- शिशु और मातृ मृत्यु दर में राष्ट्रीय औसत से बेहतर सुधार - आईआईटी मद्रास के अध्ययन में खुलासा चेन्नई (ईएमएस)। साल 2021 में जब कोरोना महामारी की दूसरी लहर ने तमिलनाडु को अपनी चपेट में लिया, तब गर्भवती महिलाओं पर इसका सबसे बुरा असर पड़ा था। अस्पताल मरीजों से भरे थे और लॉकडाउन के कारण महिलाएं जांच के लिए क्लीनिक नहीं पहुंच पा रही थीं। इसके चलते घर पर होने वाली डिलीवरी (होम डिलीवरी) में 66.3 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हुई और मातृ मृत्यु दर भी लगभग दोगुनी हो गई थी। लेकिन इस संकट के बाद राज्य के स्वास्थ्य ढांचे में जो बदलाव आया, वह हैरान करने वाला है। आईआईटी मद्रास के एक होनहार अध्ययन में यह सामने आया है कि तमिलनाडु की स्वास्थ्य प्रणाली न केवल इस महामारी से उबर गई, बल्कि पहले से कहीं अधिक मजबूत होकर उभरी है। साल 2023 और 2024 तक राज्य में मातृ और नवजात स्वास्थ्य संकेतकों ने महामारी से पहले के स्तर को भी पीछे छोड़ दिया है। यह अध्ययन 108 आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं के साल 2017 से 2024 तक के एम्बुलेंस रजिस्ट्री डेटा पर आधारित है। आंकड़ों के अनुसार, अब होम डिलीवरी में 36.1 प्रतिशत की कमी आई है। इसके अलावा, गर्भपात के मामलों में 28 प्रतिशत और प्रसव के दौरान होने वाली जटिलताओं में 19.2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। नवजात मृत्यु दर में 17 प्रतिशत और शिशु मृत्यु दर में 14 प्रतिशत का सुधार हुआ है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मातृ मृत्यु अनुपात घटकर प्रति 1,00,000 जीवित जन्मों पर 37 मौतों पर आ गया है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस सफलता के पीछे राज्य सरकार द्वारा बजट आवंटन बढ़ाना, एम्बुलेंस के बेड़े का विस्तार, अधिक पैरामेडिक्स और प्रसूति रोग विशेषज्ञों की भर्ती और प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान जैसी योजनाओं को जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू करना रहा है। यह अनुभव सिखाता है कि संकट के समय आपातकालीन स्वास्थ्य ढांचे में किया गया निवेश लंबे समय तक जीवन बचाने का काम करता है। रामयश/ईएमएस 22 मई 2026