जिस परंपरा ने विश्व को “वसुधैव कुटुम्बकम्” सिखाया, उसे मिटाने की बातें केवल वैचारिक अहंकार हैं तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर सनातन धर्म को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। तमिलनाडु के पूर्व उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने विधानसभा में यह कहा कि “लोगों को बांटने वाले सनातन धर्म को खत्म किया जाना चाहिए।” यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने ऐसा बयान दिया हो। इससे पहले वर्ष 2023 में भी उन्होंने सनातन धर्म की तुलना डेंगू, मलेरिया और कोरोना जैसी बीमारियों से की थी। उस बयान पर पूरे देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी और बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी उन्हें यह कहते हुए फटकार लगाई थी कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्ति को अपने शब्दों के परिणामों का ध्यान रखना चाहिए। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी को प्राप्त है, लेकिन यह स्वतंत्रता किसी आस्था, संस्कृति या करोड़ों लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का अधिकार नहीं देती। किसी भी धर्म, परंपरा या संस्कृति पर टिप्पणी करने से पहले व्यक्ति को स्वयं का आत्ममंथन करना चाहिए। विशेष रूप से तब, जब वह व्यक्ति किसी संवैधानिक पद पर हो या जनता के बीच प्रभाव रखता हो। शब्द केवल शब्द नहीं होते, वे समाज में विचारों और भावनाओं की दिशा तय करते हैं। इसलिए सार्वजनिक मंचों पर दिया गया हर बयान जिम्मेदारी की मांग करता है। सनातन धर्म केवल एक धार्मिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह भारत की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक चेतना का आधार है। यह विश्व का सबसे प्राचीन जीवन दर्शन माना जाता है। जब दुनिया के अनेक हिस्सों में सभ्यता का विकास प्रारंभ भी नहीं हुआ था, तब भारत में वेद, उपनिषद, गीता और पुराण मानव जीवन के उच्चतम आदर्शों की व्याख्या कर रहे थे। सनातन ने केवल पूजा-पद्धति नहीं दी, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाई। सत्य, अहिंसा, करुणा, सेवा, प्रकृति संरक्षण, परिवार व्यवस्था और मानवता का संदेश इसी परंपरा से निकला। भारत की पहचान केवल उसकी सीमाओं से नहीं होती, बल्कि उसकी संस्कृति से होती है, और उस संस्कृति की आत्मा सनातन परंपरा है। मंदिर, तीर्थ, पर्व, योग, आयुर्वेद, गीता, रामायण, महाभारत, गुरुकुल परंपरा, परिवार व्यवस्था और “अतिथि देवो भव” जैसे संस्कार इसी सनातन चेतना की देन हैं। आज पूरी दुनिया योग को अपना रही है, भारतीय दर्शन का अध्ययन कर रही है, अध्यात्म की ओर आकर्षित हो रही है। ऐसे समय में यदि भारत में ही कुछ लोग सनातन को समाप्त करने की बात करें, तो यह केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं बल्कि अपनी जड़ों से दूरी का संकेत भी माना जाएगा। यह भी ध्यान देने योग्य है कि सनातन धर्म ने कभी किसी पर जबरन अपनी मान्यताएं नहीं थोपीं। इस परंपरा ने हमेशा विचारों की स्वतंत्रता को महत्व दिया। यहां चार्वाक जैसे नास्तिक विचारक भी सम्मानित हुए और बुद्ध, महावीर जैसे महापुरुषों को भी स्थान मिला। भारत की यही विशेषता रही कि यहां मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं होने चाहिए। सनातन का मूल संदेश ही सहिष्णुता और समावेशिता है। इसलिए इसे विभाजनकारी कहना इतिहास और वास्तविकता दोनों के साथ अन्याय है। यह सत्य है कि समाज में समय-समय पर कुछ कुरीतियां आईं। सती प्रथा, अस्पृश्यता जैसी बुराइयों का विरोध भी इसी देश के संतों, समाज सुधारकों और आध्यात्मिक नेताओं ने किया। लेकिन किसी सामाजिक विकृति को पूरे सनातन धर्म का चेहरा बताना उचित नहीं है। यदि किसी परिवार में कोई गलती हो जाए तो पूरा परिवार गलत नहीं हो जाता। उसी प्रकार कुछ सामाजिक विकृतियों के आधार पर हजारों वर्षों की संस्कृति को समाप्त करने की बात करना तर्कसंगत नहीं कहा जा सकता। आज एक चिंताजनक प्रवृत्ति यह भी दिखाई देती है कि हिंदू देवी-देवताओं और सनातन परंपराओं पर टिप्पणी करना कुछ लोगों के लिए फैशन बन गया है। फिल्मों, राजनीति, सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर बार-बार हिंदू आस्थाओं को निशाना बनाया जाता है। जबकि अन्य धर्मों के प्रति वही लोग अत्यधिक सावधानी बरतते हैं। यह दोहरा रवैया समाज में असंतुलन पैदा करता है। यदि वास्तव में समानता और धर्मनिरपेक्षता की बात करनी है, तो सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान होना चाहिए। केवल सनातन को निशाना बनाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। सनातन धर्म को मिटाने की बातें करने वाले शायद यह भूल जाते हैं कि यह परंपरा किसी व्यक्ति, संगठन या राजनीतिक दल पर आधारित नहीं है। यह हजारों वर्षों से चली आ रही आध्यात्मिक धारा है। अनेक आक्रमण हुए, विदेशी शक्तियां आईं, मंदिर तोड़े गए, संस्कृति को कमजोर करने के प्रयास हुए, लेकिन सनातन हर बार और अधिक शक्ति के साथ खड़ा हुआ। क्योंकि इसकी जड़ें केवल जमीन में नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और जीवन में हैं। भारत को “देवभूमि” और “कर्मभूमि” कहा जाता है। भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण, भगवान शिव, माता दुर्गा और अनेक दिव्य परंपराएं इसी भूमि से जुड़ी हैं। यह वही भूमि है जहां ऋषियों ने तप किया, जहां वेदों की रचना हुई और जहां मानवता को धर्म का मार्ग मिला। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि सनातन केवल एक धर्म नहीं, बल्कि भारत की आत्मा है। जिस राष्ट्र की आत्मा इतनी प्राचीन और गहरी हो, उसे समाप्त करने की कल्पना भी संभव नहीं है। राजनीति में विचारों का संघर्ष स्वाभाविक है, लेकिन वोट बैंक की राजनीति के लिए धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाना खतरनाक प्रवृत्ति है। नेताओं को समझना चाहिए कि वे केवल अपने समर्थकों के नहीं, पूरे समाज के प्रतिनिधि होते हैं। उनके शब्द करोड़ों लोगों को प्रभावित करते हैं। इसलिए उन्हें ऐसा कोई बयान देने से बचना चाहिए जिससे समाज में तनाव या विभाजन पैदा हो। आज आवश्यकता इस बात की है कि सभी धर्मों और परंपराओं के प्रति सम्मान की भावना रखी जाए। किसी भी धर्म की आलोचना करने से पहले उसके इतिहास, दर्शन और योगदान को समझना चाहिए। सनातन धर्म ने विश्व को शांति, सह-अस्तित्व और मानवता का संदेश दिया है। “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और “वसुधैव कुटुम्बकम्” जैसी अवधारणाएं आज भी पूरी दुनिया के लिए मार्गदर्शक हैं। सनातन को मिटाने की बातें करने वाले आएंगे और चले जाएंगे, लेकिन सनातन की धारा अनंत काल तक बहती रहेगी। क्योंकि यह किसी सत्ता का नहीं, सत्य का मार्ग है। यह केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि जीवन का विज्ञान है। इसलिए किसी भी व्यक्ति को सनातन पर टिप्पणी करने से पहले उसके इतिहास, उसकी गहराई और उसके आध्यात्मिक महत्व को समझना चाहिए। यही भारत की संस्कृति है और यही इस देश की असली पहचान भी। ईएमएस/16/05/2026