लेख
12-May-2026
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• स्ट्रेट आॅफ होर्मुज बंद होने से देश की सरकार को हो रहा प्रतिदिन 1000 करोड़ का नुकसान। • मोदी सरकार की दूरदर्शिता से सभी घरों में जलते रहे चूल्हे, चलते रहे वाहन। • हालात बताते हैं कि बढ़ सकता है ऊर्जा संकट। • जनता की समझदारी व सहयोग ही देगा सरकार को इस मुसीबत से लड़ने की ताकत। घर-परिवार हो या कोई देश आकस्मिक आपदा किसी पर भी कभी भी आ सकती है। विगत दिनों में ईरान और अमेरिका के युद्ध के चलते होर्मुज बंद हो गया, जिसके कारण जहाजों की आवाजाही बंद हो गई। युद्ध के शुरूआती दौर में तो यह लगा था कि तेल और गैस की किल्लत से सभी जगह त्राहि-त्राहि मच जायेगी लेकिन भारत में ऐसा नहीं हुआ। सभी घरों में चूल्हे जलते रहे, वाहन चलते रहे, बच्चों की पढाई सुव्यवस्था के साथ चलती रही। यह सब कुछ तभी संभव हो सका क्योंकि हमारा मुखिया, हमारा संरक्षक जिम्मेदार और दूरदर्शी है। हमारी सरकार ने कुशल नेतृत्व के साथ इस मुसीबत की घड़ी में अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए बढ़ती कीमतों के बोझ को अपने तक ही सीमित रखा, जनता को उस तकलीफ से रूबरू ही नहीं होने दिया। जबकि वास्तविकता तो यह है कि हमारी तेल कंपनियों को प्रतिदिन रू. 1000 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ रहा है, अर्थात थोड़े में कहें तो हमारी सरकार को इस युद्ध के कारण रू. 68,000 करोड़ का भारी नुकसान हुआ है। इसके अलावा इस युद्ध का बोझ हमारे तेल भंडारों पर भी पड़ रहा है, उनका स्तर निरंतर नीचे गिर रहा है और जिसको बनाये रखने में निवेश की आवश्यकता पड़ रही है। इस सब का असर सरकार के सेंट्रल एक्साइज पर भी पड़ रहा है। यानी तीन अलग-अलग दिशाओं में भारत को नुकसान उठाना पड़ रहा है। भारी नुकसान के चलते निरंतर गिरती अर्थव्यवस्था को समय रहते सुधारना ही होगा और इसके लिए सरकार के साथ प्रत्येक नागरिक का भी दायित्व है कि वो अपनी भागीदारी समझे। ऐसे कठिन समय में जब आर्थिक मार हर घर, हर व्यक्ति तक पहुँच गई हो, गाड़ियां खड़े होने के कगार पर हों, किसी भी सरकार के लिए बहुत आसान रास्ता था इस आर्थिक बोझ को जनता के ऊपर डालकर अलग हो जाना। लेकिन हमारी संवेदनशील सरकार ने अपनी सूझ बूझ से न केवल जनता को राहत दी बल्कि अपनी नीतिगत कुशलता से जनता को ऐसा छत्र दिया जिससे जनता का सामान्य जीवन अस्त व्यस्त होने से बच गया। युद्ध न रुकने से जहाँ वैश्विक ऊर्जा संकट निरंतर बढ़ता ही जा रहा है वहीं होर्मुज का रास्ता साफ होने के भी कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भविष्य में युद्ध विराम हो भी गया तो स्थिति को संभलने में कम से कम चार महीने लग जाएंगे, जिसके चलते अधिक समय तक तेल और गैस के दाम उच्च स्तर पर बने रह सकते हैं। परन्तु युद्ध के इस ग्यारहवें सप्ताह में सरकार द्वारा अपनाएं वर्तमान माॅडल को यदि और आगे खींचा गया तो इसके प्रतिकूल प्रभाव हमारी अर्थयवस्था पर पडने लगेंगे। इन परिस्थितियों में हमारे सामने तीन चुनौतियां हैं- पहली चुनौती तेल भंडार से जुड़ी है। भारत का तेल भंडार आज 5.33 मिलियन टन पर है, जो लगभग दो सप्ताह की आवश्यकता पूरी कर सकता है। आईईए मानक नब्बे दिनों का है। चंडीखोल, पादुर और बीकानेर में 6.5 मिलियन टन का दूसरा चरण निर्माणाधीन है, और इसे त्वरित समय-सीमा पर पूरा करना होगा। साथ ही, जापान और दक्षिण कोरिया के बाद भारत ही ऐसा देश है जो 30-दिवसीय एलपीजी भंडार की योजना बना रहा है। इस युद्ध से उत्पन्न संकट से पता चलता है ये हमारी आज की आवश्यकता है। दूसरी चुनौती रिफाइनिंग और घरेलू उत्पादन की है। हमें अपनी रिफाइनिंग क्षमता को बढ़ाना होगा। इसके लिए पहले ही कदम उठाये जा चुके हैं। नुमालीगढ़, जहाँ रु. 34,000 करोड़ की लागत से 3 से 9 एमएमटीपीए तक का विस्तार हो रहा है, उसे समय से पहले परिचालन में लाना होगा। बाड़मेर का संयंत्र अब परिचालन में है। पश्चिमी तट के एकीकृत संयंत्र विभिन्न चरणों में हैं। साथ ही घरेलू कच्चे तेल का उत्पादन, जो आज मांग का मात्र 12 प्रतिशत पूरा करता है, उसको बढ़ाना होगा। तीसरी चुनौती इथनॉल ब्लेंडिंग की है, आज बीस प्रतिशत ब्लेंडिंग करके देश 1.5 लाख करोड़ से अधिक की विदेशी मुद्रा बना पा रहा है। इस कठिन समय में वैकल्पिक ईंधन के माध्यम से एल पीजी की मांग को 70 से 75 हजार टन प्रतिदिन कम किया जा रहा है। आर्थिक नीतियों के जानकारों का कहना है कि यह केवल इसलिए संभव हुआ क्योंकि पीएनजी, मिट्टी का तेल, ईंधन तेल और बायो गैस की वैकल्पिक संरचना संकट आने से पहले ही तैयार कर ली गई थी। जो विशेषज्ञ इस दिशा में लगातार शोध कार्य कर रहे हैं उनका मानना है कि आज की तुलना में आने वाला समय और भी कठिन होगा, तब हमें इस संकट के समय जो हमने व्यय किया उससे उबरना भी होगा और ऐसी योजनाएं जो भविष्य में हमें मजबूती दे सकें उन योजनाओं में निवेश भी करना होगा। विश्व के इस संकट के समय में जब लगभग सभी देशों में पेट्रोल की कीमतें बढ़ा दी गयीं, श्रीलंका, पाकिस्तान में चार दिवसीय कार्य सप्ताह कर दिया गया, फिलीपींस मंे राष्ट्रीय ऊर्जा आपातकाल लगा दिया गया, भारत मंे जनजीवन सामान्य बना रहा। न तो भारत में कोई ईंधन राशनिंग हुई न वर्क फ्राम होम हुआ, न ही स्कूल बंद हुए, न ईंधन संकट हुआ और सबसे महत्वपूर्ण बात पेट्रोल के दाम भी नहीं बढ़े। इसे कर दिखाना इतना आसान तो नहीं था पर हमारे प्रधान मंत्री के कुशल नेतृत्व में वर्तमान सरकार ने शिव की भाँति युद्ध से उपजे समस्त गरल को स्वयं ही पी लिया। हमारे नागरिकों को भी यह समझना होगा कि यह सुखद स्थिति हर समय नहीं बनी रहेगी, बदलते समय और परिस्थितियों के साथ हमें अपनी कार्य प्रणाली को भी तेजी से बदलना होगा। जनता का सहयोग और समझदारी ही वह कुंजी है जो हमें आने वाली मुसीबतों से लड़ने की, जूझने की और जीतने की ताकत देगी। हमें अपनी सरकार के प्रति कृतज्ञ बने रहते हुए अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन भी सच्चे और मजबूत इरादों के साथ ही करना होगा। धूप से बचने के लिए जिस तरह पेड़-पौधों का होना जरूरी है, उसी तरह इस ऊर्जा संकट की तपिश से बचने के लिए हमें भी अपना योगदान देना होगा। (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) ईएमएस / 12 मई 2026