- झूठे भरोसे, लाखों की फीस देने के बाद बीएचएमस छात्रों का फूटा गुस्सा - साढ़े 7 साल की पढ़ाई, 15 लाख से ज्यादा खर्च, नतीजा सिफर - नहीं मिल पा रहा है परमानेंट रजिस्ट्रेशन, प्रबंधन और प्रशासन पर लगाए गंभीर आरोप बालाघाट (ईएमएस). एसएम देव होम्योपैथी कॉलेज के 37 छात्र आज खुद को नाम के डॉक्टर बता रहे हैं। साढ़े सात साल की लंबी पढ़ाई, लाखों रुपये खर्च और परीक्षाएं पास करने के बावजूद उन्हें स्थायी डिग्री और परमानेंट रजिस्ट्रेशन नहीं मिल पाया है। हालात यह हैं कि हाथ में मार्कशीट और प्रोविजनल डिग्री होने के बाद भी वे न तो प्रैक्टिस कर पा रहे हैं और न ही नौकरी के पात्र हैं। अब इन छात्रों ने आंदोलन का रास्ता अपनाने का फैसला कर लिया है। होम्योपैथी चिकित्सा के क्षेत्र में डॉक्टर बनने का सपना लेकर एसएम देव होम्योपैथी कॉलेज में दाखिला लेने वाले छात्रों का भविष्य आज अधर में लटका हुआ है। करीब साढ़े 7 साल का समय बीत जाने के बाद भी उन्हें स्थायी डिग्री नहीं मिल पाई है, जिससे उनका पूरा करियर संकट में आ गया है। छात्रों का कहना है कि उन्होंने पूरी पढ़ाई की, परीक्षाएं दीं और पास भी हुए। उनके पास मार्कशीट और प्रोविजनल डिग्री मौजूद है, लेकिन परमानेंट रजिस्ट्रेशन के अभाव में वे आधिकारिक रूप से डॉक्टर नहीं बन सके हैं। प्रबंधन और प्रशासन दोनों कटघरे में छात्रों ने कॉलेज प्रबंधन और संबंधित विश्वविद्यालय पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उन्हें शुरुआत से ही आश्वासन दिया गया कि कोर्स की मान्यता है और डिग्री समय पर मिल जाएगी, लेकिन अब तक यह वादा पूरा नहीं हुआ। लालबर्रा की एक छात्रा ने बताया कि विश्वविद्यालय स्तर पर उनका रजिस्ट्रेशन रुका हुआ है। जब भी कॉलेज से इस बारे में पूछा जाता है, तो आज-कल में डिग्री आ जाएगी कहकर टाल दिया जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि इस मामले में न्यायालय में केस चल रहा है, लेकिन अब तक 4 सुनवाई हो चुकी हैं और कॉलेज की ओर से वकील एक बार भी उपस्थित नहीं हुआ। लाखों खर्च, फिर भी बेरोजगारी छात्र मनीष बिसेन के अनुसार, 2017-18 से 2023 तक उन्होंने कॉलेज को पूरा समय दिया। इस दौरान साढ़े 4 साल का एकेडमिक कोर्स और 1 साल की इंटर्नशिप पूरी की, जबकि कोविड के कारण 2 साल और बर्बाद हो गए। इस तरह कुल साढ़े 7 साल का समय बीत चुका है। उन्होंने बताया कि कॉलेज फीस 8 से 10 लाख रुपये और रहने-खाने सहित कुल खर्च 15 से 16 लाख रुपये तक पहुंच चुका है। इसके बावजूद आज वे न तो सरकारी नौकरी के लिए आवेदन कर पा रहे हैं और न ही खुद का क्लिनिक खोल सकते हैं। 2018 में ही सामने आई थी सच्चाई छात्रों का दावा है कि वर्ष 2018 में ही उन्हें कॉलेज की मान्यता पर सवाल होने की जानकारी मिल गई थी, लेकिन तब भी प्रबंधन ने भरोसा दिलाया कि सब कुछ ठीक है और डिग्री जरूर मिलेगी। इसी भरोसे में उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। जनप्रतिनिधियों के दरवाजे खटखटाने को मजबूर अपनी समस्या के समाधान के लिए छात्र अब विधायक, सांसद और प्रशासनिक अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं। कलेक्टर से भी शिकायत की गई थी, जांच टीम भी आई, लेकिन आज तक कोई स्पष्ट समाधान सामने नहीं आया। भोपाल में बड़े आंदोलन की तैयारी 7 मई को मोती गार्डन में छात्रों की बैठक हुई, जिसमें भोपाल जाकर बड़े स्तर पर आंदोलन करने की रणनीति बनाई गई। छात्र अब प्रदेशभर के अन्य प्रभावित छात्रों का समर्थन जुटा रहे हैं, ताकि उनकी आवाज सरकार तक पहुंच सके। छात्रों का कहना है कि हमने डॉक्टर बनने का सपना देखा था, लेकिन आज हम सिर्फ कागजों में डॉक्टर हैं, यह दर्द उन 37 छात्रों का है, जिनका भविष्य सिस्टम की लापरवाही में फंस गया है। यदि जल्द समाधान नहीं हुआ, तो यह मामला प्रदेश स्तर का बड़ा आंदोलन बन सकता है। भानेश साकुरे / 07 मई 2026