अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा वैश्विक स्तर पर युद्ध जैसी आशंकाओं ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर दिया है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। हाल के दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा संभावित आर्थिक संकट, ईंधन की बढ़ती खपत, विदेशी निर्भरता तथा घरेलू संसाधनों के संयमित उपयोग को लेकर व्यक्त चिंताओं के बाद देश के बाजारों में बेचैनी का माहौल दिखाई दे रहा है। शेयर बाजार में लगातार गिरावट, सोने और आभूषण कारोबार में चिंता तथा महंगाई को लेकर आम लोगों की आशंकाएं यह संकेत दे रही हैं कि देश आर्थिक अनिश्चितता के दौर में प्रवेश कर रहा है। भारत लंबे समय से ऊर्जा जरूरतों के लिए आयातित कच्चे तेल पर निर्भर रहा है। यदि पश्चिम एशिया में युद्ध की स्थिति गंभीर होती है, तो सबसे पहला प्रभाव तेल और गैस की कीमतों पर पड़ेगा। पहले से ही महंगे पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस से परेशान जनता के सामने महंगाई की नई सुनामी खड़ी हो सकती है। परिवहन लागत बढ़ने से खाद्यान्न, सब्जियों, निर्माण सामग्री और रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम बढ़ना लगभग तय माना जाता है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा सोना नहीं खरीदने, पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने, विदेश यात्राओं को रोकने और इसी के साथ ही भोजन में तेल कम से कम उपयोग करने पर जोर दिए जाने को लोग आने वाले कठिन समय की चेतावनी के रूप में देख रहे हैं। दरअसल कोरोना महामारी का अनुभव अभी भी देशवासियों की सामूहिक स्मृति में ताजा है। उस समय लॉकडाउन, बेरोजगारी, पलायन और आर्थिक ठहराव ने करोड़ों लोगों को प्रभावित किया था। यदि वर्तमान संकट की तुलना उसी दौर से की जाती है, तो स्वाभाविक रूप से लोगों में भय और असुरक्षा की भावना बढ़ती ही बढ़ती है। बाजारों की घबराहट केवल आर्थिक आंकड़ों का परिणाम नहीं होती, बल्कि मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी उसमें बड़ी भूमिका निभाता है। निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ते ही शेयर बाजार गिरने लगता है और आम जनता खर्च रोककर बचत की ओर बढ़ती है। सोने की खरीद टालने की अपील ने भी बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। भारत में आभूषण उद्योग करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ा है। यदि उपभोक्ता सोने की खरीद कम करते हैं, तो छोटे ज्वेलर्स, कारीगरों और संबंधित व्यापारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना तय है। यही कारण है कि व्यापारिक संगठनों में चिंता बढ़ी है। हालांकि सरकार का उद्देश्य विदेशी मुद्रा की बचत और अनावश्यक आयात कम करना हो सकता है, लेकिन ऐसे कदमों के सामाजिक और रोजगार संबंधी प्रभावों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वर्तमान संकट का एक बड़ा पहलू विदेशी मुद्रा भंडार और व्यापार असंतुलन भी है। भारत का आयात लगातार निर्यात से अधिक रहा है। यदि तेल आयात पर खर्च बढ़ता है और विदेशी निवेशक बाजार से पैसा निकालते हैं, तो रुपये पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। रिजर्व बैंक को रुपये को संभालने के लिए डॉलर बेचने पड़ सकते हैं। प्रवासी भारतीयों से आने वाली विदेशी मुद्रा में कमी और वैश्विक मंदी की आशंका इस संकट को और गंभीर बना सकती है। राजनीतिक दृष्टि से भी यह दौर सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। विपक्ष पहले ही बेरोजगारी, महंगाई और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दों पर सरकार को घेर रहा है। यदि महंगाई लगातार बढ़ती है और जनता की क्रय शक्ति घटती है, तो इसका सीधा असर राजनीतिक माहौल पर पड़ेगा। इतिहास गवाह है कि आर्थिक संकट अक्सर सामाजिक असंतोष को जन्म देता है। ऐसे समय में केवल चेतावनी देना पर्याप्त नहीं होगा। सरकार को ठोस आर्थिक रणनीति, पारदर्शी संवाद और राहत उपायों के साथ आगे आना होगा। विपक्ष को भी राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर रचनात्मक सहयोग की भूमिका निभानी चाहिए। देश आर्थिक चुनौतियों का सामना केवल सामूहिक विश्वास, संतुलित नीतियों और जिम्मेदार नेतृत्व से ही कर सकता है। इस तरह की चेतावनियां जारी कर जनता को डराने के बजाय भरोसा दिलाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। ईएमएस / 12 मई 26