कालपी डिपो में भारी काम के बीच न जूते न दस्ताने, भगवान भरोसे श्रमिक, वन विभाग की अनदेखी, सरकारी दावों की खुली पोल सरकार जहाँ एक ओर श्रमिकों के हितों और उनकी सुरक्षा के लिए बड़े-बड़े दावे करती हैं, वहीं मंडला जिले के वन मंडल अंतर्गत कालपी वन परिक्षेत्र से एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आ रही है। यहाँ स्थित वनकाष्ठागार डिपो में वर्षों से काम कर रहे सैकड़ों मजदूरों को आज तक उनके बुनियादी हक और सुरक्षा उपकरण नसीब नहीं हो पाए हैं। यह स्थिति न केवल वन विभाग, बल्कि संबंधित ठेकेदारों और सरकारी कंपनियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवालिया निशान खड़े करती है। बताया गया कि कालपी डिपो में दैनिक मजदूरी पर आने वाले स्थानीय और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के मजदूर लकड़ी के भारी-भरकम लट्ठों को उठाने, उनकी छँटाई और लोडिंग जैसे अत्यंत जोखिम भरे कार्य करते हैं। नियमानुसार ऐसे भारी और खतरनाक कार्यों में लगे श्रमिकों को सुरक्षा के लिए हेलमेट, हाथों के दस्ताने और मजबूत जूते मिलना अनिवार्य है। बावजूद इसके धरातल पर इन मजदूरों को नंगे पैर या सामान्य चप्पलों में भारी काम करते देखा जा सकता है। सुरक्षा संसाधनों की यह कमी किसी भी दिन बड़े हादसे को न्योता दे सकती है। स्वास्थ्य सुविधा और बीमा से भी वंचित सुरक्षा उपकरणों की बात तो दूर, यहाँ कार्यरत मजदूरों के लिए किसी भी प्रकार के स्वास्थ्य बीमा या आपातकालीन स्वास्थ्य सुविधा का प्रावधान नहीं किया गया है। यदि कार्य के दौरान कोई मजदूर चोटिल होता है, तो उसके उपचार की जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं है। प्रशासन और शासन की इस बेरुखी ने इन दैनिक वेतनभोगियों को हाशिए पर धकेल दिया है। प्रशासन पर उठते सवाल इतने वर्षों से निरंतर कार्य होने के बाद भी वन विभाग द्वारा इनकी सुध न लेना प्रशासनिक संवेदनहीनता को दर्शाता है। लोगों का कहना है कि क्या भारी श्रम करने वाले ये गरीब मजदूर सुरक्षा के हकदार नहीं हैं? भारी मशीनों और लकडिय़ों के बीच काम करने वाले इन श्रमिकों का जीवन क्या इतना सस्ता है कि विभाग को उनके पैरों के जूते और सिर के हेलमेट तक का बजट उपलब्ध नहीं है। मानव अधिकार का उल्लंघन बताया गया कि कालपी डिपो के ये मजदूर आज भी अपने हक की बाट जोह रहे हैं। जरूरत है कि प्रशासन अपनी नींद से जागे और इन श्रमिकों को अनिवार्य सुरक्षा किट उपलब्ध कराने के साथ उनके स्वास्थ्य और भविष्य को सुरक्षित करने के लिए ठोस कदम उठाए, जिससे किसी अप्रिय घटना से बचा जा सके। मजदूरों का कहना है कि हम दैनिक मजदूर सुरक्षा के पूर्ण हकदार हैं। भारतीय श्रम कानून के अनुसार किसी भी कार्यस्थल पर सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराना चाहे वह सरकार हो या निजी ठेकेदार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। सुरक्षा के अभाव में काम कराना न केवल अनैतिक है, बल्कि मानवाधिकारों का उल्लंघन भी है। सुरक्षा ताक पर, खाली बाल्टियां दे रहीं बड़े खतरे को दावत जिले के कालपी वनकाष्ठागार डिपो में वन विभाग की बड़ी लापरवाही सामने आई है। भीषण गर्मी और आगजनी के बढ़ते खतरों के बावजूद डिपो में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम केवल कागजों तक सीमित नजर आ रहे हैं। मौके पर स्थिति यह है कि आग बुझाने के लिए रखे गए फायर स्टैंड पर लटकी रेत की बाल्टियां खाली पड़ी हैं। करोड़ों रुपये की बेशकीमती लकडिय़ों के संरक्षण वाले इस डिपो में यदि अचानक आगजनी जैसी कोई अप्रिय घटना होती है, तो विभाग के पास तत्काल बचाव का कोई ठोस साधन मौजूद नहीं है। सुरक्षा उपायों की यह पोल खोलती तस्वीर वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। ईएमएस / 01 मई 2026