-विकास के बीच गहराती असमानता का संकट दुनिया की सबसे विकसित अर्थव्यवस्थाओं में गिने जाने वाले अमेरिका में बेघर लोगों की बढ़ती संख्या एक गहरी सामाजिक और आर्थिक विडंबना को उजागर करती है। तकनीकी प्रगति, उच्च आय और वैश्विक प्रभाव के बावजूद, देश का एक बड़ा वर्ग आज भी बुनियादी जरूरतों छत, भोजन और स्वास्थ्य से वंचित है। यह स्थिति केवल गरीबी का नहीं, बल्कि आर्थिक असमानता के बढ़ते अंतर का प्रत्यक्ष प्रमाण है। हाल के वर्षों में बेघर होना (होमलेसनेस) की समस्या तेजी से बढ़ी है। यह राजनीतिक जुमले नहीं हैं, जिसे एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल दिया जाए। बल्कि यू.एस. डिपार्टमेंट ऑफ हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट के आंकड़े हैं जो बताते हैं, कि लाखों लोग स्थायी आवास से वंचित हैं। इन बेघर इंसानों में बड़ी संख्या कामकाजी वर्ग की भी है। यह तथ्य विशेष रूप से चिंताजनक है कि रोजगार होने के बावजूद लोग घर नहीं ले पा रहे हैं। इसका मुख्य कारण आवास की आसमान छूती कीमतें और स्थिर या सीमित वेतन है। कुल मिलाकर महंगाई की मार अब बड़े स्तर पर भी देखने को मिलने लगी है। लॉस एंजिल्स, सैन फ्रांसिस्को और न्यूयॉर्क सिटी जैसे बड़े शहरों में स्थिति सबसे अधिक गंभीर है। यहां सड़कों, पुलों के नीचे, टेंट कॉलोनियों और अस्थायी शिविरों में रहने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इन महानगरों में किराया इतना अधिक हो चुका है कि न्यूनतम वेतन पाने वाला व्यक्ति एक साधारण घर का खर्च भी नहीं उठा सकता। वैश्विक मंदी के इस दौर में बढ़ती महंगाई इस संकट का प्रमुख कारण है, लेकिन इसके पीछे भी कई परस्पर कारण जुड़ते हैं। इनमें स्थिर आय, महंगी स्वास्थ्य सेवाएं, मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं और नशे की बढ़ती प्रवृत्ति को भी शामिल किया गया है। इन कारणों ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। कोविड-19 महामारी ने इस समस्या को और गहरा कर दिया, जब लाखों लोग बेरोजगार हो गए और उनकी आर्थिक सुरक्षा कमजोर पड़ गई। हालात को और चुनौतीपूर्ण बनाने में वैश्विक परिस्थितियों की भी भूमिका है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुख्य अर्थशास्त्री पियरे-ओलिवियर गोरिन्शास ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष लंबा खिंचता है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है। तेल की कीमतों में वृद्धि और महंगाई में उछाल से आर्थिक वृद्धि दर घटकर लगभग 2 फीसद तक पहुंच सकती है, जो वैश्विक मंदी का सबसे बड़ा संकेत माना जाता है। ईरान के खिलाफ इजरायल के साथ मिलकर युद्ध शुरु करते हुए अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने “छोटी और निर्णायक” लड़ाई बताया था, लेकिन वास्तविकता कहीं अधिक जटिल साबित हो रही है। युद्ध, महंगाई और आर्थिक अनिश्चितता का सीधा असर आम नागरिकों, खासकर कमजोर वर्गों पर पड़ता है। यह कौन नहीं जानता कि बेघर लोगों का जीवन अत्यंत कठिन और असुरक्षित होता है। उन्हें खुले आसमान के नीचे रहना पड़ता है, जहां सुरक्षा, स्वच्छता और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव होता है। कई लोग अस्थायी आश्रयों पर निर्भर रहते हैं, लेकिन वहां भी सीमित जगह और संसाधनों के कारण सभी को सुविधा नहीं मिल पाती। सरकार और सामाजिक संस्थाएं इस समस्या के समाधान के लिए प्रयासरत हैं, लेकिन चुनौतियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। इस हालात में केवल अस्थायी राहत उपाय पर्याप्त नहीं हैं। सस्ती आवास योजनाएं, रोजगार के बेहतर अवसर, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और मानसिक स्वास्थ्य समर्थन को मजबूत करना आवश्यक है। अमेरिका का यह परिदृश्य एक व्यापक संदेश देता है, केवल आर्थिक विकास किसी समाज की समृद्धि का मापदंड नहीं हो सकता। जब तक विकास के लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंचते, तब तक असमानता की खाई गहराती रहेगी। बेघर लोगों की बढ़ती संख्या इस बात का स्पष्ट संकेत है कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को अब अपने विकास मॉडल पर पुनर्विचार करना होगा। युद्ध की भाषा को त्यागकर सभी को साथ लेकर आगे बढ़ना होगा। अन्यथा, “अमेरिकन ड्रीम” केवल एक सपना बनकर रह जाएगा, जिसे हकीकत में बदलने का अवसर हर नागरिक को नहीं मिल पाएगा। ईएमएस / 04 मई 26