राष्ट्रीय
06-May-2026
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बंगाल में वित्तीय चुनौतियों के बीच संतुलन की बड़ी परीक्षा कोलकाता,(ईएमएस)। पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐतिहासिक युग का अंत हुआ है। 15 वर्षों से सत्ता पर काबिज अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस को बेदखल कर भाजपा ने राज्य की कमान संभाल ली है। इस बड़े राजनीतिक उलटफेर के बाद अब प्रदेश की जनता और आर्थिक विशेषज्ञों की नजरें नई सरकार के उन वादों पर टिकी हैं, जो भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र संकल्प पत्र में किए थे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि कर्ज और सीमित संसाधनों के दबाव में दबी राज्य की अर्थव्यवस्था इन महत्वाकांक्षी योजनाओं का बोझ कैसे उठाएगी। भाजपा के संकल्प पत्र में किए गए वादों में सबसे प्रमुख महिलाओं और बेरोजगार युवाओं को हर महीने 3,000 रुपये की प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता देना है। इस योजना का उद्देश्य कमजोर वर्गों को आर्थिक स्थिरता प्रदान करना है, लेकिन इसका सीधा असर राज्य के खजाने पर पड़ेगा। इसके साथ ही, लंबे समय से लंबित सातवें वेतन आयोग को लागू करने और महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी का वादा सरकारी कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत तो है, लेकिन इससे राज्य के राजस्व व्यय में भारी वृद्धि होना तय है। वर्तमान वित्तीय आंकड़ों पर नजर डालें तो बंगाल की नई सरकार के लिए राह आसान नहीं दिखती। वित्त वर्ष 2024-25 में राज्यों का राजकोषीय घाटा उनके सकल राज्य घरेलू उत्पाद का 3.6 प्रतिशत रहा है। हालांकि, आगामी वर्षों में इसके घटकर 2.9 प्रतिशत तक आने का अनुमान है, जो वित्तीय अनुशासन की ओर इशारा करता है, लेकिन यह सुधार नए और बड़े खर्चों के लिए पर्याप्त गुंजाइश नहीं छोड़ता। राज्य की वित्तीय स्थिति में सबसे चिंताजनक पहलू कुल कर्ज का स्तर है, जो जीएसडीपी का लगभग 38 प्रतिशत बना हुआ है। यह उच्च स्तर दर्शाता है कि राज्य अपनी जरूरतों के लिए उधारी पर बहुत अधिक निर्भर है। इसके अलावा, राज्यों की अपनी कर आय उनकी कुल राजस्व प्राप्तियों का केवल 41 प्रतिशत ही है। यानी आधे से भी अधिक राजस्व के लिए केंद्र पर निर्भरता बनी हुई है। वर्तमान खर्च के ढांचे को देखें तो बजट का बड़ा हिस्सा राजस्व व्यय (वेतन, पेंशन और सब्सिडी) में चला जाता है, जबकि विकास कार्यों के लिए पूंजीगत व्यय केवल 4 प्रतिशत तक सीमित है। नई सरकार के सामने अब यह बड़ी चुनौती होगी कि वह अपने लोक-कल्याणकारी वादों को पूरा करने के साथ-साथ विकास परियोजनाओं के लिए धन कैसे जुटाती है। वेतन संशोधन और नकद सहायता योजनाओं के लागू होने से विकास कार्यों के लिए वित्तीय जगह और भी कम हो सकती है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि नई सरकार वित्तीय अनुशासन और जन-आकांक्षाओं के बीच कैसे तालमेल बिठाती है। वीरेंद्र/ईएमएस 06 मई 2026