कैसा विरोधाभास है जिस समय विपक्ष को मौजूदा वैश्विक संकट के दौर में सरकार के कंधे से कंधा मिलाकर देशवासियों को संयम मितव्ययता और सहयोग की प्रेरणा देने का नैतिक दायित्व निर्वहन करना चाहिए उस समय समूचा विपक्ष पीएम मोदी और सरकार के खिलाफ बयानबाजी कर अपनी कुंठा निकाल रहा है। यही हमारे देश की औछी राजनीति और नेताओं की स्वार्थी और सिर्फ कुर्सी पाने की लिप्स तक सीमित सोच का नतीजा है। आपको बता दें कि दुनिया के बदलते हालात ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि कोई भी देश वैश्विक संकटों से पूरी तरह अलग रहकर सुरक्षित नहीं रह सकता। पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर अब केवल युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव कच्चे तेल की आपूर्ति, गैस, उर्वरक, खाद्य तेल, विदेशी मुद्रा भंडार और घरेलू महंगाई तक दिखाई देने लगा है। भारत जैसे विशाल और ऊर्जा निर्भर देश के लिए यह स्थिति विशेष चिंता का विषय है। ऐसे समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ईंधन बचाने, गैर-जरूरी खर्च घटाने और एक वर्ष तक सोना न खरीदने की अपील केवल सामान्य सलाह नहीं, बल्कि आने वाले आर्थिक दबावों के प्रति देश को तैयार करने का संकेत है। साथ ही यह समय की मांग भी है। इस अपील को और प्रभावी बनाने के लिए प्रधानमंत्री ने स्वयं अपने काफिले का आकार कम करने का निर्णय लिया है। यह कदम सिर्फ दिखावा नहीं है यह व्यवहारिक प्रतीकात्मक होने के साथ-साथ अनुकरणीय भी साबित हुआ है। जब देश का सर्वोच्च नेतृत्व मितव्ययिता को अपने आचरण में उतारता है, तो उसका संदेश नीचे तक जाता है। सूत्रों के अनुसार प्रधानमंत्री ने अपनी सुरक्षा में तैनात विशेष सुरक्षा दल को निर्देश दिया है कि सुरक्षा मानकों से कोई समझौता किए बिना काफिले में वाहनों की संख्या कम की जाए। साथ ही, जहां तक संभव हो, नई गाड़ियां खरीदे बिना इलेक्ट्रिक वाहनों को शामिल करने की दिशा में भी काम किया जाए। यह निर्णय बताता है कि संकट के समय केवल जनता से अपेक्षा करना पर्याप्त नहीं, बल्कि नेतृत्व को स्वयं उदाहरण बनना होता है। जानकारी के अनुसार प्रधानमंत्री के निर्देशों का पालन शुरू भी हो चुका है। हैदराबाद में उनके संबोधन के बाद गुजरात और असम में उनके काफिले में वाहनों की संख्या घटाई गई है।अधिकांश भाजपा और एनडीए नीत सरकारों वाले राज्यों में तमाम मंत्रियों अधिकारियों ने इस तरह के कदम उठाए। हालांकि पीएम सुरक्षा से जुड़े अनिवार्य नियमों का पूरा ध्यान रखा जा रहा है। यह जरूरी भी है, क्योंकि प्रधानमंत्री की सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय है। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि सुरक्षा व्यवस्था के भीतर भी विवेकपूर्ण खर्च और संसाधनों का संतुलित उपयोग हो। यही संतुलन आज देश के हर स्तर पर अपनाने की जरूरत है। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भी इसी दिशा में पहल की है। विधायक पद की शपथ लेने के बाद उन्होंने कहा कि सुरक्षा कर्मियों को केवल आवश्यक वाहनों को ही काफिले में रखने को कहा गया है। उन्हें जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा और केंद्रीय सुरक्षा प्राप्त है, इसलिए उनके काफिले में स्वाभाविक रूप से अधिक वाहन रहते हैं। फिर भी प्रधानमंत्री की ईंधन बचत संबंधी अपील के बाद उन्होंने सुरक्षा प्रोटोकॉल बनाए रखते हुए काफिले को सीमित करने का निर्णय लिया। देश के अन्य मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों द्वारा भी इस तरह की पहल की जानी चाहिए। संकट के समय सरकार के बड़े पदों पर बैठे लोगों का व्यवहार जनता के मनोबल को प्रभावित करता है। आज आवश्यकता केवल सरकारी कटौती की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अनुशासन की है। वैश्विक स्तर पर चल रहे भू-राजनीतिक तनावों का असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर स्पष्ट रूप से दिखने लगा है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह चिंता व्यक्त की है कि पश्चिम एशिया में जारी संकट के कारण कच्चे तेल की कीमतों में जो उछाल आया है, उसका बोझ अब तक सरकार उठा रही है। लेकिन यदि यह संकट लंबे समय तक जारी रहता है, तो आम उपभोक्ताओं को भी ईंधन की बढ़ी हुई कीमतों का सामना करना पड़ सकता है। यह बयान चेतावनी भी है और तैयारी का संकेत भी। भारत सरकार ने अब तक पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों को स्थिर रखने का प्रयास किया है। इसके लिए शुल्क में कमी, नियंत्रित कीमतों में सीमित समायोजन और राजकोपीय संतुलन जैसे उपाय किए गए हैं। लेकिन कोई भी सरकार अनिश्चित काल तक अंतरराष्ट्रीय बाजार की बड़ी हुई कीमतों का पूरा बोझ स्वयं नहीं उठा सकती। यदि संकट लंबा खिंचता है, तो उसका कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं तक पहुंचना स्वाभाविक होगा। ऐसे में ईंधन की बचत केवल आर्थिक निर्णय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जिम्मेदारी बन जाती है। भारत की पश्चिम एशिया पर निर्भरता बहुत गहरी है। हमारे कुल आयात और निर्यात का बड़ा हिस्सा इस क्षेत्र से जुड़ा है। विदेशों में रहने वाले भारतीयों द्वारा भेजी जाने वाली राशि का बड़ा भाग भी इसी क्षेत्र से आता है। उर्वरक और गैस आपूर्ति में भी इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसका अर्थ है कि पश्चिम एशिया में अस्थिरता केवल पेट्रोल पंपों पर कीमत बढ़ने तक सीमित नहीं रहेगी। इसका असर खेती, उद्योग, रसोई, परिवहन, व्यापार और रोजगार तक दिखाई दे सकता है। इसलिए इस संकट को केवल तेल संकट मानना भूल होगी। यह व्यापक आर्थिक चुनौती है। आपूर्ति श्रृंखला में आने वाले झटकों का सबसे तीखा असर महंगाई पर पड़ता है। भारत में खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में अभी भी काफी अधिक है। यदि ईंधन महंगा होता है, तो माल ढुलाई महंगी होती है। माल दुलाई महंगी होती है तो सब्जी, अनाज, दाल, दूध, निर्माण सामग्री और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं। इस तरह तेल की कीमत में वृद्धि धीरे-धीरे आम आदमी की थाली तक पहुंच जाती है। यही कारण है कि इस समय इंधन बचत को केवल पर्यावरण या परिवहन का मुद्दा नहीं समझना चाहिए। यह महंगाई नियंत्रण से भी सीधे जुड़ा हुआ है। सरकार और रिजर्व बैंक दोनों के सामने चुनौती यह है कि वैश्विक संकट का घरेलू असर सीमित रखा जाए। मौद्रिक नीति महंगाई को नियंत्रित करने का एक साधन हो सकती है, लेकिन आपूर्ति पक्ष के बड़े झटकों से केवल ब्याज दरों के सहारे नहीं निपटा जा सकता। इसके लिए सरकार, उद्योग, प्रशासन और जनता सभी को मिलकर काम करना होगा। जहां सरकार खर्च में अनुशासन लाए, वहीं नागरिक भी अपनी जीवनशैली में थोड़ी सावधानी बरतें। अनावश्यक यात्रा, दिखावटी खर्च, अत्यधिक ईंधन खपत और आयातित वस्तुओं पर निर्भरता कम करना समय की जरूरत है। प्रधानमंत्री द्वारा सोने की खरीद टालने की अपील भी इसी व्यापक आर्थिक सोच का हिस्सा है। भारत में सोना भावनात्मक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, लेकिन बड़े पैमाने पर सोना आयात करने से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है। संकट के समय यदि लोग कुछ समय के लिए सोने की गैर-जरूरी खरीद को टालते हैं, तो इससे देश को राहत मिल सकती है। इसी तरह पेट्रोल और डीजल की बचत से आयात बिल कम करने में सहायता मिलेगी। छोटी-छोटी बचतें जब करोड़ों नागरिकों द्वारा की जाती हैं, तो उनका प्रभाव बहुत बड़ा हो जाता है। संकट के समय राष्ट्रों की असली शक्ति केवल सेना, मुद्रा भंडार या सरकारी नीतियों से नहीं मापी जाती। वह जनता के अनुशासन, नेतृत्व के आचरण और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी से भी तय होती है। आज भारत के सामने अवसर है कि वह संयम, मितव्ययिता और आत्मनियंत्रण के माध्यम से इस चुनौती को अवसर में बदले। प्रधानमंत्री द्वारा काफिले में कटौती का कदम इसी दिशा में एक संदेश है कि कठिन समय में शुरुआत ऊपर से होनी चाहिए। अब आवश्यकता है कि यह संदेश सरकार के हर विभाग, हर राज्य, हर संस्था और हर नागरिक तक पहुंचे। यह समय भय का नहीं, समझदारी का है। यह समय घबराहट का नहीं, तैयारी का है। यदि नेतृत्व उदाहरण प्रस्तुत करे और जनता सहयोग दे, तो वैश्विक संकटों का असर कम किया जा सकता है। मितव्ययिता कमजोरी नहीं, बल्कि परिपक्व राष्ट्र का गुण है। आज देश को यही समझना होगा कि बचाया गया ईंधन, टाली गई अनावश्यक खरीद और रोका गया फिजूल खर्च केवल व्यक्तिगत बचत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय योगदान है। कठिन दौर में संयम ही सबसे बड़ा समाधान है। प्रधानमंत्री की अपील का प्रत्यक्ष परिणाम भी देखने को मिल रहा है एक ओर पैट्रोल डीजल की कम खपत और सोने की कम आयात से एक सप्ताह में ही विदेशी मुद्रा भंडार में इजाफा हुआ है पर अक्ल का अंधा विपक्ष अभी भी सिर्फ मोदी को घेरने में अपनी उर्जा खपा रहा है। बहरहाल एक दूरदृष्टि और सकारात्मकता से भरा नेतृत्व वैश्विक संकट के इस दौर में देश की आम जनता के लिए ढाल का काम करता रहेगा इसमें कोई संदेह नहीं है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं पिछले 38 वर्ष से लेखन और पत्रकारिता से जुड़े हैं) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 19 मई /2026