लेख
05-May-2026
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के एक महत्वपूर्ण स्तंभ भारत निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न उठने लगे हैं। चुनाव परिणामों को लेकर राजनीतिक दलों, विशेषकर तृणमूल कांग्रेस द्वारा परिणाम स्वीकार नही किया गया है। इस बार का मामला केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा। आम जनता के बीच भी आयोग की विश्वसनीयता को लेकर संशय गहरा गया है। पिछले दो वर्षों में चुनाव आयुक्त की कार्य प्रणाली को लेकर जो विवाद सामने आ रहे हैं, उनमें सबसे प्रमुख विवाद “गोपनीयता” का है। चुनाव आयोग पहले सभी राजनैतिक दलों से परामर्श करके चुनाव की सारी व्यवस्था करता था। मतदाता सूची से लेकर मतदान तक की सभी जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध कराई जाती थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बल्कि जब चुनाव आयुक्त राजीव कुमार बने उसके बाद से यह व्यवस्थाएं बदल गईं। जिसके कारण चुनाव आयोग पर संदेह लगातार गहराता जा रहा है। मतदाता सूची, मतदान प्रतिशत और मतगणना से जुड़ी जानकारी को सार्वजनिक करने के स्थान पर गोपनीयता बरती जा रही है। उसने चुनाव आयोग की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। लोकतंत्र में सूचना का अधिकार नागरिकों का मूल अधिकार है। जब चुनाव जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में सभी जानकारी को गोपनीयता के दायरे में लाया जा रहा है तो संदेह स्वाभाविक रूप से जन्म लेता है। इसके साथ ही चुनाव आयोग द्वारा नियमों में बार-बार बदलाव किया जा रहा है। जिसका अधिकार चुनाव आयोग को न होकर संसद के पास है। तब यह संदेह और भी गहरा जाता है। चुनाव अधिसूचना जारी हो जाने के बाद जिस तरह से चुनाव आयोग की मनमानी शुरू हो जाती है जहां डबल इंजन की सरकार हैं उनके लिए अलग नियम जहां केंद्र सरकार से इतर विपक्षी दलों की सरकार हैं। वहां पर अधिकारियों की नियुक्तियां, एसआईआर को लेकर भी विवाद सामने आए हैं। चुनाव आयोग का दायित्व केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है, कि हर पक्ष को समान अवसर तथा चुनाव लड़ने के समय सभी के साथ बराबरी का निष्पक्षता के साथ व्यवहार हो। पश्चिम बंगाल चुनाव में भारी संख्या में लाखों की संख्या में अर्धसैनिक बलों की तैनाती इस बार गंभीर विवाद का विषय बना। भाजपा शासित राज्यों के अधिकारियों को बड़े पैमाने पर लगाया गया। सुरक्षा की दृष्टि से जिसे आवश्यक बताया गया। वहीं विपक्षी दलों द्वारा इसे “इच्छित परिणाम” की दिशा में चुनाव आयोग की मिलीभगत माना गया। भाजपा की शिकायतों पर त्वरित रूप से चुनाव आयोग द्वारा कार्रवाई की गई लेकिन विपक्षी दलों द्वारा चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन को लेकर जो शिकायती की गई उन पर चुनाव आयोग ने कोई संज्ञान नहीं लिया। इस बात का आरोप टीएमसी से लेकर सभी विपक्षी दलों द्वारा लगातार लगाया जा रहा है। महाराष्ट्र, हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ इत्यादि राज्यों के विधानसभा चुनाव और लोकसभा 2024 के चुनाव में भी राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव आयुक्त पर समय-समय पर गड़बड़ी किए जाने के सीधे आरोप लगाए। चुनाव आयोग ने ना तो इसकी कोई सफाई दी ना जांच कराई और ना ही विपक्ष को इसका कोई उपयुक्त जवाब दिया। अब ये मामले चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर आम जनता के मन को भी प्रभावित करने लगा है। क्या कारण है कि चुनाव आयोग सभी जानकारी को छिपाना और गोपनीय रखना चाहता है। इस मामले को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी उठाकर न्याय प्राप्त करने की चेष्टा की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह कहा गया की चुनाव आयोग को विशेष अधिकार प्राप्त हैं, ऐसी स्थिति में वह कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा। इस कारण अब यह मामला तूल पकड़ता चला जा रहा है। राजनीतिक दलों से उठकर अब यह मामला आम जनता तक पहुंचने लगा है। यह धारणा सही हो या नहीं, यदि जनता के मन में यह बैठ जाए कि चुनाव निष्पक्ष नहीं हुए तो इसकी बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया हो सकती है। यह लोकतंत्र के लिए अत्यंत खतरनाक संकेत है। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कानून का मामला सुप्रीम कोर्ट में पिछले दो वर्षों से लंबित है। इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक सुनवाई नहीं की है। पिछले 10 महीने से चुनाव आयोग और एसआईआर मामले की सुनवाई चल रही है, लेकिन इस पर भी अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं आया है। एसआईआर संवैधानिक है या नहीं, इसको लेकर अलग-अलग राय हैं। इसी बीच चुनाव होते जा रहे हैं। अभी तक 5 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से काटे गए हैं। इसका अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है। इसके बाद भी यदि सुप्रीम कोर्ट से न्याय नहीं मिल रहा है। उसको लेकर अब आम जनता के बीच में भी तीव्र प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। जब चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया ही विवादित हो। तो उनके निर्णयों की निष्पक्षता पर भी संदेह होना स्वाभाविक है। हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि चुनाव आयोग ने अतीत में कई जटिल परिस्थितियों में सफलतापूर्वक चुनाव कराए हैं और उसकी साख अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी रही है। वर्तमान परिस्थितियों मे चुनाव आयोग को पारदर्शिता बढ़ाना, चुनाव से संबंधित सभी जानकारी को सार्वजनिक करना, चुनाव प्रक्रिया को स्पष्ट और न्यायसंगत बनाना। चुनाव आयोग के साथ-साथ न्यायपालिका के लिए भी जरूरी हो गया है। संसद में चुनाव आयुक्त के खिलाफ यदि महाभियोग प्रस्ताव आ जाता है, तो यह बहुत गंभीर मामला है। यह अलग बात है कि दोनों सदनों ने महाभियोग प्रस्ताव को अस्वीकार्य कर दिया है। इससे मिलीभगत के जो आरोप लग रहे थे, वह खत्म नहीं हुए बल्कि यह माना जाने लगा कि चुनाव आयोग केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रहा है और उसे सरकार और एक राजनीतिक दल का संरक्षण मिला हुआ है। भारत में संविधान और लोकतंत्र के प्रति आस्था बनाए रखना है तो ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग को अपनी साख को फिर से मजबूत करना होगा। चुनाव आयोग केवल एक संस्था नहीं है, लोकतंत्र की आत्मा का प्रतिनिधित्व और नागरिक अधिकारों की स्वतंत्रता बनाए रखने का काम चुनाव आयोग करता है। उसकी निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं, तो यह एक संस्था का नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए एक बड़ा संकट बन जाता है। बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल इत्यादि पड़ोसी देशों में इसकी प्रतिक्रिया देखी जा चुकी है। समय की मांग है, आयोग चुनौतियों का सामना और जवाबदेही के साथ तय करे। जनता का विश्वास फिर से चुनाव आयोग पर बहाल हो सके। न्यायपालिका को भी अपनी जिम्मेदारी को समझाना पड़ेगा। पिछले 10 महीने में न्यायपालिका की जो भूमिका रही है, उसे देखते हुए यह माना जा रहा है, अप्रत्यक्ष समर्थन कहीं ना कहीं न्यायपालिका से भी चुनाव आयोग को मिल रहा है। यदि यह संदेश गया तो और भी खतरनाक होगा। समय रहते न्यायपालिका को सारी स्थितियों को स्पष्ट करना होगा। ईएमएस / 05 मई 26