देश के पांच राज्यों पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में मतदान संपन्न होने के साथ ही सभी की नजरें मतगणना के साथ आने वाले रिजल्ट पर टिक गई हैं। इस बार के विधानसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की कवायद भर नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता, चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की निष्पक्षता और जनता के भरोसे की परीक्षा भी साबित होने वाले हैं। सोमवार 4 मई को होने वाली मतगणना को लेकर जिस प्रकार राजनीतिक तापमान बढ़ा हुआ है, वह इस बात का संकेत है कि चुनाव अब सिर्फ जीत-हार का खेल नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व का प्रश्न बन गया है। मतदान के बाद आमतौर पर राजनीतिक दल अपनी-अपनी जीत के दावे करते हुए देखे जाते हैं, लेकिन इस बार खासकर पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठे विवादों ने पूरे देश का ध्यान खींचा है। मतगणना में पर्यवेक्षकों की नियुक्ति को लेकर मामला पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। यह स्थिति दर्शाती है कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर संदेह बढ़ा है। हालांकि चुनाव आयोग ने अतिरिक्त पर्यवेक्षकों की नियुक्ति और नियमों के पालन का भरोसा दिया है, फिर भी सवाल यह है कि क्या केवल प्रशासनिक कदम जनता के विश्वास को बहाल करने के लिए पर्याप्त हैं? खासतौर पर तब जबकि चुनाव के दौरान यह सुनने को मिला कि पश्चिम बंगाल में चुनाव टीएमसी और भाजपा के बीच नहीं बल्कि टीएमसी और चुनाव आयोग के बीच हो रहा है। इसने न सिर्फ चुनाव प्रक्रिया को बल्कि निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता पर ही सवालिया निशान लगा दिया। चुनाव की तिथि घोषित होने से लेकर चुनाव प्रचार और मतदान के बीच और अब परिणाम आने से पहले तक जिस तरह का माहौल बनता दिखा है, वह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है। इसने न सिर्फ चुनाव आयोग की स्वतंत्र व निष्पक्ष के साथ ईमानदार प्रक्रिया पर संदेह पैदा किया बल्कि न्यायपालिका क्या कर रही है, इस पर भी नजर डालने को मजबूर किया है। न्यायालय की तारीख पर तारीख वाली परिपाटी से लेकर सख्त टिप्पणी के बाद फैसलों को रोके रखने ने लोगों को सवाल उठाने का मौका फराहम कराया है। जब यह कहा जाने लगे कि तमाम जांच एजेंसियां और स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाएं भी केंद्र के इशारे पर उठ-बैठ और फैसले लेने से लेकर कार्रवाई करती नजर आ रही हैं तो वाकई चिंता का विषय हो जाता है। इस पूरी कवायद में विपक्ष के संविधान बचाओ मुहिम को सही ठहराया जाना उचित लगने लगता है। बहरहाल पांच राज्यों में मतदान पूर्ण होने के साथ ही अब नतीजे आने का इंतजार है, क्योंकि इससे यह भी मालूम चलेगा कि जो एग्जिट पोल्स अभी तक जो दावा करते आ रहे हैं वो कितने सही बैठते हैं। एग्जिट पोल्स ने इस बार अलग-अलग राज्यों में भिन्न-भिन्न तस्वीरें पेश की है। कहीं स्पष्ट बहुमत, तो कहीं कांटे की टक्कर दिखाकर लोगों का ध्यान भी खूब खींचा है। टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी के दावे 200 के पार से अलग पश्चिम बंगाल में मुकाबला बेहद करीबी बताया जा रहा है, जहां ‘साइलेंट वोटर’ निर्णायक भूमिका में होने का दावा भी किया जा रहा है। यह अनिश्चितता लोकतंत्र की खूबसूरती भी है और चुनौती भी। नतीजे प्रभावित न हों और हेर-फेर से मतदाताओं के मतों को बचाने मानों एक अलग ही संघर्ष जारी है। इसी प्रकार तमिलनाडु में संभावित राजनीतिक बदलाव का दावा किया जा रहा है। यह एक नई दिशा की ओर इशारा करता है। पारंपरिक द्रविड़ राजनीति के बीच नए चेहरे का उभार यह दर्शाता है कि मतदाता अब विकल्प तलाशने के लिए तैयार हैं, जो गलत भी साबित हो सकता है। वहीं असम में सत्तारूढ़ दल की संभावित लगातार तीसरी जीत यह संकेत देती है कि क्षेत्रीय नेतृत्व और संगठनात्मक मजबूती अभी भी निर्णायक कारक हैं। इसकी भी परीक्षा होगी और परिणाम बताएंगे कि कौन पास और कौन फेल रहा। केरल में सत्ता परिवर्तन की परंपरा लौटने की संभावना और वामपंथी राजनीति के कमजोर पड़ने के संकेत एग्जिट पॉल्स से मिलते हैं। यदि ऐसा होता है, तो यह केवल एक राज्य का परिणाम नहीं होगा, बल्कि देश की राजनीतिक दिशा पर भी असर डालेगा। दूसरी ओर, पुडुचेरी में गठबंधन की वापसी का दावा किया जा रहा है। इन तमाम परिदृश्यों के बीच सबसे अहम सवाल यह है कि क्या चुनावी प्रक्रिया जनता के विश्वास पर खरी उतर रही है? चुनाव आयोग की भूमिका, न्यायपालिका का हस्तक्षेप और राजनीतिक दलों का आचरण तीनों मिलकर लोकतंत्र की नींव को मजबूत या कमजोर करते हैं। जब चुनाव परिणाम आने से पहले ही विवाद, आरोप-प्रत्यारोप और कानूनी लड़ाइयां शुरू हो जाती हैं, तो यह लोकतांत्रिक स्वास्थ्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। यहां समझना होगा कि चुनाव केवल सरकार बनाने या गिराने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि यह जनता की आवाज़ का सबसे सशक्त माध्यम भी हैं। यदि इस प्रक्रिया पर ही सवाल उठने लगें, तो लोकतंत्र की आत्मा आहत होना ही होना है। इसलिए जरूरी है कि सभी पक्ष चाहे वे राजनीतिक दल हों, चुनाव आयोग हो या न्यायपालिका अपनी जिम्मेदारी को समझें और पारदर्शिता तथा निष्पक्षता को सर्वोच्च प्राथमिकता दें। कुल मिलाकर सेवा का भाव जो सभी स्तर पर देखने को मिलना चाहिए वह कहीं गुम हो चुका है। इसलिए ये चुनाव एक तरह से जीवन-मरण का प्रश्न बन गए हैं, जो होना नहीं चाहिए। ईएमएस / 03 मई 26