लेख
13-May-2026
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भारतीय अर्थ व्यवस्था को लेकर सरकार लगातार तेज विकास, बढ़ते बुनियादी ढांचे और विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का दावा करती रही है। अब इस दावे की पोल खुलती चली जा रही है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अरुण कुमार ने भारत की अर्थव्यवस्था में आने वाले महा संकट का संकेत किया है, उन्होंने सरकार के चमकदार दावों के पीछे छिपी सच्चाई को उजागर किया है। उनका मानना है, भारत की अर्थव्यवस्था दो हिस्सों में बंट चुकी है। एक संगठित क्षेत्र, जो कॉरपोरेट और शेयर बाजार की वृद्धि को अर्थव्यवस्था में दिखाता है, दूसरा असंगठित क्षेत्र, जहां देश की लगभग 94 प्रतिशत कार्यशक्ति काम करती है, जो लगातार संकट में है। उसकी वास्तविकता सरकार उजागर नहीं करती है। प्रो. अरुण कुमार के अनुसार सबसे बड़ा संकट “मांग मे कमी” आने का है। जब आम लोगों की आय घटती है, रोजगार कम होता है, उस समय सबसे पहले ग्रामीण अर्थव्यवस्था और असंगठित क्षेत्र कमजोर होता है। बाजार में मांग घटती है। इसका सीधा असर उद्योगों के उत्पादन, कारोबार और निवेश पर पड़ता है। यही कारण है कि ऊंची जीडीपी वृद्धि के बावजूद देश मे रोजगार का सृजन नहीं हो रहा। उल्टे नौकरियां जा रही हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत में बढ़ती बेरोजगारी और असमानता को लेकर कई वर्षों से चिंता जताई जा रही है। अर्थशास्त्री नोटबंदी, जीएसटी और कोरोना महामारी के बाद असंगठित क्षेत्र को जो नुकसान हुआ है उसके बारे में कई बार अपनी चिंता पिछले वर्षों में व्यक्त कर चुके हैं। सरकार ने इस पर विशेष ध्यान नहीं दिया। छोटे व्यापारी, कुटीर उद्योग, किसान और दिहाड़ी मजदूर सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। प्रो. अरुण कुमार का दावा है, सरकारी आंकड़े इस वास्तविक स्थिति को छुपाने का काम करते हैं। आंकड़ों को बदल देते हैं। सही मायने में कहा जाए तो सरकार आंख बंद करके जीडीपी और अर्थव्यवस्था को बेहतर बताकर अपनी पीठ थपथपाने में लगी हुई है। सरकार ने जीडीपी मापन की वर्तमान प्रणाली में असंगठित क्षेत्र की गिरावट को सही ढंग से वास्तविक स्थिति को शामिल नहीं किया है। जिसके कारण देश की आर्थिक स्थिति कागजों में कुछ और है, और वास्तविक स्थिति कुछ और है। वर्तमान स्थिति यह है, शेयर बाजार रिकॉर्ड स्तर पर है। बेरोजगारी लगातार बढ़ती चली जा रही हैं। अर्थव्यवस्था में जो बदलाव आए हैं उसके कारण भारत सहित वैश्विक स्तर पर लोगों की नौकरियां जा रही हैं। भारत के लगभग 80 करोड लोग मुफ्त राशन पर निर्भर हैं। भारत की अर्थव्यवस्था वास्तव में मजबूत होती, तो रोजगार और लोगों की आय में यह परिवर्तन दिखाई देता। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। ग्रामीण क्षेत्र की जो मांग पहले बढ़ रही थी, अब तेजी के साथ घट रही है। महंगाई और आय नहीं होने से मांग में निरंतर कमी आ रही है। युवाओं में बेरोजगारी और कृषि संकट भारत के तथाकथित विकास मॉडल और अर्थव्यवस्था को उजागर कर रहे हैं। अरुण कुमार सहित कई अर्थशास्त्रियों ने लगातार चिंता व्यक्त की है। मांग आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत नहीं किया गया, तो भारत “स्टैगफ्लेशन” जैसी स्थिति में फंस सकता है। इस स्थिति में विकास धीमा होता है, महंगाई लगातार बढ़ती है। जिसके कारण आम आदमी का जीवन दूभर होता है। इस संकट का समाधान बड़े एक्सप्रेस-वे, कॉरिडोर और पूंजी-प्रधान परियोजनाओं से पूरा नहीं हो सकता है। आवश्यकता है, सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, छोटे उद्योग और रोजगार सृजन पर अधिक से अधिक निवेश करे। असंगठित एवं ग्रामीण क्षेत्र की आय बढ़ाने, असंगठित क्षेत्र को ऋण राहत देने तथा श्रम-प्रधान उद्योगों को बढ़ावा देना इस समय की सबसे बड़ी जरूरत है। जब तक आम नागरिकों की क्रय शक्ति नहीं बढ़ेगी। तब तक आर्थिक विकास केवल कागजी उपलब्धि बनी रहेगी। भारतीय अर्थव्यवस्था एक निर्णायक मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है। यदि नीति-निर्माताओं और सरकार ने आंकड़ों में हेरा-फेरी करके वास्तविक समस्याओं को नजरअंदाज किया, तो आने वाला संकट और गहरा हो सकता है। अरुण कुमार की चेतावनी सरकार की आलोचना नहीं, बल्कि सामाजिक क्षेत्र में आर्थिक असंतुलन जिस तेजी के साथ बढ़ रहा है। समय रहते सरकार को समझना होगा। सरकार ने यदि अपनी आर्थिक नीतियों में जल्द ही परिवर्तन नहीं किया तो इसके दुष्परिणाम बहुत भयानक हो सकते हैं। अमेरिका में जो 2008 में मंदी आई थी उससे भी ज्यादा खतरनाक स्थिति भारत की हो सकती है। ईएमएस / 13 मई 26