राष्ट्रीय
04-May-2026
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-सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपनी किताब में जजों के रवैये पर उठाए सवाल नई दिल्ली,(ईएमएस)। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की किताब इन दिनों चर्चा में है। उन्होंने अपनी अपकमिंग किताब में जजों के रवैये पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने किताब में दुनिया भर में वकीलों की तरफ से जजों के लिए जताई जाने वाली श्रद्धा को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं। उनका दावा है कि इससे जजों में दिव्यता का झूठा एहसास पैदा हो गया है। इससे कुछ माई लॉर्ड्स दबंग बन गए हैं। माना जा रहा है कि तुषार मेहता अपनी किताब के बाद बेंच पर बैठे जजों की नाराजगी का शिकार हो सकते हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक तुषार मेहता ने विदेशी अदालतों की घटनाओं का जिक्र करते हुए बेंच पर दादागिरी वाली थीम को समझाया, जो भारतीय न्यायपालिका को भी आईना दिखा सकती है। अपनी किताब द बेंच, द बार एंड द बिजार में वे लिखते हैं- न्यायिक दादागिरी कई रूप ले लेती है। कुछ जज वकीलों की बात लगातार काटते हैं, तो कुछ सख्ती की हद पार करके अपमान करने पर उतर आते हैं। मेहता ने कहा कि न्यायिक व्यवस्था मुख्य रूप से मुकदमेबाजों के लिए ही बनी है, फिर भी हम अपने संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों की सुरक्षा की मांग सीधे तौर पर नहीं कर सकते। इसके बजाय उन्हें अपने वकील के जरिए माननीय न्यायाधीश की सादर अनुमति लेकर ही अपनी बात रखनी पड़ती है। यहां तक कि अगर पीठ की ओर से कोई स्पष्ट रूप से बेतुकी कानूनी बात भी कही जाती है, तो वकील सबसे पहले हम माननीय न्यायाधीश के समक्ष नतमस्तक हैं कहकर ही उसका जवाब देते हैं। इसके बाद ही वे साहस जुटाकर माननीय न्यायाधीश के सामने कोई वैकल्पिक प्रस्ताव प्रस्तुत करने की गुस्ताखी करने की हिम्मत कर पाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक व्यंग्यात्मक लहजे में लिखी यह किताब शायद एक साहसी कदम है। ये किताब इसलिए भी खास है, क्योंकि इस लिखने वाले लेखक खुद एक सेवारत विधि अधिकारी हैं। मेहता का कार्यकाल एसजी के तौर पर करीब 8 साल का है, जो 2018 में शुरू हुआ था। पहले एसजी रहे दिग्गज सी के दफ्तरी के 13 साल के कार्यकाल के बाद यह दूसरा सबसे लंबा कार्यकाल है। इस बीच एक अखबार ने दावा किया है कि उसके पास इस किताब की एक एक्सक्लूसिव कॉपी है। ये किताब दुनियाभर के अलग-अलग न्याय-क्षेत्रों और कोर्टरूम के नाटकों से कई दिलचस्प और गहरे उदाहरणों को बयां करती है। मेहता उन समस्याओं को भी स्वीकार करते हैं जिनका सामना जजों को करना पड़ता है। वे कहते हैं करीब सभी न्याय-क्षेत्रों में कोर्टरूम बहुत ज्यादा भीड़भाड़ वाले और तंग जगहें होती हैं, जहां काम करने का माहौल सुखद तो बिल्कुल भी नहीं होता। जज बहुत ज्यादा काम के बोझ तले दबे हुए हैं। बहुत कम इंफ्रास्ट्रक्चर और नाममात्र के संस्थागत सहयोग के साथ काम करते हैं। उनके पास जो संसाधन होते हैं, वे अक्सर उन मामलों की संख्या और जटिलता के मुकाबले पूरी तरह से असंतुलित होते हैं। सिराज/ईएमएस 04मई26