राष्ट्रीय
05-May-2026


पायलट ने युवा, जॉर्ज ने ईसाई और इमरान ने मुस्लिम मतदाताओं को साधा तिरुवनंतपुरम,(ईएमएस)। केरलम में चुनाव परिणाम आ चुके हैं। दक्षिणी राज्य में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ मोर्चे की लहर स्पष्ट दिखाई देने लगी है। सीपीएम के नेतृत्व वाले एलडीएफ ने केरलम को खो दिया, जो देश का एकमात्र वामपंथी राज्य था, जिससे वाम मुक्त भारत का संकेत मिला और दिलचस्प बात यह है कि यह जीत कांग्रेस की बदौलत मिली, न कि दक्षिणपंथी बीजेपी की। दशकों से केरलम राज्य की राजनीतिक गतिविधियां राजस्थान और हिमाचल प्रदेश की तरह ही चल रही यानी हर 5 साल में एक नई सरकार का गठन होता था। हालांकि, 2021 के चुनावों में निवर्तमान सीएम पिनारयी विजयन के नेतृत्व में यूडीएफ को दूसरा कार्यकाल मिला था। इससे कांग्रेस और उसके सहयोगियों को एलडीएफ के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर के और 5 साल मिल गए, जिसका उन्होंने भरपूर फायदा उठाया। पिछले 5 सालों में पिनारयी विजयन की लोकप्रियता भी काफी कम हुई, जिन्हें कई लोग केरलम में वामपंथ को पुनर्जीवित करने का श्रेय देते हैं। सोलर घोटाला, भ्रष्टाचार और मलयाली प्राइड को बचाने के लिए पर्याप्त प्रयास न करने जैसे आरोपों ने उन्हें बदनाम कर दिया। कांग्रेस ने एकजुट होकर चुनाव लड़ा। हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में आंतरिक कलह और गुटबाजी के कारण हार झेलने के बाद पार्टी उच्च कमान इस राज्य में भी इस समस्या से अवगत थी। इसलिए राहुल गांधी ने फैसला किया कि पार्टी सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ेगी और चुनाव से पहले किसी भी सीएम पद के उम्मीदवार की घोषणा नहीं की जाएगी। इसी तरह संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल, विपक्ष के नेता वीडी सतीशान, रमेश चेन्निथला और शशि थरूर जैसे दिग्गज नेता चुनाव प्रचार में एकजुट नजर आए और उनके बीच कोई सार्वजनिक कलह नहीं दिखी। इस सक्रिय नजरिए की उत्तर भारत के नेताओं ने आलोचना भी की, जिन्होंने सवाल उठाया कि हरियाणा, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे अन्य राज्यों में इस तरह की तत्परता क्यों नहीं दिखाई गई, जहां आंतरिक कलह ने पार्टी को भारी नुकसान पहुंचाया था। एफसीआरए विधेयक ने ईसाई मतदाताओं को बीजेपी से दूर कर दिया। मार्च में पेश किए गए फ़ॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन संशोधन विधेयक, 2026 ने केरलम विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ की भारी जीत में अहम भूमिका निभाई, क्योंकि इसने अल्पसंख्यक मतदाताओं को बीजेपी से दूर कर दिया। हालांकि विरोध के बाद बीजेपी ने संसद में विधेयक वापस ले लिया, लेकिन कांग्रेस नेताओं ने चर्च द्वारा संचालित संस्थानों पर विधेयक के प्रभाव को लेकर चिंताओं का फायदा उठाते हुए मध्य केरलम में ईसाई वोटों को एकजुट किया। इस बार कांग्रेस ने ईसाइयों पर भारी भरोसा जताया था, क्योंकि पार्टी ने 22 टिकट ईसाई उम्मीदवारों को दिए थे, जिनमें से 10 अकेले सिरो-मालाबार समुदाय को मिले थे। इन सभी कदमों ने बीजेपी के ईसाई मतदाताओं को अपने पाले में लाने के प्रयासों को विफल कर दिया और कांग्रेस को भारी बहुमत दिलाया। कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ ने राजनीतिक आधार फिर से पाने के लिए एक सुनियोजित ट्रोइका स्ट्रैटेजी अपनाई थी, जिसके तहत वरिष्ठ नेताओं सचिन पायलट, केजे जॉर्ज और इमरान प्रतापगढ़ी को प्रमुख मतदाता वर्गों में लक्षित संपर्क के लिए तैनात किया गया था। तीनों नेताओं को केरलम के विविध धार्मिक समुदायों और उच्च शिक्षित शहरी मतदाताओं से संपर्क साधने का काम सौंपा गया था, जो चुनावों से पहले मतदाताओं से अधिकतम जुड़ाव स्थापित करने के उद्देश्य से अपनाई गई खंडित रणनीति को दर्शाता है। जहां पायलट ने युवा संपर्क अभियान का नेतृत्व किया, वहीं कर्नाटक के कैबिनेट मंत्री के जे जॉर्ज का उद्देश्य ईसाई मतदाताओं को एकजुट करना था। इसी तरह अल्पसंख्यक नेता इमरान प्रतापगढ़ी को मुस्लिम मतदाताओं को कांग्रेस में वापस लाने का काम सौंपा गया था और तीनों ने इसी उद्देश्य से एक महीने से ज्यादा समय तक केरलम में काम किया। सिराज/ईएमएस 05मई26