लेख
14-May-2026
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-1 अनार, 100 बीमार वाली पार्टी कांग्रेस पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद सबसे अधिक चर्चा जिस मुद्दे को लेकर हुई, वह केवल जीत-हार तक सीमित नहीं रही, बल्कि कांग्रेस संगठन की कार्यप्रणाली और नेतृत्व क्षमता भी बहस के केंद्र में आ गई। विशेष रूप से केरल में कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) को स्पष्ट बहुमत मिलने के बावजूद मुख्यमंत्री के चयन में दस दिन का समय लगना राजनीतिक हलकों में चर्चा और आलोचना का विषय बन गया। गौरतलब है कि 4 मई को चुनाव परिणाम घोषित किए गए थे और कांग्रेस के पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या थी। बावजूद इसके पार्टी मुख्यमंत्री के नाम पर जल्दी निर्णय नहीं ले सकी। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को विधायक दल के नेता के चयन का अधिकार पहले ही दे दिया गया था। उन्होंने विधायकों और वरिष्ठ नेताओं से चर्चा भी की, लेकिन आम सहमति नहीं बन सकी। अंततः पार्टी को जयराम रमेश, मुकुल वासनिक, दीपा दासमुंसी और अजय माखन जैसे वरिष्ठ नेताओं को केरल भेजना पड़ा। दो दिन की मशक्कत के बाद वीडी सतीशन के नाम पर सहमति बनी और उनके मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हुआ। यह स्थिति उस पार्टी के लिए निश्चित रूप से चिंताजनक मानी जाएगी, जो कभी देश की सबसे मजबूत राजनीतिक शक्ति थी। केरल जैसे राज्य, जहां कांग्रेस सांसद और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का सीधा राजनीतिक जुड़ाव रहा है, वहां भी नेतृत्व चयन को लेकर इतना लंबा गतिरोध कांग्रेस की आंतरिक स्थिति को उजागर करता है। विडंबना यह रही कि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) और यूडीएफ के कई सहयोगी दल पहले ही वीडी सतीशन के समर्थन में खुलकर सामने आ चुके थे। सतीशन लंबे समय से कांग्रेस संगठन में सक्रिय रहे हैं और उन्हें जमीनी नेता माना जाता है। इसके बावजूद कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन और गुटबाजी इतनी मजबूत रही कि निर्णय लेने में पार्टी नेतृत्व को अत्यधिक समय लग गया। दरअसल, कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत ही आज उसकी कमजोरी बनती दिखाई दे रही है। पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक माहौल होने के कारण हर नेता अपनी बात खुलकर रखने और अपने हित साधने की कोशिश करता है। यदि उसकी बात नहीं मानी जाती तो कई बार वह पार्टी छोड़कर क्षेत्रीय दल बना लेता है या भाजपा में शामिल हो जाता है। कांग्रेस के केंद्र में सत्ता से बाहर होने के बाद यह प्रवृत्ति और तेज हुई है। आज कांग्रेस जिन राज्यों में मजबूत दिखाई देती है, वहां भी आंतरिक खींचतान उसके लिए चुनौती बनी हुई है। कर्नाटक इसका बड़ा उदाहरण है, जहां सरकार बनने के बाद भी मुख्यमंत्री पद को लेकर समय-समय पर विवाद सामने आते रहते हैं। कांग्रेस का बड़ा समय विपक्ष से लड़ने के बजाय अपने ही नेताओं के बीच संतुलन बनाने में निकल जाता है। इसके विपरीत भारतीय जनता पार्टी ने पिछले एक दशक में अपने संगठन को अधिक केंद्रीकृत और अनुशासित बनाया है। हालांकि भाजपा की राजनीतिक ताकत का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस से आए नेताओं पर भी टिका है। कई राज्यों में भाजपा ने कांग्रेस के प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ जोड़कर सरकारें बनाई हैं। यह तथ्य कांग्रेस और भाजपा दोनों भलीभांति जानते हैं। यह भी सच है कि कांग्रेस आज भी देशभर में एक व्यापक जनाधार रखने वाली पार्टी है। केंद्र में रहते हुए भी भाजपा प्रत्येक राज्य में वैसी सामाजिक स्वीकार्यता नहीं बना सकी है जैसी कांग्रेस के पास दशकों से रही है। लेकिन कांग्रेस के भीतर निजी महत्वाकांक्षाएं और गुटीय संघर्ष उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है। कांग्रेस नेताओं का यह तर्क भी पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता कि केंद्र में सत्ता संतुलन भाजपा के पक्ष में होने से कांग्रेस पर लगातार दबाव बना रहता है। जांच एजेंसियों, राजनीतिक अभियानों और संसाधनों की असमानता के बीच कांग्रेस को अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़नी पड़ रही है। बहरहाल इन तमाम परिस्थितियों के बावजूद यदि पार्टी आंतरिक एकजुटता नहीं दिखा पाएगी, तो उसकी चुनौतियां और बढ़ेंगी। केरल में आखिरकार वीडी सतीशन के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया है। इसे देर आयद दुरुस्त आयद की स्थिति कहा जा सकता है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने यह जरूर स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस की सबसे बड़ी लड़ाई फिलहाल भाजपा से कम और अपने भीतर की राजनीति से अधिक है। यदि पार्टी समय रहते संगठनात्मक अनुशासन और नेतृत्व में स्पष्टता नहीं ला पाई, तो उसकी आंतरिक कलह ही भविष्य में उसके राजनीतिक संकट को और गहरा कर सकती है। ईएमएस / 14 मई 26