नई दिल्ली (ईएमएस)। भारत की राजनीति में हालिया चुनावी नतीजों के बाद एक नई बहस शुरू हो गई है। असम और पश्चिम बंगाल में मिली राजनीतिक सफलता के बाद अब यह चर्चा तेज है कि क्या यही चुनावी रणनीति आने वाले विधानसभा चुनावों में पूरे देश में अपनाई जाएगी। खासकर 2027 में होने वाले बड़े चुनावों को देखते हुए राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीतियां तेज कर दी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि असम और पश्चिम बंगाल में जिस तरह पहचान, सुरक्षा, क्षेत्रीय अस्मिता, महिला भागीदारी और सामाजिक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दों को एक साथ जोड़कर चुनावी अभियान चलाया गया, उसने मतदाताओं के बीच मजबूत असर छोड़ा। अब यही रणनीति अन्य राज्यों में भी दिखाई दे सकती है। उत्तर प्रदेश को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा है, क्योंकि यहां चुनावी गणित बाकी राज्यों से अलग माना जाता है। यहां जातीय समीकरण, धार्मिक पहचान, क्षेत्रीय प्रभाव और सामाजिक गठजोड़ एक साथ चुनावी परिणाम तय करते हैं। ऐसे में किसी भी राष्ट्रीय रणनीति की असली परीक्षा उत्तर प्रदेश में ही मानी जा रही है। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि आने वाले समय में क्षेत्रीय दलों को चुनौती देने के लिए बड़े दल स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श के साथ जोड़ने की कोशिश करेंगे। महिला प्रतिनिधित्व, सामाजिक सुरक्षा, सीमा सुरक्षा, सांस्कृतिक पहचान और कल्याणकारी योजनाओं को चुनावी विमर्श का केंद्र बनाया जा सकता है। 2027 में कई महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव होने हैं। ऐसे में असम और पश्चिम बंगाल की राजनीतिक रणनीति क्या वास्तव में राष्ट्रीय टेंपलेट बनेगी, यह आने वाले महीनों की राजनीतिक गतिविधियां तय करेंगी। फिलहाल इतना साफ है कि देश की चुनावी राजनीति एक नए दौर में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। सुबोध/१५-०५-२०२६