लेख
23-May-2026
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भारत की अर्थव्यवस्था पिछले एक दशक में जिस दिशा में आगे बढ़ी है, उसने विकास के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के लिये बड़े गंभीर सवाल भी खड़े किए हैं। वर्ष 2014 के बाद देश में “अच्छे दिन”, हर साल दो करोड़ नौकरियां, विदेशों से काला धन वापस लाने और हर परिवार के खाते में 15 लाख रुपये जैसे बड़े-बड़े वादों के सहारे आर्थिक समृद्धि का सपना दिखाया गया। 2026 तक आते-आते यह साफ दिखाई देने लगा है, इन वादों और वास्तविक आर्थिक स्थिति के बीच एक गहरी खाई बन चुकी है। देश की सबसे बड़ी ताकत युवा आबादी मानी जाती है, लेकिन विडंबना यह है, कि वही युवा आज सबसे ज्यादा बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा का सामना कर रहा है। शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी करोड़ों युवाओं को स्थायी रोजगार नहीं मिल पा रहा है। जहां नौकरियां मिलीं भी हैं, वहां ठेका व्यवस्था और कम वेतन ने युवाओं के शोषण को बढ़ावा दिया है। दूसरी ओर, सरकार भारत को दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने का दावा करती रही। आर्थिक विकास का लाभ आम नागरिक तक अपेक्षित रूप में नहीं पहुंच पाया। नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों को ऐतिहासिक आर्थिक सुधार बताया गया था, परंतु इनके दुष्परिणाम सबसे अधिक छोटे व्यापारियों, असंगठित क्षेत्र और लघु-उद्योगों को झेलने पड़े। नोटबंदी के बाद काला धन समाप्त करने का दावा किया गया, लेकिन अधिकांश नकदी फिर बैंकों में लौट आई। वहीं जीएसटी की जटिल व्यवस्था ने छोटे कारोबारियों की कमर तोड़ दी। लाखों छोटे और मध्यम उद्योग बंद होते चले गए, जिससे रोजगार के अवसर भी घटते गए। इस बीच महंगाई लगातार बढ़ती रही। पेट्रोल-डीजल, खाद, बिजली, बैंकिंग सेवाएं और दैनिक जरूरतों की वस्तुएं महंगी होती गईं, जबकि आम लोगों की आय उस अनुपात में नहीं बढ़ी। परिणामस्वरूप मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग कर्ज के जाल में फंसता चला गया। सरकार की कल्याणकारी योजनाओं, जैसे- मुफ्त राशन, आयुष्मान योजना, उज्ज्वला योजना या किसान सम्मान निधि का व्यापक प्रचार जरूर हुआ, लेकिन इनके क्रियान्वयन में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के कई मामले सामने आए हैं। कई ऑडिट रिपोर्टों में करोड़ों रुपयों के फर्जी भुगतान और वित्तीय गड़बड़ियों को उजागर किया है। भारतीय अर्थव्यवस्था की एक और बड़ी चुनौती बढ़ता कर्ज और राजकोषीय घाटा है। केंद्र और राज्य सरकारें लगातार बड़े पैमाने पर उधार लेकर विकास के दावे कर रही हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह विकास टिकाऊ है? विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर भृष्टाचार हो रहा है। कमीशन की राशि 30 से 50 फीसद तक पंहुच गई है। इस कमीशनखोरी में कैसा विकास हुआ है, इसे आसानी से समझा जा सकता है। जीडीपी की तुलना में कर्ज लगातार बढ़ता जा रहा है। ब्याज के भुगतान में सरकार के बजट का बड़ा हिस्सा खर्च होने से भविष्य में आर्थिक संकट और गहरा होगा। इसके साथ ही, आर्थिक असमानता भी तेजी से बढ़ी है। एक ओर कुछ बड़े उद्योगपतियों की संपत्ति कई गुना बढ़ी, वहीं दूसरी ओर आम नागरिक की बचत और क्रय-शक्ति कमजोर होती गई। ऑनलाइन व्यापार और वैश्विक कंपनियों के विस्तार ने स्थानीय कारोबारियों को भी प्रभावित किया है। छोटे दुकानदार और पारंपरिक व्यवसाय धीरे-धीरे बंद होते चले गये। रिटेल क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा हो गया। चिंता की बात यह भी है, भारत का आयात लगातार बढ़ रहा है, जबकि निर्यात अपेक्षित गति नहीं पकड़ पाया। विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ रहा है। वैश्विक हालात में पश्चिम एशिया का तनाव, तेल संकट और संभावित वैश्विक मंदी, भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं। ऐसे समय में यदि आर्थिक नीतियां संतुलित और दूरदर्शी न हों, तो संकट और गहरा सकता है। यह भी सत्य है, सरकार के लिए चुनाव जीतना और लोकप्रिय घोषणाएं करना आसान होता है, सरकारों के लिए वास्तविक चुनौती देश की आर्थिक नींव को मजबूत बनाने की होती है। यदि बड़ी आबादी रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रही है, इससे सामाजिक असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है। इतिहास गवाह है कि आर्थिक असमानता और बेरोजगारी लंबे समय तक बनी रहे, तो सामाजिक व्यवस्था पर भी उसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। सरकार को जनता के गुस्से का शिकार होना पड़ता है। आज जरूरत इस बात की है कि सरकार प्रचार आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर उत्पादन, रोजगार, कृषि, लघु-उद्योग और सामाजिक सुरक्षा पर गंभीरता से ध्यान दे। युवाओं के लिए रोजगार, छोटे उद्योगों के लिए सरल कर व्यवस्था, मंहगाई और भ्रष्टाचार पर सख्त नियंत्रण समय की मांग है। सरकार के लिए आर्थिक नीतियों का आधार केवल टैक्स कलेक्शन नहीं, बल्कि आम नागरिकों का जीवन बेहतर हो, यह प्राथमिकता होना चाहिए। तभी भारत वास्तव में एक मजबूत और संतुलित अर्थव्यवस्था वाला देश बन सकेगा। वर्तमान अर्थव्यवस्था का संकट बहुत बड़ा है। इस पर नियंत्रण के लिये सरकार को बेहतर अर्थशास्त्रियों को चुनना होगा। अभी वित्त मंत्रालय, नीति आयोग तथा रिजर्व बैंक में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी बैठे हैं, जो सरकार के दबाव में काम कर रहे हैं। इन्हें हटाकर योग्य व्यक्तियों का चयन ही सरकार को संकट से बचा सकता है। .../ 23 मई /2026