लेख
13-May-2026
...


(14 मई राष्ट्रीय शालीनता दिवस) आज 14 मई है। कैलेंडर कहता है कि आज राष्ट्रीय शालीनता दिवस है। सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है कि क्या अब शालीन रहने के लिए भी कोई खास दिन तय करना पड़ेगा? लेकिन अपने आसपास की डिजिटल दुनिया, सोशल मीडिया के कमेंट बॉक्स और टीवी बहसों नेताओं के भाषण या आसपास के शोर को देखिए, तो अहसास होगा कि शायद आज के दौर में इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। हम तरक्की तो बहुत कर रहे हैं, चांद पर पहुंच रहे हैं, लेकिन हमारी जुबान और व्यवहार से तमीज का रंग उतरता जा रहा है। खासकर इंटरनेट की दुनिया में तो ऐसा लगता है जैसे बदतमीजी करना ही नया फैशन या कूल दिखने का जरिया बन गया है। हमारे बुजुर्ग कहते थे कि इंसान की असली पहचान उसके कपड़ों या उसकी दौलत से नहीं, बल्कि उसकी बोली से होती है। शब्द इंसान के भीतर के संस्कारों का आईना होते हैं। लेकिन आज की हकीकत कुछ और ही है। फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म्स ने हमें एक नकाब दे दिया है। मोबाइल स्क्रीन के पीछे छिपे हम लोग खुद को बहुत बड़ा सूरमा समझने लगे हैं। हम वो बातें बड़ी आसानी से लिख देते हैं, जो शायद किसी के सामने खड़े होकर कहने की हिम्मत न हो। अगर किसी की बात हमें पसंद नहीं आती, तो हम उसे अपनी बात तर्क से समझाने के बजाय सीधा गाली-गलौज पर उतर आते हैं। उसे नीचा दिखाने के लिए उसके परिवार को बीच में ले आते हैं या उसे कोई नफरत भरा टैग दे देते हैं। यह जो ट्रोल कल्चर बढ़ रहा है, उसने हमारे समाज से संवाद की मिठास को पूरी तरह से खत्म कर दिया है। हैरानी की बात यह है कि अब अपशब्द बोलना एक तरह की बहादुरी मान लिया गया है। इसमें बहुत बड़ा हाथ हमारी आज की लोकप्रिय संस्कृति का भी है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर आने वाली वेब सीरीज हो या स्टैंड-अप कॉमेडी, वहां गालियों को संवाद का जरूरी हिस्सा बना दिया गया है। जब बड़े पर्दे पर या मोबाइल स्क्रीन पर नामी सितारे गाली देते हैं, तो हमारे घर के बच्चों को लगता है कि शायद यही आज की आधुनिक भाषा है। उन्हें लगता है कि तमीज और अदब से बात करना तो पुराने जमाने के लोगों का काम है। नतीजा यह है कि आज का युवा वर्ग अपनी बात में वजन पैदा करने के लिए तर्कों का नहीं, बल्कि अभद्र शब्दों का सहारा ले रहा है। उन्हें लगता है कि जो जितना तीखा और गंदा बोलेगा, वह उतना ही प्रभावशाली दिखेगा। सिर्फ सोशल मीडिया ही क्यों, हमारी टीवी बहसों को देख लीजिए। वहां जो प्रवक्ता जितनी जोर से चिल्लाता है और दूसरे को बोलने से रोकता है, उसे ही दमदार मान लिया जाता है। हमने एक ऐसी धारणा बना ली है कि जो विनम्र है, वो कमजोर है और जो बदतमीज है, वो ताकतवर। जबकि सच तो यह है कि चिल्लाने के लिए सिर्फ फेफड़ों का शोर चाहिए, लेकिन शांत रहकर अपनी बात मजबूती और गरिमा के साथ कहने के लिए बहुत बड़े आत्म-नियंत्रण की जरूरत होती है। शालीनता का मतलब डरना या चुप रहना कतई नहीं है। हमारे देश के बड़े-बड़े महापुरुषों ने दुनिया बदल दी, सत्ता की चूलें हिला दीं, लेकिन उनकी भाषा में कभी गन्दगी नहीं दिखी। गांधी जी, नेहरू जी, शास्त्री जी या कलाम साहब जैसे लोगों की बातों में वजन था, कड़वाहट नहीं। उनके विरोध में भी एक शालीनता थी, जो सामने वाले को सोचने पर मजबूर कर देती थी। आज हम इंटरनेट के जरिए पूरी दुनिया से जुड़ तो गए हैं, लेकिन एक-दूसरे के दिलों के लिए जगह खोते जा रहे हैं। कीबोर्ड पर टाइप करती हमारी उंगलियां अक्सर यह भूल जाती हैं कि फोन के दूसरी तरफ भी एक जीता-जागता इंसान बैठा है, उसके भी जज्बात हैं। हमारी एक छोटी सी अभद्र टिप्पणी किसी को कितना मानसिक दुख पहुँचा सकती है, इसका हमें अहसास तक नहीं होता। अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब यह नहीं है कि हम अपनी मर्यादा ही भूल जाएं। आज़ादी हमेशा जिम्मेदारी के साथ आती है, और एक नागरिक के तौर पर हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपनी भाषा की गरिमा बनाए रखें। वक्त आ गया है कि हम अपनी मोबाइल स्क्रीन से बाहर निकलकर अपनी आदतों पर गौर करें। यह दिन हमें याद दिलाए कि हम इंसान हैं और हमारी सबसे बड़ी खूबसूरती हमारी भाषा की तमीज है। अगर हम अपनी भाषा और व्यवहार में शालीनता वापस नहीं ला सकते, तो हमारी सारी पढ़ाई-लिखाई, डिग्रियां और आधुनिक गैजेट्स किसी काम के नहीं हैं। शालीनता कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे बाजार से खरीदा जा सके, यह एक संस्कार है जो घर की दहलीज से शुरू होता है और हमारे व्यवहार में झलकता है। आइए, इस डिजिटल शोर के बीच थोड़ी सी खामोशी, थोड़ी तमीज और बहुत सारी इंसानियत वापस लाएं। क्योंकि अंत में वही शब्द याद रखे जाते हैं जो सम्मान के साथ कहे गए हों, वे नहीं जो नफरत की कोख से पैदा हुए हों। (लेखक पत्रकार हैं) ईएमएस / 13 मई 26