राष्ट्रीय
07-May-2026
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नई दिल्ली (ईएमएस)। आम धारणा है कि समुद्र इसलिए नीला दिखता है क्योंकि वह आसमान की नीली परछाई को प्रतिबिंबित करता है। वैज्ञानिकों की माने तो यह धारणा गलत है। इसके पीछे प्रकाश के व्यवहार तथा पानी की अनूठी विशेषताओं से जुड़ी एक दिलचस्प वैज्ञानिक वजह छिपी है। यह प्रक्रिया उतनी सरल नहीं जितनी दिखती है, बल्कि इसमें भौतिकी के मूलभूत नियम शामिल हैं जो सूर्य के प्रकाश और जल के अणुओं की परस्पर क्रिया को नियंत्रित करते हैं। सूर्य की रोशनी हमें सफेद दिखती है, लेकिन असल में यह सात रंगों के स्पेक्ट्रम (लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, गहरा नीला और बैंगनी) से बनी होती है। इन सभी रंगों की तरंगदैर्ध्य (वेवलेंथ) अलग-अलग होती है। लाल रंग की तरंगदैर्ध्य सबसे लंबी होती है, जबकि नीले और बैंगनी रंग की तरंगदैर्ध्य सबसे छोटी होती है। यही तरंगदैर्ध्य का अंतर समुद्र के रंग को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब सूर्य की रोशनी समुद्र के पानी में प्रवेश करती है, तो पानी के अणु लंबी तरंगदैर्ध्य वाली रोशनी (जैसे लाल, नारंगी और पीली) को तेज़ी से सोख लेते हैं। ये रंग पानी में ज़्यादा गहराई में जाने से पहले ही लगभग समाप्त हो जाते हैं, क्योंकि उनकी ऊर्जा पानी के अणुओं द्वारा अवशोषित कर ली जाती है। इसके विपरीत, छोटी तरंगदैर्ध्य वाली नीली रोशनी पानी में ज़्यादा गहराई तक पहुँच पाती है और पानी के अणुओं तथा उसमें मौजूद छोटे कणों से टकराकर चारों तरफ बिखर जाती है (स्कैटर होती है)। यह बिखराव (स्कैटरिंग) नीले रंग को चारों दिशाओं में फैला देता है। इसी वजह से, जब हम समुद्र की सतह की ओर देखते हैं, तो हमारी आँखों तक ज़्यादातर नीली रोशनी ही पहुँचती है, जिसके परिणामस्वरूप समुद्र हमें नीला दिखाई देता है। जितना गहरा और साफ पानी होता है, उतना ही गहरा नीला रंग दिखता है, क्योंकि रोशनी को अवशोषित होने और बिखरने के लिए अधिक अवसर मिलते हैं। यह प्रक्रिया आसमान के नीले होने से कुछ मिलती-जुलती है, जहाँ वायुमंडल में मौजूद अणु नीली रोशनी को ज़्यादा बिखेरते हैं (रेले स्कैटरिंग)। लेकिन समुद्र के मामले में मुख्य वजह पानी द्वारा रंगों का चयनात्मक अवशोषण (सेलेक्टिव एब्जॉर्प्शन) है, न कि केवल परावर्तन। अगर पानी बहुत कम मात्रा में हो, जैसे गिलास में, तो वह रंगहीन दिखता है क्योंकि रोशनी पूरी तरह से गुज़र जाती है और रंग सोखने का मौका नहीं मिलता। लेकिन समुद्र जैसी पानी की मोटी परत में, रंग सोखने और बिखरने का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। हालांकि, समुद्र का रंग हर जगह एक समान नहीं होता। यदि पानी में प्लैंकटन, कीचड़, तलछट या अन्य कण ज़्यादा हों, तो रंग हरा, भूरा या यहाँ तक कि लाल भी दिख सकता है। ये अशुद्धियाँ प्रकाश के अवशोषण और बिखराव के पैटर्न को बदल देती हैं, जिससे समुद्र का रंग विविधतापूर्ण दिखाई देता है। सुदामा/ईएमएस 07 मई 2026