सियोल (ईएमएस)। अंटार्कटिक महाद्वीप में दक्षिण कोरिया के वैज्ञानिकों ने एक चौंकाने वाली खोज की है। वैज्ञानिकों ने बर्फीले अंटार्कटिक महाद्वीप के गहरे समुद्र में 300 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक तापमान वाले हाइड्रोथर्मल वेंट्स यानी गर्म झरनों का पता लगाया है। वैज्ञानिकों की यह महत्वपूर्ण खोज न केवल विज्ञान के लिए एक बड़ी उपलब्धि है बल्कि पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति और उसके विकास को समझने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। कोरिया पोलर रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने अपने रिसर्च वेसल आराओन पर सवार होकर यह मिशन पूरा किया। अंटार्कटिक के जांगबोगो स्टेशन से लगभग 1,200 किलोमीटर दूर, उन्होंने पहली बार एक मानवरहित सबमर्सिबल अरियारी का उपयोग करके 1,300 मीटर की गहराई में सीधे झांका। इस अनोखी तकनीक ने उन्हें उन गर्म तरल पदार्थों को देखने और उनके नमूने लेने में मदद की जो समुद्र तल से फव्वारों की तरह फूट रहे थे। यह नजारा न केवल हैरान करने वाला था बल्कि इसने वहां फल-फूल रहे एक ऐसे इकोसिस्टम को भी उजागर किया जिसके बारे में इंसान को पहले कोई जानकारी नहीं थी। ये हाइड्रोथर्मल वेंट्स दरअसल पृथ्वी की क्रस्ट में मौजूद दरारें हैं। समुद्री पानी जब इन दरारों से होकर मैग्मा के संपर्क में आता है, तो अत्यधिक दबाव के कारण 300 डिग्री सेल्सियस से ऊपर के तापमान पर भी तरल अवस्था में रहता है। यह खौलता हुआ पानी अपने साथ आयरन, कॉपर, जिंक और यहां तक कि सोने जैसी कीमती धातुएं तथा हाइड्रोजन सल्फाइड और मीथेन जैसी गैसें भी लेकर आता है। यह गर्म पानी अंटार्कटिक के ठंडे पानी में मिलकर धुएं जैसा गुबार बनाता है, हालांकि इसकी गर्मी केवल कुछ मीटर के दायरे तक ही सीमित रहती है। इस अत्यधिक अंधेरी और ठंडी गहराई में जहां सूरज की रोशनी कभी नहीं पहुंचती, वैज्ञानिकों को एक अनोखा इकोसिस्टम मिला है। यहां जीवन प्रकाश संश्लेषण के बजाय केमोसिंथेसिस यानी रासायनिक संश्लेषण पर आधारित है। गर्म झरनों से निकलने वाली गैसों को माइक्रो ऑर्गेनिज़्म तोड़कर ऊर्जा पैदा करते हैं, जो पूरे खाद्य श्रृंखला का आधार बनती है। वैज्ञानिकों को स्पंज, सी-एनीमोन और कई तरह के क्रस्टेशियंस तथा मोलस्क सहित 12 अलग-अलग प्रजातियों के जीव मिले हैं, जिनमें से कई दुनिया के लिए बिल्कुल नई हो सकती हैं। ये जीव बेहद कठिन परिस्थितियों में ढल चुके हैं और दुनिया के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग हैं। अंटार्कटिक के गहरे समुद्र में रिसर्च करना बेहद चुनौतीपूर्ण रहा है, लेकिन अरियारी जैसी स्वदेशी तकनीक ने इस गेम को बदल दिया है। अरियारी 6,000 मीटर तक गहराई में जाने में सक्षम है और इसने वैज्ञानिकों को पाताल का लाइव वीडियो देखने तथा सटीक सैंपल चुनने की सुविधा दी। पार्क सुंग-ह्युन, जो इस मिशन के लीडर हैं, उनका कहना है कि इस तरह की सीधी ऑब्जर्वेशन ग्लोबल लेवल पर बहुत दुर्लभ है। यह खोज केवल जीव विज्ञान तक सीमित नहीं है; यहां मिलने वाले धातुओं और खनिजों का भंडार भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। सुदामा/ईएमएस 04 मई 2026