पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का एक लंबा और खूनी इतिहास रहा है, जो दशकों से चला आ रहा है।पश्चिम बंगाल... एक ऐसा राज्य जहां सियासी दुश्मनों को हराया नहीं, बल्कि खत्म कर दिया जाता है। यहां पार्टियां बदलती हैं, सरकारें बदलती हैं, लेकिन हिंसा की राजनीति का तरीका नहीं बदलता। बंगाल की शान, उसका गौरवशाली इतिहास और बौद्धिक संस्कृति, इन सबको 34 साल के कम्युनिस्ट शासन की खूनी सियासत ने धुंधला कर दिया। गांव से लेकर कोलकाता के सत्ता के गलियारों तक, पार्टी ही सरकार थी और सरकार ही पार्टी। इसी कैडर कल्चर से सियासी दुश्मनी ने जन्म लिया। वोट कौन किसे देगा, ये लोग नहीं, पार्टी तय करती थी। एक पूरी पीढ़ी तक राज करने वाली लेफ्ट पार्टियों ने पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा की नींव डाल दी।गांवों में पड़ोस के घरों से लेकर कोलकाता की सड़कों तक, राजनीतिक विरोधियों को हिंसक तरीके से कुचलना एक संस्कृति बन गई। लेफ्ट पार्टियों ने यह सब सिर्फ इसलिए किया क्योंकि वे किसी भी कीमत पर सत्ता में बने रहना चाहते थे। 34 साल के कम्युनिस्ट राज में 20,000 से ज़्यादा राजनीतिक हत्याएं हुईं और अनगिनत रेप हुए। कर्नाटक में बैठकर वहां हुए इस कुशासन का अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है। खूनी राजनीति के बीच एक उम्मीद बनकर उभरीं ममता बनर्जी। लेफ्ट की हिंसक राजनीति को हराकर सत्ता में तो आईं, लेकिन अपनी कुर्सी बचाने के लिए उन्होंने भी वही रास्ता अपना लिया। बंगाल की टीएमसी में कार्यकर्ता कितने थे पता नहीं, पर गुंडों की कोई कमी नहीं थी। 2018 का पंचायत चुनाव हो, 2021 के चुनाव के बाद की हिंसा हो, या 2023 के पंचायत चुनाव के बाद का खून-खराबा में 60 लोगों की मौत यह सिलसिला जारी है । विरोधी पार्टियों के दफ्तरों में आग लगाना, लोगों के घरों में घुसकर टीएमसी को वोट देने की धमकी देना मारपीट ध्रुवीकरण बंगाल में आम बात हो गई। गांवों में टीएमसी का विरोध करने वालों के पास दो ही रास्ते थे - या तो गांव छोड़ दो, या टीएमसी को वोट दो। टीएमसी का विरोध करने वालों को जहां-तहां पीटा गया, झूठे केसों में जेल में डाल दिया गया। जिन्होंने विरोध किया, उन्हें खत्म कर दिया गया और उनके घर की महिलाओं पर अत्याचार किए गए। यहां तक कि ममता बनर्जी के खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों को भी नहीं बख्शा गया। आरोप है कि ममता सरकार के राज में 300 से ज़्यादा राजनीतिक हत्याएं हुईं, जबकि रेप के मामलों का तो कोई हिसाब ही नहीं। कई महिलाओं ने तो इज्जत के डर से पुलिस स्टेशन का मुंह तक नहीं देखा। उन्हें यह भी भरोसा नहीं था कि अगर वे शिकायत करने गईं तो सुरक्षित घर लौट पाएंगी। 2021 तक टीएमसी की खूनी राजनीति एक स्तर पर थी, लेकिन उसके बाद के हालात और भी भयानक हो गए। थोक में वोट पाने के लिए मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति, अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए रेड कार्पेट बिछाना, और सिर्फ इसलिए हिंदुओं को निशाना बनाना क्योंकि उन्होंने बीजेपी का समर्थन किया था, यह सब टीएमसी के दबंगई और गुंडई के जरिए चल रहा था। बंगाल के लोगों के सब्र का बांध टूटने में 15 साल लग गए। इसका नतीजा ये हुआ कि 2011 में एक भी सीट न जीत पाने वाली बीजेपी, 2016 में 3 सीटों पर सिमटने वाली बीजेपी, आज 77 से 206 सीटें जीतने के स्तर पर आ गई है। उम्मीद है कि कम्युनिस्टों द्वारा शुरू की गई और टीएमसी द्वारा आगे बढ़ाई गई इस खूनी राजनीति को बीजेपी आगे नहीं बढ़ाएगी। बंगाल के लिए बीजेपी का यही सबसे बड़ा अच्छा काम होगा। क्योंकि जो लोग पहले लेफ्ट और टीएमसी के कैडर थे, वही आज बीजेपी का झंडा उठा रहे हैं। पार्टियां और सरकारें बदल गईं, लेकिन हिंसा की जहरीली सियासी संस्कृति अब यहीं खत्म होनी चाहिए। राज्य में सत्ता परिवर्तन के बावजूद, चुनावी और राजनीतिक हिंसा का सिलसिला थमा नहीं है, चाहे वह वामपंथी शासन सीपीएम का दौर हो या वर्तमान तृणमूल कांग्रेस का दौर।आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल की खूनी राजनीति के बंगाल में सियासी हिंसा का दौर 1959 के खाद्य आंदोलन से शुरू होकर आज छह दशक बाद भी जारी है। एनसीआरबी की 2021 की रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल में भारत में सबसे अधिक राजनीतिक हत्याएं दर्ज की गई हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव, 2018 के पंचायत चुनाव और 2013 के पंचायत चुनावों के दौरान राज्य में व्यापक हिंसा और हत्याएं देखी गईं। ताज़ा घटना क्रम में बीजेपी के शुभेंदु अधिकारी के निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की हत्या सहित चुनाव बाद हिंसा की घटनाओं ने सियासी माहौल को गरमा दिया है। पश्चिम बंगाल में चुनाव नतीजों के सामने आने के बाद बुधवार (6 मई) देर रात शुभेंदु अधिकारी के पीए चंद्रनाथ रथ की हत्या से हड़कंप मच गया है. अब तक की जांच में सामने आया है कि हत्या में इस्तेमाल की गई गाड़ी पर फर्जी नंबर प्लेट लगी थी. गोली लगने के बाद चंद्रनाथ रथ को विवासिटी हॉस्पिटल लाया गया था, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम के बाद ये आशंका ज़ाहिर की जा रही थी कि हिंसक घटनाएं हो सकती हैं.पश्चिम बंगाल में चुनाव परिणाम आने के बाद मंगलवार और बुधवार को हिंसा की कई घटनाएं सामने आई हैं. भाजपा और टीएमसी के पार्टी प्रतिनिधियों ने दावा किया कि पिछले 24 घंटों में पूरे पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हुई कथित झड़पों में चार लोगों की मौत हो गई. एचटी की रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा के एक पार्टी प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि जहां उत्तरी 24 परगना के न्यू टाउन और हावड़ा के उदय नारायणपुर में भाजपा के दो कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई. वहीं टीएमसी ने कहा कि कोलकाता के बेलेघाटा और बीरभूम के नानूर में उसके दो सदस्यों की हत्या हुई है. उधर पश्चिम बंगाल में भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने अपने पीए निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की गोली मारकर की गई हत्या को एक सुनियोजित साजिश और कोल्ड-ब्लडेड मर्डर करार दिया है। यह घटना 6 मई 2026 की रात को मध्यमग्राम में हुई, जब वह अपने घर लौट रहे थे। शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि यह एक 100% पूर्वनियोजित मर्डर है। हत्यारों ने 2-3 दिनों तक रेकी की थी और योजना के तहत इस घटना को अंजाम दिया।शुभेंदु अधिकारी ने आरोप लगाया कि उनकी हत्या इसलिए की गई क्योंकि वह मेरे पीए थे। उन्होंने इसे भवानीपुर में ममता बनर्जी की हार का बदला भी बताया।शुभेंदु ने इस हत्या को पश्चिम बंगाल में जारी 15 साल के महाजंगल राज का नतीजा बताया और कहा कि वे बंगाल से गुंडों का सफाया करेंगे। उन्होंने कहा कि दिल्ली से नेतृत्व ने इस घटना की जानकारी ली है और वे लगातार संपर्क में हैं। राज्य में तोड़फोड़ और हिंसा की कई ख़बरें आने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने बयान जारी कर आरोप लगाया था कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लोग अपनी पहचान बदलकर ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं और इन्हें बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. हिंसा की घटनाओं के बाद चुनाव आयोग ने दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के आदेश दिए हैं।हिंसा में शामिल दलों में तृणमूल कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस शामिल हैं, जो राज्य में वर्चस्व के लिए अक्सर संघर्षरत रहते हैं। सवाल यह है कि पिछले पांच दशक में पश्चिमी बंगाल में ऐसी राजनीतिक संस्कृति पैदा की गई है जिसमंे हिंसा दबंगई संप्रदायवाद तुष्टिकरण और कदाचार का बोलबाला है क्या आने वाले समय में भाजपा सरकार इस अपराधिक अराजकता पर काबू पाकर राज्य में अमन चैन स्थापित करने में सफल होगी या खून-खराबे की सियासत इसी तरह राज्य की राजनीति पर एक बदनुमा दाग बनी रहेगी। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं पिछले 38 वर्ष से लेखन और पत्रकारिता से जुड़े हैं) ईएमएस / 09 मई 26