भारत में 1950 से संविधान लागू है। इस संविधान ने नागरिकों को अपना राजा चुनने का अधिकार दिया है। नागरिक अपने मताधिकार से बहुमत के आधार पर अपने जनप्रतिनिधि को चुनते हैं। नागरिक विधायक सांसद को चुनकर सरकार के रूप में स्वयं के ऊपर नियंत्रण करने का वैधानिक अधिकार सौंपते हैं। संविधान ने नागरिकों के मौलिक एवं संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा करने के लिए संविधान ने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना करते हुए, उनके अधिकार और कर्तव्य निश्चित किए। भारत सनातन धर्म की देवभूमि है। यहां पर जन्म लेने वाले भारतीय संस्कृति में जीने के आदी हैं। जब संविधान बना उस समय जिस तरह से ब्रम्हमांड के संचालन के लिए ब्रह्मा विष्णु और महेश को जिम्मेदार बनाया गया। उसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए भारत के संविधान निर्माताओं ने, जिसमें सभी वर्ग के लोग शामिल थे। उन्होंने विधायिका को कानून बनाने के अधिकार दिए। संविधान ने मौलिक अधिकारों में किसी भी तरह की छेड़छाड़ करने का अधिकार किसी को नहीं दिया। संविधान और कानून के अनुसार व्यवस्थाओं के संचालन का जिम्मा विधायिका और कार्यपालिका को सोंपा गया। दोनों को संविधान ने अधिकार दिए। अधिकारों का दुरुपयोग ना हो, संविधान के अनुसार नागरिकों के मौलिक अधिकार सुरक्षित रहें। इसकी जिम्मेदारी न्यायपालिका को दी गई। न्यायपालिका को विधायिका और कार्यपालिका द्वारा जो भी नियम कानून बनाए जांएगें वह सही हैं, या नहीं, उनका सही पालन हो रहा है, अथवा नहीं। इसकी समीक्षा करने का अधिकार न्यायपालिका को दिया गया। न्यायपालिका को संविधान ने असीमित अधिकार दिए हैं। संविधान के अनुसार विधायिका कार्यपालिका और नागरिक अपने कर्तव्य और अधिकारों का सही ढंग से पालन करें। इसके लिए न्यायपालिका को जिम्मेदार ठहराया गया। अब यही न्यायपालिका अपनी संबैधानिक जिम्मेदारी और दायित्वों का सही ढंग से निर्वाह नहीं कर रही है।जिसके कारण भारतीय लोकतंत्र और संविधान वर्तमान में सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। संविधान निर्माताओं ने कभी सोचा नहीं था। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका आपस में संगामिति करके नागरिकों का शोषण करेंगे। यह होता हुआ दिख रहा है। सरकार और कार्यपालिका मिलकर कुछ ऐसे नियम कानून बना रहे हैं। जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों का सीधे-सीधे हनन कर रहे हैं। नागरिकों को लंबे समय तक जेलों में बंद किया जा रहा है। नागरिकों के लिए अनावश्यक कानून एवं जबरिया टैक्स लगाए जा रहे हैं। नागरिकों की आजादी नियम और कानूनों से बाधित की जा रही है। सरकारों द्वारा जो कानून बनाए जा रहे हैं, उनमें पूंजीपतियों के लिए अलग कानून और नागरिकों के लिए अलग कानून और नियम बनाए जा रहे हैं। जब न्यायपालिका में इन कानूनो में किये गये भेदभाब को चुनौती दी जाती है। न्यायालयों में भी इस तरह के मामले में दो अलग-अलग तरीके के निर्णय आ रहे हैं। सरकार के दबाव अथवा सरकार की मिली भगत से न्यायपालिका जब संविधान का पालन नहीं कर रही हो, ऐसे में संविधान और लोकतंत्र को वास्तविक स्वरूप में बनाए रख पाना संभव नहीं है। जब भारत में अंग्रेजों के कानून लागू थे। उस समय भी 90 दिन से ज्यादा किसी भी आरोपी को जेल में रखना संभव नहीं होता था। 90 दिन के अंदर चार्ज शीट प्रस्तुत करना जरूरी होता था। गंभीर अपराध होता था तो जल्द से जल्द उसके बारे में अदालत निर्णय करती थी।चार्जशीट पेश होने पर अदालत तय करती थी। मुकदमा आगे चलेगा या नहीं। आरोपी के आरोप प्रमाणित होने पर उन्हें सजा दी जाती थी। इस प्रक्रिया में अंग्रेजों की सरकार होते हुए भी भारतीयों को यह विश्वास होता था। उनकी बात सुनी गई। आरोपी उसे आसानी से स्वीकार कर पाता था। वर्तमान में स्थिति ठीक इसके विपरीत है। अब इस तरह के कानून बनाए जा रहे हैं। जिसमें नागरिकों के साथ-साथ अदालतों के भी अधिकार सीमित किए जा रहे हैं। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट, सरकार के ऐसे कानून को सही ठहरा रहे हैं। जिससे आरोपियों को वर्षों तक जमानत नहीं मिल रही है। जांच एजेंसियां और पुलिस कई वर्षों तक जांच के नाम पर आरोपियों को न्यायिक हिरासत में जेल में बंद करके रखती हैं। पुलिस कई वर्षों तक फाइनल चार्ज शीट अदालत में प्रस्तुत नहीं करती है। आरोपी पर मुकदमा ही शुरू नहीं हो पाता है।जिस आरोपी को जेल में रखा गया है। उसकी जितनी सजा है, उससे ज्यादा समय विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में बंद रहता है। जिसका खामियाजा आरोपी के पूरे परिवार को भुगतना पड़ता है। भारतीय न्याय शास्त्र में मूलभूत सिद्धांत है। जमानत नियम है, जेल अपवाद है। सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में इस तरह के फैसले दिए हैं। जिसमें एक निश्चित समय सीमा के बाद किसी को भी जेल में बंद करके नहीं रखा जा सकता है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की खंडपीठ ने 2021 में निर्णय दिया था। यूपीए जैसे कठोर प्रावधान अनुच्छेद 21 के अंतर्गत नागरिकों को मिली संवैधानिक गारंटी को निस्प्रभावी नहीं बना सकते हैं। जेल में विचाराधीन कैदी का, लंबा कारावास, नागरिक अधिकारों के प्रति अन्याय है। ऐसी स्थिति में ट्रायल कोर्ट हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तीनों को ही अनुच्छेद 21 को ध्यान में रखते हुए आरोपी को जमानत देने का निर्णय लेना चाहिए। इसके बाद भी ट्रायल कोर्ट, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जमानत के मामलों में फैसला नहीं ले रहे हैं। आरोपी पर आरोप सिद्ध होने के पहले ही सजा देना, क्या यह अधिकारों का दुरुपयोग नहीं है। यह दुरुपयोग जब अदालतें स्वयं करने लगे, तो इससे बड़ी चिंता दूसरी नहीं हो सकती है। पिछले कुछ समय में जिस तरह के कानून बनाए गये हैं। उनमें लगातार भेदभाव किया जा रहा है। पूंजी पतियों और समर्थ लोगों के लिए अलग नियम और कानून हैं। आम नागरिकों के लिए अलग कानून है। जब यह मामले अदालत में चुनौती के रूप में सामने आते हैं, ऐसे समय पर अदालतें संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी करते हुए जो फैसले दे रही हैं। उसके कारण नागरिकों का विश्वास न्याय पालिका के प्रति वैसा नहीं रह गया है, जैसा पहले होता था। पिछले कुछ समय से केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा ऐसे कठोर कानून और नियम बनाए जा रहे हैं, जो संवैधानिक अधिकारों के विपरीत हैं। हाल ही में जो कानून बने हैं, उनमें नागरिकों के साथ जिस तरह का धार्मिक एवं अन्य तरह से भेदभाव किया जा रहा है। सरकार के साथ वैचारिक मतभेद को राष्ट्र द्रोह मानकर लंबे समय तक लोगों को जेलों में बंद रखा जा रहा है। विपक्षी दलों के नेतओं के खिलाफ जिस तरह से मुकदमें लगाये जा रहे हैं। जांच एजेंसियां और अदालतें सरकार के दबाव में काम करती हुई दिखती हैं। पिछले 75 वर्षों में जिस संविधान और लोकतंत्र की छाया में हम अधिकारों के साथ रहने के आदी हो गए थे। उसके विपरीत स्थिति होने से अब लोगों में गुस्सा देखने को मिल रहा है। न्यायपालिका की आलोचना पिछले कुछ वर्षों में बढ़ती ही जा रही है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक ही तरह के मामले में अलग-अलग निर्णय दिए जा रहे हैं। सत्ता पक्ष की ओर एक अलग झुकाव अदालतों का देखने को मिल रहा है विपक्ष और आम नागरिकों के मामले में अलग रुख अदालतें अख्तियार कर रही हैं। पूंजीपतियों को लेकर अदालतो के निर्णय अलग तरह के होते हैं। न्यायपालिका में जिस तरह से भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, न्याय में विलंब हो रहा है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संपत्ति के मौलिक अधिकारों को जिस तरह से कानून के नाम पर खत्म किया जा रहा है। उससे लोगों में भारी गुस्सा देखने को मिल रहा है। प्रश्न यह है भारत के लिखित संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों के होते हुए, पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से हर स्तर पर खत्म करने और गैर जिम्मेदारी देखने को मिल रही है। जिस किसी के पास अधिकार हैं, वह अपने आपको भगवान मानने लगता है। न्यायपालिका में बैठे जज अपने आप को भगवान से काम नहीं समझ रहे हैं। उनमें भी अधिकारों का अहंकार देखने को मिलने लगा है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट से बेरोजगारों के लिए कॉकरोच जैसी टिप्पणी की गई। अदालतों में सुनवाई के दौरान जजों द्वारा समय-समय पर तरह-तरह की टिप्पणी की जा रही है।फैसले उनके विपरीत होते हैं। अदालतों से आधे -अधूरे फैसले आ रहे हैं। उसको लेकर अब अदालतों के विरोध में स्वर उठने लगे हैं। न्यायपालिका को इस दिशा में विशेष ध्यान देने की जरूरत है। भीड़ तंत्र में ज्ञान नहीं होता है, भीड़ तंत्र बड़ी शक्ति होती है। भीड़ जब तक व्यवस्था, नियम कायदे कानून को मान रही होती है। तभी नियमों का पालन संभव है। अनियंत्रित भीड़ के सामने कोई भी नियम कायदा कानून काम नहीं आता है। यह बात न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका को समय रहते समझ में आ जानी चाहिए। यदि इसमें विलंब हुआ तो देश को बड़े पैमाने पर दुष्परिणाम झेलने पड़ सकते हैं। ईएमएस/23/05/2026