लेख
10-May-2026
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वर्तमान तमिलनाडु की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव आया है। दशकों से चले आ रहे द्रविड़ राजनीति के दो पार्टियां द्रविड़ मुनेत्र कङगम (डीएमके) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कङगम (एआईएडीएमके) के वर्चस्व को पीछे छोङते हुए अभिनेता से नेता बने जोसेफ विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कङगम (टीवीके) ने 234 सदस्यीय विधानसभा में 107 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में अपनी जगह बनाई है। तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर ने तमिलगा वेट्री कङगम (टीवीके) पार्टी के अध्यक्ष जोसेफ विजय द्वारा सरकार बनाने के दावे को खारिज कर दिया था।जबकि टीवीके के संस्थापक जोसेफ विजय राज्यपाल अर्लेकर से दो बार मुलाकात कर सरकार बनाने का निमंत्रण देने का अनुरोध किया था। जोसेफ विजय को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने में राज्यपाल की देरी को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की गई।यह सर्वविदित है कि संविधान द्वारा शासित संसदीय लोकतंत्र में, किसी राजनीतिक दल या गठबंधन को बहुमत प्राप्त है या नहीं, यह प्रश्न केवल सदन के पटल पर ही निर्धारित किया जा सकता है। दूसरी ओर डीएमके और एआईएडीएमके के बीच वार्ता और एडप्पाडी पलानीस्वामी के नेतृत्व में सरकार बनाने के प्रयासों की खबरें भी आई जो जनादेश के विरुद्ध था। तमिलनाडु में अंदरखाने राष्ट्रपति शासन लगाने की चर्चा होने लगा था। तमिलनाडु में विजय की सरकार को कांग्रेस, लेफ्ट और वीसीके ने अपना समर्थन दिया है। आईयूएमएल ने भी टीवीके को बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा की है।तामिलनाडु में सरकार गठन के लिए 118 विधायकों का समर्थन चाहिए था जो अब 121 विधायकों का समर्थन मिल गया है। इसके बाद टीवीके की सरकार बनने का रास्ता साफ हो गया है। इस चुनाव में विजय ने दो विधानसभा सीटों से जीत हासिल की है। हालांकि मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें एक सीट छोड़नी होगी। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनी लेकिन उसके बाद भी सरकार बनाने को लेकर जोसेफ विजय को काफी दिक्कतें आई हैं। हालांकि, मुश्किलों को हल करने में राहुल गांधी की भूमिका काफी अहम रही है। तमिलनाडु में टीवीके चीफ विजय रविवार को राज्य के 9 वें मुख्यमंत्री पद की शपथ लिया है।इनके साथ नौ लोगों ने मंत्री पद का शपथ लिया है।जोसेफ विजय की पार्टी टीवीके का उदय तमिलनाडु की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। यह केवल एक फिल्म अभिनेता के राजनीति में आने की घटना नहीं है, बल्कि राज्य की बदलती सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों, युवाओं की अपेक्षाओं और द्रविड़ राजनीति के भीतर उभरते खाली स्थान का परिणाम भी है।विजय तमिल सिनेमा के सबसे लोकप्रिय सितारों में से हैं। उनकी फिल्मों में अक्सर सामाजिक न्याय, भ्रष्टाचार विरोध और युवा शक्ति जैसे मुद्दे दिखाए जाते रहे हैं। उनका प्रशंसक नेटवर्क वर्षों से संगठित रूप में काम कर रहा था, जो अब राजनीतिक ढांचे में बदला गया है।टीवीके ने अभी तक खुद को पूरी तरह किसी एक वैचारिक ध्रुव से नहीं जोड़ा है।वे द्रविड़ पहचान, सामाजिक न्याय और तमिल अस्मिता को बनाए रखते हुए “सर्वसमावेशी” छवि बनाना चाहते हैं।वे युवाओं को रोजगार, पारदर्शी व्यवस्था और सुशासन पर जोर देकर नई पीढ़ी को द्रविड़ राजनीति में जोङा है। इस बार के चुनाव में एआईएडीएमके का वोट शेयर लगभग 12 प्रतिशत तक गिरा है। इस बार सिर्फ पार्टी तीसरे नंबर पर पहुंच गई है, बल्कि वह मुख्य विपक्षी दल का दर्जा भी गंवा बैठी है। डीएमके और एआईएडीएमके दोनों पार्टियां पेरियार और अन्नादुरई के सिद्धांतों जैसे सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता, हिंदी विरोध को मानती है।1967 से तमिलनाडु में केवल इन दो पार्टियों ने ही सरकारें बनाई हैं, जो बारी-बारी से सत्ता में आती रही हैं। दोनों ही पार्टियों का फिल्मी जगत से गहरा संबंध रहा है, जहां नेता अक्सर पटकथा लेखक या अभिनेता रहे हैं।डीएमके का उदय 1949 में हुआ था।सी.एन. अन्नादुरई ने पेरियार के कुछ विचारों से असहमति के बाद डीएमके बनाई, जो चुनावी राजनीति में उतरी। दक्षिण के बङे अभिनेता एम.जी. रामचंद्रन ने करुणानिधि से विवाद के बाद डीएमके से अलग होकर 1972 में एआईएडीएमके बनाई।बाद में जयललिता ने इस पार्टी की कमान संभाली थी। जयललिता भी दक्षिण की मशहूर अभिनेत्री थी। तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति का इतिहास 1916 में जस्टिस पार्टी की स्थापना से शुरू होकर आज की डीएमके और एआईएडीएमके के बीच वैचारिक और सत्ता संघर्ष का 110 साल पुराना सफर है।जस्टिस पार्टी की शुरुआत गैर-ब्राह्मण आंदोलन से हुई, जो प्रशासन और शिक्षा में ब्राह्मण वर्चस्व के खिलाफ था।बाद में जस्टिस पार्टी को पेरियार ई.वी. रामासामी ने द्रविड़ कड़गम में बदला, जिसका उद्देश्य स्वतंत्र द्रविड़ नाडु और सामाजिक सुधार था।तमिलनाडु की राजनीति देश के बाकी राज्यों से काफी अलग मानी जाती है। ऐसा इसलिए कि यहां जाति, भाषा, धर्म, क्षेत्रीय पहचान और सामाजिक न्याय की राजनीति ने एक ऐसी विचारधारा को जन्म दिया जिसे द्रविड़ राजनीति कहा जाता है। राज्य की दो सबसे बड़ी पार्टियां डीएमके और एआईएडीएमके एक ही द्रविड़ आंदोलन से निकली है, दोनों की विचारधारा लगभग समान है, लेकिन राजनीतिक रूप से दोनों दशकों से कट्टर प्रतिद्वंद्वी बनी हुई है और पिछले पांच दशक से ज्यादा समय से तमिल राजनीति पर कब्जा किया हुआ है। 1967 का विधानसभा चुनाव तमिलनाडु की राजनीति का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ, जहां डीएमके ने कांग्रेस को हराकर सत्ता हासिल कर ली और सी. एन. अन्नादुरई मुख्यमंत्री बने। यह पहली बार था जब किसी क्षेत्रीय दल ने राज्य में कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया था। इसके बाद तमिलनाडु की राजनीति लगभग पूरी तरह द्रविड़ दलों के नियंत्रण में आ गई। अन्नादुरई की मृत्यु के बाद एम. करुणानिधि डीएमके के सबसे बड़े नेता बनकर उभरे।1969 में सी.एन. अन्नादुरई के निधन के बाद, कलाइग्नार एम. करुणानिधि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने और पांच बार इस पद पर आसीन हुए। उन्होंने 2016 तक हुए सभी 13 विधानसभा चुनावों में जीत हासिल करके एक रिकॉर्ड बनाया। 2018 में, उनके बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण, डीएमके की आम सभा की बैठक हुई और एम.के. स्टालिन को डीएमके को अध्यक्ष चुना गया था।1980 और 1990 के दशक में तमिलनाडु की राजनीति पूरी तरह करुणानिधि बनाम जयललिता में बदल गई। दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक संघर्ष बेहद तीखा था। विधानसभा से लेकर सड़कों तक टकराव दिखाई देता था। तमिलनाडु की राजनीति में फिल्मी लोकप्रियता महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल स्टारडम से सत्ता नहीं मिलती।एम.जी. रामचंद्रन और जे. जयललिता सफल हुए क्योंकि उन्होंने मजबूत संगठन और जनकल्याणकारी राजनीति भी विकसित की थी। नई पार्टियों पर अक्सर आरोप लगता है कि वे केवल एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द बनी हैं। यदि टीवीके अलग-अलग चेहरों को आगे करती है, तो वह खुद को “संगठन आधारित पार्टी” के रूप में पेश कर सकती है। तमिलनाडु की राजनीति में क्षेत्रीय और जातीय संतुलन बेहद महत्वपूर्ण है।यदि विजय किसी विशेष समुदाय से जुड़े माने जाते हैं, तो पार्टी दूसरे समुदाय और धर्म के चेहरे को आगे कर व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाना चाहिए। विजय की लोकप्रियता और उसकी दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह पार्टी को मजबूत संगठन, स्पष्ट नीतियां और विश्वसनीय राजनीतिक नेतृत्व कितना विकसित कर पाते हैं। (बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 10 मई /2026