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07-May-2026
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अदालतों में लग सकती हैं सैकड़ों नई याचिकाएं नई दिल्ली,(ईएमएस)। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में धार्मिक प्रथाओं और धर्म से जुड़े मामलों को संवैधानिक अदालतों में चुनौती देने पर गहरी चिंता जाहिर की है। शीर्ष अदालत ने आगाह करते हुए कहा कि अगर लोग हर धार्मिक रिवाज पर सवाल उठाने लगे, तब इससे धर्म और सभ्यता पर गंभीर असर होगा तथा अदालतों में सैकड़ों नई याचिकाएं आ सकती हैं। यह अहम टिप्पणी नौ जजों की संविधान पीठ ने की, जो विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही है। इसमें केरल के सबरीमाला मंदिर और दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़े अहम केस भी शामिल हैं। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने जोर दिया कि भारतीय समाज में धर्म की जड़ें बहुत गहरी हैं, और यदि हर व्यक्ति धार्मिक प्रथाओं पर सवाल उठाना शुरू करेगा, तब इसका असर सामाजिक ताने-बाने पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने कहा कि मंदिर खुलने या बंद होने जैसे छोटे से छोटे मामले भी अदालतों में आने लगे है। जो कि अब चिंता का कारण है। जस्टिस एम.एम. सुंदरेश ने कहा कि इसतरह के विवादों को लगातार अनुमति देने से धर्मों में विभाजन हो सकता है और संवैधानिक अदालतों पर भी अनावश्यक दबाव बढ़ेगा। यह मामला दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़ा है, जहां 1986 में दायर जनहित याचिका ने 1962 के फैसले को चुनौती दी थी। इस फैसले ने उस बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ एक्सकम्युनिकेशन एक्ट, 1949 को रद्द किया था, जिसके तहत किसी सदस्य को समुदाय से बाहर करना गैरकानूनी था। 1962 के फैसले में कहा गया था कि धार्मिक आधार पर बहिष्कार, समुदाय के धार्मिक मामलों के प्रबंधन का हिस्सा है। सुधारवादी दाऊदी बोहरा समूह की ओर से वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने दलील दी कि यदि कोई प्रथा मौलिक अधिकारों पर नकारात्मक असर डालती है, तब उस संवैधानिक अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने सवाल उठाया कि धार्मिक प्रथाओं पर सवाल कहां और कैसे उठाए जाएं, क्या यह समुदाय के भीतर होना चाहिए, या राज्य या अदालतों को इसमें दखल देना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत की पहचान उसकी विविधता और सभ्यता से है, जिसमें धर्म एक स्थायी तत्व है, और इस तोड़ना उचित नहीं होगा। आशीष दुबे / 07 मई 2026