- लंदन संग्रहालय प्रतिमा भारत लाने केंद्र शासन को दे सकेंगे अभ्यावेदन जबलपुर (ईएमएस)। मध्य प्रदेश के महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने कहा कि भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद मामले में हाई कोर्ट की इंदौर बेंच का निर्णय ऐतिहासिक है। वे शुक्रवार को कोर्ट के निर्णय के परिप्रेक्ष्य में प्रेस कांफ्रेंस में जानकारी दे रहे थे। उन्होंने बताया कि कोर्ट ने साफ कर दिया है कि भोजशाला व कमाल मौला मस्जिद का विवादित परिसर 18 मार्च, 1904 से 1958 के अधिनियम के अंतर्गत संरक्षित स्मारक है। कोर्ट ने विवादित परिसर के धार्मिक स्वरूप को माता वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर सहित भोजशाला माना है। साथ ही एएसआई के निदेशक द्वारा सात अप्रैल, 2003 को पारित आदेश के उस भाग को निरस्त कर दिया गया है, जिसमें हिन्दू समुदाय के पूजा-अधिकारों को सीमित किया गया था व मुस्लिम समुदाय को नमाज की अनुमति प्रदान की गई थी। महाधिवक्ता सिंह ने बताया कि भारत सरकार व एएसआई को भोजशाला मंदिर के प्रशासन, प्रबंधन और संस्कृत शिक्षा की व्यवस्था के संबंध में निर्णय लेने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही आदेशित किया है कि एएसआई सम्पूर्ण परिसर के संरक्षण, प्रबंधन एवं धार्मिक गतिविधियों के विनियमन की सर्वोच्च निगरानी संस्था बनी रहेगी। कोर्ट ने एएसआई को संरक्षण, संवर्धन व धार्मिक प्रवेश के नियमन पर पूर्ण पर्यवेक्षणीय अधिकार प्रदान किए हैं। लंदन संग्रहालय में स्थापित मां सरस्वती की प्रतिमा को भारत वापस लाकर भोजशाला परिसर में पुनः स्थापित करने संबंधी मांग पर कोर्ट ने कहा है कि भारत सरकार प्रस्तुत अभ्यावेदनों पर विधिसम्मत विचार कर सकती है। मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों की रक्षा हेतु कोर्ट ने कहा है कि यदि संबंधित पक्ष धार जिले में मस्जिद अथवा नमाज स्थल निर्माण के लिए भूमि आवंटन का आवेदन प्रस्तुत करता है, तो राज्य सरकार विधि अनुसार उपयुक्त एवं स्थायी भूमि आवंटन पर विचार कर सकती है। कोर्ट ने हिन्दू फ्रंट फार जस्टिस व कुलदीप तिवारी द्वारा दायर याचिकाओं को स्वीकार किया, जबकि मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी, काजी जकुल्लाह सहित अन्य द्वारा दायर याचिकाएं व अपीलें निरस्त कर दीं। इन्होंने रखा पक्ष ....... महाधिवक्ता सिंह ने बताया कि कोर्ट ने सभी पक्षों के वरिष्ठ अधिवक्ताओं द्वारा गरिमापूर्ण व सौहार्दपूर्ण वातावरण में की गई बहस की सराहना की। यह निर्णय भोजशाला प्रकरण में लंबे समय से चले आ रहे विवाद के न्यायिक निष्कर्ष के रूप में देखा जा रहा है और इससे संबंधित प्रशासनिक एवं धार्मिक व्यवस्थाओं के लिए नई दिशा निर्धारित होने की संभावना है। सुनवाई के दौरान शासन की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह के साथ उनकी टीम के अतिरिक्त महाधिवक्ता नीलेश यादव, अतिरिक्त महाधिवक्ता राहुल सेठी, अतिरिक्त महाधिवक्ता धीरेन्द्र सिंह परमार, अतिरिक्त महाधिवक्ता आशीष यादव, अतिरिक्त महाधिवक्ता सोनल गुप्ता, उप महाधिवक्ता सुदीप भार्गव, उप महाधिवक्ता श्रेयराज सक्सेना, उप महाधिवक्ता स्वप्निल गांगुली, उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी ने पक्ष रखा। सुनील साहू / शहबाज/ 15 मई 2026 / 07.00