अबूधाबी (ईएमएस)। वैश्विक ऊर्जा राजनीति में 1 मई 2026 एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में उभर रहा है, क्योंकि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने ओपेक और ओपेक प्लस गठबंधन से बाहर निकलने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। यह कदम न केवल दशकों पुराने तेल सहयोग ढांचे को चुनौती देता है, बल्कि तब आया है जब वैश्विक तेल बाजार पहले से ही अस्थिर बना हुआ है। वर्तमान में तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। ब्रेंट क्रूड करीब 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास और डब्ल्यूटीआई क्रूड 99 डॉलर के करीब कारोबार कर रहा है। इस बढ़त के पीछे मुख्य कारण मध्य पूर्व, खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव हैं, जहां से दुनिया के एक बड़े हिस्से का तेल परिवहन होता है। इसतरह माहौल में यूएई का ओपेक से बाहर निकलना बाजार की चिंताओं को और बढ़ा सकता है। ओपेक की स्थापना 1960 में ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला ने की थी। इसका मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच तेल उत्पादन नीतियों का समन्वय करना और वैश्विक बाजार में कीमतों को स्थिर बनाए रखना है। समय के साथ इस संगठन में कई अन्य तेल उत्पादक देश शामिल हुए और बाद में ओपेक प्लस के रूप में रूस जैसे गैर-सदस्य देशों के साथ एक व्यापक गठबंधन बना, जिससे उत्पादन नियंत्रण और अधिक प्रभावी हो सके। यूएई का इस गठबंधन से बाहर निकलना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ओपेक के सबसे बड़े उत्पादकों में से एक है और कुल उत्पादन में इसका योगदान लगभग 12 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि यह सिर्फ एक सदस्य का बाहर निकलना नहीं, बल्कि संगठन की सामूहिक ताकत में एक बड़ी कमी है। इससे ओपेक की उत्पादन नियंत्रण क्षमता कमजोर हो सकती है, जिससे तेल की कीमतों में अस्थिरता बढ़ने की आशंका है। ओपेक लंबे समय से उत्पादन कोटा प्रणाली पर निर्भर रहा है, जिसके तहत सदस्य देश तय सीमा से अधिक उत्पादन नहीं करते ताकि कीमतों को स्थिर रखा जा सके। लेकिन यूएई इस व्यवस्था से असंतुष्ट था। वह अपनी उत्पादन क्षमता को तेजी से बढ़ा रहा है और अपने ऊर्जा क्षेत्र में भारी निवेश कर चुका है। वर्तमान में उसकी उत्पादन क्षमता लगभग 4.85 मिलियन बैरल प्रति दिन है, जिसे वह 2027 तक 5 मिलियन बैरल तक बढ़ाना चाहता है। इसके बाद ओपेक की पाबंदियां उसके विकास के रास्ते में बाधा बन रही थीं। यूएई के ऊर्जा मंत्री सुहैल अल मजरूई के अनुसार, यह फैसला देश की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति और बाजार के मूलभूत सिद्धांतों को ध्यान में रखकर लिया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह निर्णय स्वतंत्र रूप से लिया गया और इसमें अन्य सदस्य देशों, यहां तक कि सऊदी अरब से भी कोई परामर्श नहीं किया गया। यह बयान ओपेक के भीतर बढ़ते मतभेदों की ओर संकेत करता है। इस फैसले के संभावित प्रभाव दूरगामी हो सकते हैं। एक ओर, यूएई को अब उत्पादन बढ़ाने और बाजार में अधिक हिस्सेदारी हासिल करने की स्वतंत्रता मिलेगी। दूसरी ओर, ओपेक के लिए उत्पादन संतुलन बनाए रखना कठिन हो सकता है। यदि अन्य देश भी इसी तरह के कदम उठाते हैं, तब वैश्विक तेल बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है और कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। आशीष/ईएमएस 01 मई 2026