लेख
13-May-2026
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*- भैया - भैया मेरी तन्द्रा टुट गई मेरे नजर तभी एक कश्मीरी महिला के मासुम चेहरे पर पड़ी-जिसके गोद में एक प्यारी सी मासून बच्ची थी जो अपनी माँ के मार्मिक आवाज में मासूम स्वर बोल रही थी - भैया - भैया कुछ दे दो-तभी मैने अपने अपनी जेब से 10 रु० नोट उसके हाथ में पकड़ा दिया - आदतन मै कभी भी किसी भीख माँगने वाले को कुछ नही देता हुँ तभी -पुनः महिला नें कारूणिक स्वर-जिसमें एक माँ की ममता- संवेदना व मजूबरी स्वर थे-भैया बच्ची भुखी है -कुछ खाने का दे दो* यात्राएँ केवल भौगोलिक दूरी का विस्तार नहीं होतीं, वे मनुष्य के भीतर बसे अनुभवों, संवेदनाओं और संघर्षों की भी परतें खोलती हैं।29अप्रैल की संध्या से 3 मई 2026 के बीच जम्मू तवी से प्रारम्भ होकर श्रीनगर तक पहुँची यह मीडिया यात्रा भी एक ऐसी ही बहुआयामी अनुभूति बन गई -जहाँ एक ओर बाहरी दुनिया का अद्भुत विस्तार था, वहीं दूसरी ओर भीतर चल रही थकान, असहजता और आत्म संवाद की गहरी परछाइयाँ भी थीं।यह यात्रा जितनी बाहर की थी, उससे कहीं अधिक भीतर की यात्रा बन गई।जम्मू तवी रेलवे स्टेशन से इस यात्रा का वास्तविक आरंभ हुआ। यह स्थान केवल एक पड़ाव नहीं,बल्कि कई दिशाओं से आई यात्राओं का संगम था। दिल्ली और अन्य शहरों से अलग-अलग ट्रेनों के माध्यम से पहुँचे पत्रकारों के चेहरों पर थकान और उत्साह का एक साथ होना इस यात्रा की पहली झलक थी। किसी के पास कहानियाँ थीं, किसी के पास अपेक्षाएँ—और इन्हीं के बीच यह सफर धीरे-धीरे आगे बढ़ा,लेकिन हर यात्रा केवल उम्मीदों से नहीं चलती,वह शरीर और मन की सीमाओं को भी परखती है। श्रीनगर पहुँचते-पहुँचते मेरे भीतर यह सीमा स्पष्ट होने लगी।पहले हल्की थकान,फिर असहजता, और धीरे-धीरे एक गहरा शारीरिक कष्ट—यह सब इस यात्रा का हिस्सा बन गया।अनियमित दिनचर्या,भोजन का अभाव और लगातार चलने वाली गतिविधियों ने शरीर को कमजोर कर दिया।श्रीनगर—प्रकृति की गोद में बसा वह अद्भुत नगर, जहाँ हर दृश्य एक कविता की तरह खुलता है।डल झील की शांत जलराशि पर तैरते शिकारे जैसे समय को थाम लेते हैं। सुबह की किरणें जब जल पर उतरती हैं,तो लगता है जैसे आकाश और धरती एक-दूसरे से संवाद कर रहे हों।मुगलकालीन स्थापत्य के प्रतीक शालीमार बाग और निशांत वाग अपने भीतर इतिहास और प्रकृति का संतुलन समेटे हुए हैं।यहाँ की हरियाली, जलधाराएँ और सुव्यवस्थित उद्यान मानो उस समय की संवेदनशीलता को आज भी जीवित रखते हैं।चश्मे शाही का निर्मल जल, जिसकी शीतलता थके हुए मन और शरीर को राहत देती है, प्रकृति के उस स्पर्श का अनुभव कराता है जो बिना शब्दों के भी बहुत कुछ कह जाता है।वहीं हजरत बल सिने (Hazratbal Shrine ) की पवित्रता और शांति मन को एक गहरे आध्यात्मिक अनुभव से भर देती है। और लाल चौक यह केवल एक स्थान नहीं, .बल्कि जीवन की धड़कन है,जहाँ शहर अपने पूरे रंग और लय में साँस लेता है।इस समूचे सौंदर्य के बीच मेरी अपनी स्थिति एक अलग ही कहानी लिख रही थी।शारीरिक कष्ट के कारण मैं समूह से अलग पड़ गया।होटल के नियमों और परिस्थितियों ने मुझे एक सीमित दायरे में बाँध दिया।वह कमरा, जो विश्राम के लिए था,धीरे-धीरे एक बंद संसार में बदल गया। बाहर की वादियाँ पुकार रही थीं, लेकिन भीतर की थकान उस पुकार तक पहुँचने नहीं दे रही थी।आईने में चेहरा देखा तो थकान की लकीरें स्पष्ट दिखाई दे रही थीं—जैसे हर रेखा एक अनुभव को दर्ज कर रही हो। उस क्षण यह एहसास और गहरा हुआ कि एक पत्रकार होने के बावजूद, हर अनुभव को पूरी तरह जी पाना संभव नहीं होता।कुछ यात्राएँ केवल देखी नहीं जातीं, वे भीतर झेली भी जाती हैं।इसी खामोशी के बीच एक छोटा-सा क्षण एक नए द्वार की तरह सामने आया।जब मैं नाश्ते के लिए रेस्टोरेंट पहुँचा, तो होटल के एक कर्मचारी ने सहजता से कहा—“सर, आपके सभी लोग घूमने चले गए।” यह सुनकर एक क्षण के लिए भीतर एक खालीपन उतर आया। लेकिन उसी क्षण उसने एक और बात कही—“ड्राइवर है, आप भी घूम लीजिए।”यह प्रस्ताव जैसे बंद कमरे की खिड़की खुलने जैसा था। थोड़ी ही देर में एक ड्राइवर की व्यवस्था हुई और मैं अकेले श्रीनगर की सड़कों पर निकल पड़ा।यह यात्रा अब समूह की औपचारिकता से मुक्त होकर एक व्यक्तिगत अनुभव बन चुकी थी—मेरे और इस शहर के बीच एक सीधा संवाद।राज भवन श्रीनगर की गंभीरता, चश्मे शाही की ताजगी,और लाल चौक की हलचल—इन सबने उस थके हुए मन को एक नई ऊर्जा दी।यह अनुभव किसी आधिकारिक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था, लेकिन इसने इस यात्रा को एक मानवीय आयाम दे दिया। इस दौरान मुझे श्री नगर मानवीय संवेदना की झलक दिखाई दी - शैने - शैने हमारी कारी आगे वढ़ रही थी तभी एक आवाज मेरी कान में पड़ी - भैया - भैया मेरी तन्द्रा टुट गई मेरे नजर तभी एक कश्मीरी महिला के मासुम चेहरे पर पड़ी - जिसके गोद में एक प्यारी सी मासून बच्ची थी जो अपनी माँ के मार्मिक आवाज में मासूम स्वर बोल रही थी - भैया - भैया कुछ दे दो - तभी मैने अपने अपनी जेब से 10 रु० नोट उसके हाथ में पकड़ा दिया - आदतन मै कभी भी किसी भीख माँगने वाले को कुछ नही देता हुँ तभी - पुनः महिला नें कारूणिक स्वर - जिसमें एक माँ की ममता - संवेदना व मजूबरी स्वर थे - भैया बच्ची भुखी है -कुछ खाने का दे दो तभी मैने अन्तर्मन के आवाज स्वीट क्रीम ब्रेड का पैकेट पकड़ा - उनकी आँखे-अन्तर्मन अनंत दुआ देती हुई-हम आगे वढ़ गयें ।इस यात्रा के दौरान अकेलेपन में भी एक संवाद था, एक आत्मीयता थी,जो शायद भीड़ में संभव नहीं थी।लेकिन यात्रा का संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ था।वापस लौटने पर जब थकान और अस्वस्थता फिर से गहराई,तब एक मानवीय स्पर्श ने इस पूरे अनुभव को एक नई संवेदना से भर दिया।विनोद भट्ट ने मेरे चेहरे की थकान को समझते हुए एक टैबलेट मेरे हाथ में थमाई और कहा -“दादा,आप चिंता न करें, आप स्वस्थ हो जाएंगे।”यह एक साधारण वाक्य था,लेकिन उस समय यह किसी बड़ी राहत से कम नहीं था।यह एहसास हुआ कि यात्रा में सबसे बड़ा सहारा स्थान नहीं, बल्कि इंसान होता है।इसी क्रम में मुझे मानवीय संवेदना का जीता जागता उदाहरण नजर आया है। वह नाम युवा सह यात्री अशोक शर्मा जी थे जो श्याद नार्दन रेलवे के स्टाफ /शोसल मीडिया टीम का नेतृत्व कर रहें है-अशोक जी तथा उनकी टीम के कई सम्मानित साथियों जो मेरे से पहली बार मिलें थे-आगे बढ़कर मेरी मदद की ।इस पूरी यात्रा में हालाकि सदस्यों के लिए व्हाटसएप बनायें गए थे लेकिन आयोजको द्वारा संवाद सम्प्रेषण -सहयोग व भोजन व्यवस्था का अभाव भी एक गहरी चुनौती रहा।समय पर सुचना ना मिलने -आपसी सहयोग -संवाद के सामंजस्य ना होने से नाश्ते, दोपहर और रात्रि भोजन की अनिश्चितता ने शरीर को और कमजोर कर दिया।यह केवल एक व्यक्तिगत कठिनाई नहीं थी,बल्कि एक बड़ा प्रश्न भी था-क्या व्यवस्थाओं में मानवीय आवश्यकताओं को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है?वापसी की यात्रा में जब मैं फिर जम्मू तवी होते हुए दिल्ली की ओर बढ़ा,तो यह मेरे लिए केवल एक वापसी नहीं थी,बल्कि एक आत्ममंथन था।अब वही रास्ते,वही स्टेशन और वही ठहराव एक नए अर्थ के साथ सामने आ रहे थे।हमारी यह पूरी यात्रा अंततः एक ऐसे कृतांत में बदल गई,जहाँ श्रीनगर का स्वर्गिक सौंदर्य और एक व्यक्ति की आंतरिक पीड़ा साथ-साथ चलती रही।एक ओर प्रकृति का अद्भुत विस्तार था,तो दूसरी ओर मन की थकान और संवेदनाओं का बोझ।कश्मीर की वादियों से लौटते हुए यह एहसास और गहरा हो गया कि किसी भी यात्रा की सच्चाई केवल उसके दृश्यों में नहीं,बल्कि उन अनुभवों में छिपी होती है,जो हमें भीतर से छू जाते हैं।शायद यही इस यात्रा का सार भी है-कि सबसे सुंदर स्थान भी तब अधूरा लगने लगता है,जब उसके साथ जुड़ी मानवीय संवेदनाएँ संतुलित न हों।बंद कमरों की वह खामोशी, शारीरिक कष्ट की वह असहनीय पीड़ा,बीच-बीच में मिले कुछ स्नेहिल मानवीय स्पर्श-इन सबने मिलकर इस यात्रा को केवल एक रिपोर्ट नहीं,बल्कि एक मार्मिक, जीवंत और लंबे समय तक स्मृतियों में रहने वाला अनुभव बना दिया। (लेखक ,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं) ईएमएस/13/05/2026