तमिलनाडु में चुनाव परिणाम आने के बाद उत्पन्न राजनीतिक स्थिति ने एक बार फिर भारतीय लोकतंत्र में राज्यपाल की भूमिका को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है। पहली बार चुनाव मैदान में उतरी अभिनेता से नेता बने जोसेफ विजय की पार्टी ने 108 सीटें जीतकर राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। इसके साथ ही सरकार बनाने का दावा विजय राज्यपाल के सम्मुख कर चुके हैं। कांग्रेस के समर्थन के बाद यह संख्या 113 तक पहुंच गई। बहुमत के लिए 118 विधायकों की आवश्यकता है। इसके बावजूद राज्यपाल द्वारा सरकार गठन के लिए आमंत्रित न करना केवल राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि संवैधानिक परंपराओं और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन गया है। भारतीय संविधान में राज्यपाल को एक संवैधानिक प्रमुख माना गया है, न कि राजनीतिक निर्णायक। संसदीय लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यही है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की इच्छा सर्वोपरि होगी। जब किसी दल को स्पष्ट बहुमत न मिले, तब सबसे बड़े दल या गठबंधन को सरकार बनाने का अवसर देना एक स्थापित संवैधानिक परंपरा बन चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐतिहासिक फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि बहुमत का परीक्षण विधानसभा के भीतर होना चाहिए, राजभवन में नहीं। कर्नाटक, महाराष्ट्र, गोवा और उत्तराखंड जैसे मामलों में न्यायपालिका ने बार-बार यही सिद्धांत दोहराया है। वर्तमान में तमिलनाडु का मामला इसलिए अधिक गंभीर माना जा रहा है क्योंकि चुनाव नतीजों के मुताबिक दूसरे और तीसरे नंबर पर रहने वाली अन्य पार्टियों ने सरकार बनाने का दावा ही प्रस्तुत नहीं किया है। ऐसी स्थिति में सबसे बड़े दल को शपथ ग्रहण का अवसर न देना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अनावश्यक रूप से बाधित करने जैसा प्रतीत होता है। राज्यपाल यदि यह कहें कि पहले पूर्ण बहुमत साबित करें, तभी शपथ दिलाई जाएगी, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि फिर विधानसभा में बहुमत परीक्षण की परंपरा का महत्व क्या रह जाएगा? पिछले कुछ वर्षों में देश के कई राज्यों में राज्यपाल और निर्वाचित सरकारों के बीच टकराव बढ़ा है। विपक्ष शासित राज्यों में विधेयकों को महीनों और कभी-कभी वर्षों तक लंबित रखना, सरकारों के प्रशासनिक निर्णयों में हस्तक्षेप तथा राजनीतिक बयानबाजी ने इस पद की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। संविधान निर्माताओं ने राज्यपाल पद की कल्पना केंद्र और राज्य के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए की थी, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में यह पद कई बार राजनीतिक संघर्ष का केंद्र बनता दिखाई देता है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यदि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग न्यायालयों द्वारा स्थापित सिद्धांतों की भी अनदेखी करने लगें, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का विश्वास कमजोर होने लगता है। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने से नहीं चलता; वह संवैधानिक मर्यादा, संस्थागत निष्पक्षता और स्थापित परंपराओं के सम्मान पर टिकता है। यदि निर्वाचित सरकारों के गठन में भी व्यक्तिगत विवेक या राजनीतिक झुकाव हावी होने लगे, तो यह संघीय ढांचे के लिए खतरे का संकेत होगा। ऐसे समय में न्यायपालिका की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट को यह स्पष्ट करना होगा कि राज्यपाल का विवेक सीमित है और वह संविधान से ऊपर नहीं हो सकता। लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के जनादेश की होती है। उस जनादेश का सम्मान करना ही संविधान की वास्तविक आत्मा है। ईएमएस / 08 मई 26