लेख
03-May-2026
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इसे हादसा कहें या बदहाल और गैर जिम्मेदार भ्रष्ट व्यवस्था की हद दर्जे की लापरवाही जिसके चलते करीब पन्द्रह हंसती खेलती जिंदगी मौत के आगोश में समा गयीं और दर्जन भर परिवारों को कभी न भूलने वाला दुख दे गयीं। 30 अप्रेल गुरुवार को मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले से एक बड़े हादसे की खबर सामने आई है.जबलपुर जिले के बरगी बांध क्रूज हादसे को तीन दिन से अधिक समय बीत चुका है. लेकिन अब भी कुछ लोग लापता हैं. उनके जिंदा मिलने की उम्मीद कम है, लेकिन अपनों की उम्मीद है कि टूटती नहीं. आंखें टकटकी लगाए उनका इंतजार देख रही हैं. आपको बता दें जबलपुर मप्र के खास पर्यटन स्थल बरगी डैम में गुरुवार 30 अप्रेल की शाम पर्यटकों की खुशियां मातम में बदल गईं. डैम के खमरिया टापू के पास एक क्रूज अचानक आए तेज तूफान के कारण अनियंत्रित होकर पानी में डूब गया. हादसे के वक्त क्रूज पर करीब 30 से 40 लोग सवार थे. बताया जा रहा है कि ये सभी लाेग यहां घूमने के लिए निकले थे. अचानक हुए इस हादसे से मौके पर चीख पुकार मच गई.शुरुआती जानकारी के अनुसार, हादसे के समय क्रूज नर्मदा नदी के बैकवाटर में मौजूद था. इस बीच तभी अचानक मौसम बदला गया और तेज हवाओं के साथ तूफान आने लगा. ये तूफान इतना जबरदस्त था कि क्रूज अपना संतुलन खाेने लगा और कुछ ही समय में पानी में पलट गया. जानकारी के अनुसार, पर्यटकों से भरा क्रूज अचानक नर्मदा में पलट गया. पानी से लबालब बांध में जब लोग डूबे तो हर किसी की आंखें सिर्फ अपनों को ढूंढ रही थीं. किसी ने आंखों के सामने पत्नी खो दी तो किसी ने मां और भाई. इस हादसे में अब तक 9 लोगों की मौत हो चुकी है. ये लोग किसी के मां-बाप, भाई, बहन थे. सोचिए उन लोगों पर क्या बीत रही होगी, पलक झपकते ही जिसके अपने आंखों से ओझल हो गए. उनके अपने डूबते रहे और वे बेबस होकर देखते रहे. चीख-पुकार और मदद की गुहार भी काम नहीं आई. जबलपुर क्रूज हादसे ने दिल्ली के एक परिवार की खुशियां उजाड़ दीं. पति, पत्नी, एक बेटा और एक बेटी पिकनिक मनाने क्रूज पर चढ़े. हादसे के दौरान पिता और बेटी किसी तरह सुरक्षित बच गए, लेकिन मां और बेटा क्रूज के भीतर ही फंस गए थे. आज सुबह मां का अपने बेटे को सीने से चिपकाए हुए शव मिला. मानो आखिरी पल तक उसे बचाने की कोशिश कर रही हो. यह दृश्य देख वहां मौजूद हर शख्स की आंखें भर आईं. जबलपुर के सिविल लाइन इलाके के रहने वाले सैयद रियाज हुसैन की पत्नी, नाती और समधन लापता हैं. वह परिवार के साथ क्रूज की सवारी का आनंद लेने गए थे. वो कहां जानते थे कि डैम में मौत दस्तक दे रही है. सैयद तो बच गए, लेकिन उनके परिजन अभी भी लापता हैं. वह बेबस और लाचार हैं और किसी चमत्कार की उम्मीद लगाए बैठे हैं. एक छोटी सी बच्ची मां-पिता और भाई के साथ कुछ देर पहले जो हंसी के ठहाके लगा रही थी उसकी आंखों में सिबाय दर्द के कुछ दिखाई नहीं दे रहा. बच्ची बुरी तरह डरी, सहमी और घबराई हुई है. पापा तो मिल गए लेकिन मम्मी, भाई और नाना का कुछ अता-पता नहीं है. वहीं नानी की डूबने से मौत हो गई है. पल भर में उसकी खुशियां मातम में बदल गईं. जबलपुर क्रूज हादसे ने एक हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ दिया. घटना की जानकारी मिलते ही बरगी थाना पुलिस और प्रशासन की टीम तुरंत मौके पर पहुंची और मौके पर रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया. मामले की गंभीरता को देखते हुए एसडीआरएफ की टीम को रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए रवाना किया गया है. टीम लगातार लापता लोगों की तलाश में जुटी और पानी के भीतर सर्च ऑपरेशन चलाया गया . सवाल यह है कि यह हादसा अनगिनत लापरवाही और अव्यवस्था का ईशारा करता है जब मौसम विभाग की पचास किमी प्रति घंटा की रफ्तार से आंधी तूफान आने की चेतावनी जारी थी तब क्रूज का नदी में संचालन क्यों किया गया? जानकारी के अनुसार क्रूज का संचालन मध्यप्रदेश पर्यटन विभाग करता है बताया गया है कि इस बीस साल पुरानी क्रूज में वैध तौर पर तीस पर्यटक लिस्टेड थे लेकिन कुछ लोग स्टाफ की कृपा पर भी सवार थे जो लिस्टेड नही थे। बचाव दल 28 लोगों को बचाने का दावा कर रहा है जबकि नौ शव निकाले जा चुके हैं इस तरह 37 सवारियों की पुष्टि हो जाती है। इसके अलावा नियमानुसार सबको लाइफ जेकेट पहनना अनिवार्य था लेकिन तूफान आने पर अफरा-तफरी मचने पर लाइफ जेकेट दी गयी उन्हें पाने के लिए सभी सवार पर्यटकों के क्रूज पर एक तरफ आने से संतुलन बिगड़ गया और क्रूज एक ओर झुकते ही नदी में समा गया। जाहिर है कि यह क्रूज नियमों की घोर अनदेखी कर मनमानी ढंग से बिना अनुभवी व अल्पप्रशिक्षित परिचालन टीम के भरोसे नर्मदा की छाती पर संचालित किए जा रहे थे। इस सबके लिए खुद सरकार अपनी जिम्मेदारी से नही बच सकती है सरकार चाहे उत्तराखंड की हो यूपी की या मध्यप्रदेश की सब जगह ग्रीष्म शीत अवकाश अथवा धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए पर्यटकों श्रद्धालुओं की सुरक्षा को दरकिनार किया गया है सरकार का रवैया सिर्फ पर्यटकों को प्रचार के बूते पर आकर्षित कर राजस्व और स्थानीय रोजगार बढाने का है लेकिन श्रद्धालुओं पर्यटकों के जीवन की सुरक्षा कौन करेगा? इसकी चिंता सरकार या सरकारी अमले को कतई नहीं है। व्यवस्था में जुड़े सरकारी अधिकारी कर्मचारी अपनी कमीशन खोरी और किसी न किसी तरह जेब भरने में जुट जाते हैं। मौसम की चेतावनी को दरकिनार कर पर्यटकों को जान की कीमत पर धार्मिक या मौज मस्ती का पर्यटन कराना कौन सी नैतिकता है? उत्तराखंड जैसे संवेदनशील प्राकृतिक वातावरण वाले प्रदेश में चारधाम यात्रा के लिए क्षमता से अधिक पर्यटकों को विभिन्न माध्यमों से लुभाना कहां तक उचित है? यूपी में बीते साल कुम्भ स्नान के लिए ऐसा प्रचार किया गया कि श्रद्धालुओं का इतना सैलाब आ गया कि व्यवस्था लडखडा गयी भगदड़ में सैकड़ों जान गयीं। इसी तरह उत्तराखंड सरकार भलीभांति जानती है कि 2013 की केदारनाथ या 2024 की चमोली रैणी गाँव ग्लेशियर फटने और धराली में बादल फटने से जनहानि जैसी आपदा में बचाव की कोई समुचित व्यवस्था उसके पास मौजूद नहीं है तब भी लोगों को मीठे मीठे सपने दिखा कर चारधाम पर्यटन के नाम पर उनके जीवन से खिलवाड़ का सिलसिला जारी है। हर सरकार दलील देती है कि पर्यटन ही स्थानीय लोगों की अर्थव्यवस्था का आधार है। ऐसे हालात में सुधार की बड़ी जरूरत है कम से कम नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए ताकि मानवीय भूल से होने वाली दुर्घटनाओं को तो रोका जा सके। आपको बता दें बरगी डैम हादसे में अब तक नौ लोगों के शव मिलने की पुष्टि हो चुकी है. वहीं आधिकारिक जानकारी के अनुसार अब भी करीब छह लोग लापता बताए जा रहे हैं, जिनकी तलाश जारी है. मौके पर मौजूद स्थानीय लोग भी राहत कार्यों में पुलिस की मदद कर रहे हैं. फिलहाल प्राथमिकता लापता लोगों को जल्द से जल्द खोजने की है. प्रशासन ने पूरे इलाके में चौकसी बढ़ा दी है.अब लापता लोगों के जीवित बचने की संभावना बहुत कम है। सरकार अनुग्रह राशि देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। जिम्मेदार अधिकारी और मंत्री अभागी माँ व बच्चे की मार्मिक मौत पर चंद आंसू बहाने की रील बनवा कर अपनी संवेदना प्रकट करने का नाटक कर रहे हैं लेकिन इस और ऐसे ही तमाम हादसों के मूल में छिपी अक्षम्य लापरवाही और अव्यवस्था के जिम्मेदार लोग कभी सामने नही आएंगे नहीं उनको उनके अपराध के लिए दंडित किया जाएगा। यही सिस्टम है इसमें कसूरवार साफ बच जाता है और अगले हादसे का इंतजार किया जाता है। इस व्यवस्था पर सिर्फ अफसोस किया जा सकता है। (लेखक राष्ट्रवादी चिंतक वरिष्ठ पत्रकार हैं पिछले 40 वर्ष से लेखन और पत्रकारिता से जुड़े हैं) ईएमएस / 03 मई 26