लेख
08-May-2026
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भारतीय लोकतंत्र में चुनाव परिणाम केवल सीटों की गणना नहीं होते, वे जनादेश की संवैधानिक अभिव्यक्ति होते हैं। लेकिन जब किसी विधानसभा में स्पष्ट बहुमत नहीं आता, तब सबसे बड़ा प्रश्न यह खड़ा होता है कि सरकार बनाने के लिए किसे आमंत्रित किया जाए — सबसे बड़ी पार्टी को, पूर्व गठबंधन को, या उस समूह को जो बहुमत का दावा प्रस्तुत कर रहा हो? पिछले तीन दशकों में भारत ने ऐसे अनेक राजनीतिक संकट देखे हैं, जहाँ राजभवन, न्यायपालिका और राजनीतिक दल आमने-सामने खड़े दिखाई दिए। इन परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट ने धीरे-धीरे एक स्पष्ट संवैधानिक सिद्धांत विकसित किया — “बहुमत का परीक्षण सदन के भीतर होगा, न कि राजभवन की धारणाओं में।” यह सिद्धांत केवल तकनीकी संवैधानिक व्याख्या नहीं, बल्कि भारतीय संसदीय लोकतंत्र की आत्मा है। सबसे बड़ी पार्टी बनाम बहुमत का दावा भारतीय संविधान में कहीं भी यह नहीं लिखा कि “सबसे बड़ी पार्टी” को स्वतः सरकार बनाने का अधिकार होगा। संविधान का वास्तविक उद्देश्य स्थिर और उत्तरदायी सरकार सुनिश्चित करना है। इसलिए यदि कोई गठबंधन या समूह सदन में बहुमत साबित करने की स्थिति में है, तो मात्र इस आधार पर उसे नकारा नहीं जा सकता कि वह अकेली सबसे बड़ी पार्टी नहीं है।हालांकि यह भी ऐतिहासिक रूप से सत्य है कि सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने का न्योता देकर उसे बहुमत सिद्ध करने का मौका दिया जाता रहा है।अटलविहारी बाजपेयी को तो लगभग 100 सीटों की कमी के बावजूद सरकार बनाने का मौका इसी आधार पर दिया गया था कि वह सबसे बड़ी पार्टी थी।बहुमत सिद्ध न कर पाने पर 13दिन में उनकी सरकार गिर गई थी। गोवा में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी, लेकिन भाजपा गठबंधन ने बहुमत समर्थन प्रस्तुत कर दिया। राज्यपाल ने गठबंधन को आमंत्रित किया और सुप्रीम कोर्ट ने शीघ्र फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया। कर्नाटक में भी सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भाजपा पूर्ण बहुमत से दूर थी, जबकि कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन ने संयुक्त समर्थन का दावा पेश किया। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि संवैधानिक नैतिकता का अर्थ केवल अंकगणित नहीं, बल्कि पारदर्शी बहुमत परीक्षण है। एस.आर. बोम्मई विरुद्ध भारतीय संघ भारतीय संवैधानिक इतिहास का मील का पत्थर है। इस फैसले ने केंद्र और राज्यों के संबंधों, राष्ट्रपति शासन और बहुमत परीक्षण की सीमाएँ तय कीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि: किसी सरकार का बहुमत राजभवन में तय नहीं किया जा सकता, निर्वाचित सरकार को हटाने का आधार केवल राजनीतिक अनुमान नहीं हो सकता,अंतिम निर्णय विधानसभा के पटल पर ही होगा। इस फैसले ने राज्यपाल की भूमिका को “संवैधानिक मध्यस्थ” तक सीमित करने का प्रयास किया। हालाँकि व्यवहार में यह प्रश्न आज भी विवादास्पद बना हुआ है कि क्या राज्यपाल वास्तव में निष्पक्ष संवैधानिक पदाधिकारी की तरह कार्य करते हैं या कभी-कभी राजनीतिक प्रभावों के केंद्र बन जाते हैं। फ्लोर टेस्ट: न्यायपालिका का लोकतांत्रिक हथियार भारत की न्यायपालिका ने पिछले वर्षों में फ्लोर टेस्ट को लोकतांत्रिक वैधता का सबसे प्रभावी साधन बनाया है। जगदंबिका पाल.से लेकर ,महाराष्ट्र.सरकार और शिवराज सिंह चौहान तक अदालतों ने यही कहा कि: यदि बहुमत पर संदेह है, तो समाधान केवल फ्लोर टेस्ट है। यह सिद्धांत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह राजनीतिक सौदेबाजी, बंद कमरों की रणनीति और राजभवन आधारित निर्णयों की जगह सार्वजनिक लोकतांत्रिक परीक्षण को प्राथमिकता देता है। *संवैधानिक नैतिकता बनाम राजनीतिक अवसरवाद* भारतीय राजनीति में अक्सर “संवैधानिक प्रक्रिया” और “संवैधानिक नैतिकता” के बीच अंतर दिखाई देता है। तकनीकी रूप से कोई भी दल समर्थन जुटाकर सरकार बना सकता है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या वह जनादेश की मूल भावना का सम्मान करता है? यहीं पर राज्यपाल की भूमिका सबसे अधिक विवादित होती है। किसे पहले बुलाया जाए? कितना समय दिया जाए? क्या रातोंरात शपथ दिलाना उचित है? क्या लंबा समय खरीद-फरोख्त को बढ़ावा देता है? इन प्रश्नों पर सुप्रीम कोर्ट ने कई बार हस्तक्षेप किया है। विशेषकर कर्नाटक और महाराष्ट्र मामलों में अदालत ने अत्यंत शीघ्र फ्लोर टेस्ट कराकर यह संदेश दिया कि लोकतंत्र को अनिश्चितता में नहीं रखा जा सकता। तमिलनाडु जैसी परिस्थितियों में संवैधानिक रास्ता यदि किसी राज्य — जैसे तामिलनाडु में त्रिशंकु स्थिति बने, तो संवैधानिक दृष्टि से सबसे उचित मार्ग होगा: सभी दावेदारों से समर्थन सूची प्राप्त कर उस पक्ष को अवसर देना जो बहुमत साबित करने की अधिक संभावना रखता हो, सीमित समय में फ्लोर टेस्ट कराना, और पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाए रखना। लोकतंत्र का उद्देश्य केवल सरकार बनाना नहीं, बल्कि जनादेश की विश्वसनीय रक्षा करना है। यदि निर्वाचित विधानसभा होने के बावजूद लंबे समय तक यथास्थिति बनाए रखी जाती है, तो वह लोकतांत्रिक भावना के विपरीत माना ही जा सकता है। भारतीय लोकतंत्र ने पिछले वर्षों में यह सीखा है कि सत्ता का वास्तविक परीक्षण अदालतों, प्रेस कॉन्फ्रेंसों या राजभवनों में नहीं, बल्कि विधानसभा के सदन में होता है। सबसे बड़ी पार्टी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण तत्व हो सकती है, लेकिन अंतिम कसौटी वही है जो संविधान की संसदीय आत्मा निर्धारित करती है — “जिसके पास सदन का विश्वास हो, वही सरकार चलाए।” और यही कारण है कि भारतीय न्यायपालिका ने बार-बार फ्लोर टेस्ट को लोकतंत्र का सबसे निष्पक्ष और संवैधानिक उपाय माना है। तामिलनाडु संकट को महासंकट बनाने से अधिक प्रासंगिक यही होगा कि सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का मौका देकर फ्लोर टेस्टमें आगे बढ़ने का अवसर दे। (लेखक स्वतंत्र विश्लेषक है) ईएमएस / 08 मई 26