राष्ट्रीय
18-May-2026
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वोट बंटवारे से टीएमसी को भारी नुकसान कोलकाता(ईएमएस)। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों ने यह साबित कर दिया है कि विपक्षी एकजुटता के बिना चुनाव जीतना आसान नहीं है। पश्चिम बंगाल में भाजपा विरोधी वोटों के बंटवारे की वजह से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को करीब तीन दर्जन सीटों का भारी नुकसान उठाना पड़ा है। चुनाव परिणामों के आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि सूबे की 294 विधानसभा सीटों में से भाजपा 207 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है, जबकि टीएमसी के खाते में महज 80 सीटें ही आई हैं। इस चुनाव में कांग्रेस को 2 और लेफ्ट को 1 सीट पर संतोष करना पड़ा है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, अगर पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव से पहले कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया होता, तो राज्य की सियासी तस्वीर पूरी तरह अलग हो सकती थी। प्रदेश की एक दर्जन से अधिक सीटों पर कांग्रेस ने टीएमसी के खेल को सीधे तौर पर प्रभावित किया है। साल 2021 के चुनाव में इनमें से 10 सीटें टीएमसी के पास थीं, लेकिन इस बार इन सीटों पर कांग्रेस को टीएमसी और भाजपा के बीच जीत-हार के अंतर से भी अधिक वोट मिले हैं। इसके अलावा, छह सीटों पर टीएमसी को नोटा की वजह से नुकसान हुआ, जहां कांग्रेस को नोटा से ज्यादा वोट प्राप्त हुए थे। वोटों के इस बिखराव का सीधा फायदा भाजपा को मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में भी मिला। मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर की कुल 43 सीटों में से 20 सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की। इसका मुख्य कारण यह रहा कि मुस्लिम मतदाता कांग्रेस, लेफ्ट, इंडियन सेकुलर फ्रंट और अन्य क्षेत्रीय दलों के बीच बंट गए, जबकि पिछले चुनाव में यह वोट बैंक पूरी तरह टीएमसी के पक्ष में एकजुट था। 2021 में टीएमसी ने इन 43 में से 35 सीटें जीती थीं और भाजपा को सिर्फ आठ सीटें मिली थीं। पश्चिम बंगाल में वामदलों (लेफ्ट) के पास आज भी करीब सात फीसदी का मजबूत वोट बैंक मौजूद है। विश्लेषकों का मानना है कि कई दर्जन सीटें ऐसी हैं, जहां लेफ्ट और कांग्रेस को मिले संयुक्त वोट टीएमसी की हार के अंतर से कहीं अधिक हैं। विपक्षी नेताओं का कहना है कि अब वक्त आ गया है जब सभी क्षेत्रीय पार्टियों को जमीनी स्थिति को समझना होगा और भाजपा को हराने के लिए लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा चुनावों में भी बेहतर तालमेल और साझेदारी के साथ उतरना होगा। मतों का यह विभाजन इससे पहले गुजरात और दिल्ली के चुनावों में भी विपक्षी दलों को भारी नुकसान पहुंचा चुका है। वीरेंद्र/ईएमएस/18मई 2026