जिसे वे पानी पी-पी पीकर कोसते थे। राघव ने खुशी का इजहार नहीं किया? लेकिन सवाल उठता है— क्या “घर का भेदी लंका ढाए” वाली स्थिति है, या यह “डूबते जहाज से कूदने” जैसा निर्णय? अगर पार्टी गलत थी, तो इतने वर्षों तक साथ क्यों रहे?और यदि सही थी, तो अब अचानक क्या बदल गया?राजनीति में अक्सर “साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे” वाली रणनीति अपनाई जाती है—लेकिन जनता अब इन बारीकियों को समझने लगी है। निष्कर्ष : “दूध का दूध, पानी का पानी” राजनीति में जो व्यक्ति पार्टी छोड़ता है, वह उसे अपना सैंद्धातिक रवैया दर्शाते हुए स्वयं को भटका हुआ न ठहरकर पार्टी को ही भटके हुए रास्ते पर चलने का आरोप आसानी से लगा देता है। क्या उसमें इतना साहस नहीं होना चाहिए कि भारतीय लोकतंत्र में जब बहू-पार्टियों का अस्तित्व है, तब वे कभी भी किसी पार्टी को कभी भी ज्वाइन कर सकते हैं। क्योंकि सब पार्टियों का मूल तो एक ही सिद्धांत देश हित का होना चाहिए, जो है। यद्यपि देश हित के तरीके अलग-अलग हो सकते है। जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक दल “कथनी और करनी” में अंतर कम करें। अंततः जनता ही तय करती है— कौन “आम” है और कौन “खास”, कौन “सच्चा” है और कौन “सियासी मुखौटा”। क्योंकि लोकतंत्र में देर हो सकती है, अंधेर नहीं— और जनता सब देखती है, “ऊँट किस करवट बैठता है” यह भी। ईएमएस/01 मई2026 (लेखक, कर सलाहकार एवं पूर्व अध्यक्ष, बैतूल सुधार न्यास)