जब मस्तिष्क का जब दसवां भाग भी सही तरह से मनुष्य यूज नहीं कर रहा रहा।तो उसका एक मात्र कारण है आत्मज्ञान का अभाव। ध्यान की प्रगाढ़ता से मस्तिष्क तंत्र अत्यधिक सक्रिय हो जाते हैं। ब्रह्म तेज से मस्तिष्क की सभी तंत्रिकाएं सक्रिय हो जाती हैं। इसलिए ध्यान में बैठना चाहिए। ब्रह्म प्रकाश से बहुत से तंत्रिकाएं सक्रिय हो जाती हैं। सारे अलग-अलग प्राणीयो के झुंड में से एक एक प्राणी को थोड़ा दुर लेजाकर छोड़ दो तो समझ लेना वो वहां ही जायेगा जहां उनकी जात के प्राणी हो, इससे सिख मिलता है कि अवश्य हमें भी अपने ही साथी जनों के साथ रहना चाहिए अन्यथा दुसरे तो घेराव बना कर तोड़-मरोड़ देंगे मीराबाई ने जो अपने गुरु से दीक्षा ली है वो श्री राम नाम की ली है संत शिरोमणि रविदास जी से ली है रविदास जी श्री रामानंद जी महाराज के कृपा पात्र शिष्य हैं ! - नींद में सुधार: कुछ शोध बताते हैं कि शांत, सुकून देने वाला भगवान राम का ध्यान नींद की गुणवत्ता में सुधार कर सकता है. ! रोग प्रतिरोधक क्षमता: नियमित रूप से भगवान राम के ध्यान से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी मजबूत हो सकती है ! संक्षेप में, भगवान राम की दया और करुणामई कार्य को ध्यान कर मस्तिष्क एक सुकून और जिस चीज में मोह का अनुभव करता है वो भगवान राम की त्याग की भावनाओं, यादों और से शारीरिक प्रतिक्रियाओं को एक साथ प्रभावित करता है, जिससे समग्र मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है ! अगर आप अपने शरीर को मज़बूत बनाना चाहते हैं, तो जिम ना जाकर पहले मस्तिष्क को गलत विचारसे मुक़्त हो जाएँ। अगर आप अपने दिमाग़ की कसरत करना चाहते हैं, तो राम का भजन और संगीत सुनें। बहुत कम चीजें हैं जो रामरस आपके मस्तिष्क को उत्तेजित करती हैं। अगर आप उम्र बढ़ने की प्रक्रिया के दौरान अपने मस्तिष्क को सक्रिय रखना चाहते हैं, तो भगवान राम का शान्ति मन से ध्यान करें और चुप रहें उनपर छोड़ दीजिए वो जो करेंगे क़ोई और नहीं कर सकता है क्योंकि सृष्टि को उसी ने रचना की है राम नाम का ध्यान करने से चिंता, रक्तचाप और दर्द कम हो सकता है, साथ ही नींद की गुणवत्ता, मनोदशा, मानसिक सतर्कता और स्मृति में सुधार हो सकता है। नई वायु तत्व और मन - छप चुकी है ।वायु हमारा जीवन है । सांस के बिना हम 5 मिनट से ज्यादा जीवित नहीं रह सकते । यह पुस्तक आप को जीवन में हर प्रकार की सफलता दिलाएगी । आप का जीवन महत्वपूर्ण बन जाएगा । इस प्रकार सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, परमानंद स्वरूप, अविनाशी, करुणा वरूणालय ,कृपा सिंधु ,देखने और व्यवहार में सर्वांग सुंदर देवता उपासना का विज्ञान यही है की साधना का जीवन क्रम क्रम से कर्म, कारण, वासना ,और अहम एक अद्वितीय सच्चिदानंद ब्रह्म के प्रति समर्पित हो जाए ।काल क्रम से, महापुरुषों की कृपा से, अथवा वासनाक्षय से ,जब उसे उस ब्रह्म तत्व की प्राप्ति की जिज्ञासा हो जाएगी, तब परोक्ष देवता के सभी गुना का जो वास्तव में सच्चिदानंद के विलास हैं, समन्वय आत्मा के परमार्थ स्वरूप में उपलब्ध हो जाएगा, तत और त्वम की एकता के बोध से, -भगवान राम तत्व ज्ञा न प्राप्त किया जा सकता , जो कारक,फल रूप द्वैत प्रपंच का अपमर्दन हो जाता है। इसलिए बाद में तो किसी आरोप और उपासना की आवश्यकता ही नहीं है ।पहले करो तो ठीक है, जब तक की सत्यप्रतिज्ञत्व, अहिंसकत्व, एवं निष्कामत्व, स्व प्रतिष्ठित ना हो जाए ।राम जड़ ध्यान के संबंध में अस्तेय होता है- चोरी न करना, जो जड़ वस्तु को अपने लिए आवश्यक और सुख रूप समझेगा, वही जड़ वस्तु की चोरी करेगा। अतःचिद् भाव का संबंध है अस्तेय का और अपरिग्रह का ज्ञान राम से प्राप्त होता है । इसी प्रकार सद्भाव के साथ संबंध है सत्य और अहिंसा का ।आनंद भाव का संबंध है ब्रह्मचर्य का। काम स्वब्रह्मचर्य भंग प्रधान है और संग्रह परिग्रह वह अन्य वस्तु संग्रह प्रधान है और दोनों आनंद के विवर्त हैं। तत्व ज्ञान के लिए भगवान राम की उपासना करेंगे तो यह संभव है। एकत्व ज्ञान से निवृत हुआ मिथ्या द्वैतज्ञान का फिर संभव नहीं है जिससे कि ब्रह्म उपासना विधि का अंग प्राप्त हो। यह पीस ब्रह्म सूत्र से लिया गया है। एक दिन, मीरा ने भोजराज से कहा,आपकी आज्ञा हो तो एक निवेदन करूँ। क्यों नहीं? फरमाइए। भोजराज ने अति विनम्रता से कहा। मेड़ते में तो संत आते ही रहते थे। वहाँ सत्संग मिला करता था। प्रभु के प्रेमियों के मुख से झरती उनकी रूप-गुण-सुधा के पानसे सुख प्राप्त होता है, वह जोशीजी के सुख से पुराण कथा सुनने में नहीं मिलता।यहाँ सत्संग का भाव मुझे सदा अनुभव होता है। भोजराज गम्भीर हो गये-यहाँ महलो में तो संतो के प्रवेश की आज्ञा नहीं है। हाँ, किले में संत महात्मा आते ही रहते है,किन्तु आपका बाहर पधारना कैसे हो सकता है ? सत्संग बिना तो प्राण तृषा (प्यास) से मर जाते है। मीरा ने उदास स्वर में कहा। ऐसा करते है, कि कुम्भ श्याम के मंदिर के पास एक और मंदिर बनवा दे। वहाँ आप नित्य दर्शन के लिए पधारा करें। मैं भी प्रयत्न करूँगा कि गढ़ में आने वाले संत वहाँ मंदिर में पहुँचे। इस प्रकार मैं भी संत दर्शन करके लाभ ले पाऊंगा और थोडा बहुत ज्ञान मुझे भी मिलेगा। जैसा आप उचित समझें -मीरा ने प्रसन्नता से कहा। महाराणा (मीरा के ससुर) का आदेश मिलते ही मंदिर बनना आरंभ हो गया। अन्त: पुर में मंदिर का निर्माण चर्चा का विषय बन गया महल में स्थान का संकोच था क्या? यह बाहर मंदिर क्यूँ बन रहा है? अब पूजा और गाना-बजाना बाहर खुले में होगा ? सिसौदियों का विजय ध्वज तो फहरा ही रहा है. अब भक्ति का ध्वज फहराने के लिए यह भक्ति स्तम्भ बन रहा है। जितने मुहँ उतनी बातें। मंदिर बना और शुभ मुहूर्त में प्राण-प्रतिष्ठा हुई। धीरे धीरे, सत्संग की धारा बह चली। उसके साथ ही साथ मीरा का यश भी शीत की सुनहरी धूप-सा सुहावना हो कर फैलने लगा। मीरा के मंदिर पधारने पर उसके भजन और उसकी ज्ञान वार्ता सुनने के लिए भक्तो संतो का मेला लगने लगा। बाहर से आने वाले संतो के भोजन, आवास और आवश्यकता की व्यवस्था भोजराज की आज्ञा से जोशीजी करते। गुप्तचरों से मन्दिर में होने वाली सब गतिविधियों की बातें महाराणा बड़े चाव से सुनते । कभी कभी वे सोचते - बड़ा होना भी कितना दुखदायी है ? यदि मैं महाराणा याँ मीरा का ससुर न होता , मात्र कोई साधारण जन होता तो सबके बीच बैठकर सत्संग -सुधा का मैं भी निसंकोच पान करता । मैं तो ऐसा भाग्यहीन हूं कि अगर मैं वेश भी बदलूँ तो पहचान लिया जाऊँगा । जैसे जैसे बाहर मीरा का यश विस्तार पाने लगा , राजकुल की स्त्री -समाज उनकी निन्दा में उतना ही मुखर हो उठा । किन्तु मीरा इन सब बातों से बेखबर अपने पथ पर दृढ़तापूर्वक पग धरते हुये बढ़ती जा रही थी। उन्हें ज्ञात होता भी तो कैसे ? मीराबाई का विवाह महाराणा सांगा के पुत्र भोजराज से कर दिया गया। देवताओं ने ऋषियों से कहा कि भगवान राम ही रावण के अत्याचारों से मुक्ति दिला सकते हैं। बाद में मीरा के भक्ती से भोजराज सचमुच उनकी ढाल बन गये थे परिवार के क्रोध और अपवाद के भाले वे अपनी छाती पर झेल लेते ।भोजराज और मीराबाई के बीच मित्रता और समझ का संबंध था, भोजराज मीराबाई की काव्य प्रतिभा की सराहना करते थे और महल परिसर में भगवान कृष्ण का मंदिर बनवाने की उनकी इच्छा को पूरा करते थे। .../ 10 मई /2026