अंतर्राष्ट्रीय
23-May-2026
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-1877-78 का सुपर एल नीनो सबसे विनाशकारी -भारत के कृषि क्षेत्र को सबसे बड़ा नुकसान वाशिंगटन (ईएमएस)। वर्ष 2026 के अंत तक ‘सुपर एल नीनो’ जैसी खतरनाक जलवायु स्थिति विकसित हो सकती है, जिसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर देखने को मिलेगा। प्रशांत महासागर में तेजी से बदलते समुद्री तापमान ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह घटना सूखा, बाढ़, भीषण तूफान, खाद्य संकट और बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान जैसी स्थितियां पैदा कर सकती है। अमेरिका की नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक मई से जुलाई 2026 के बीच अल नीनो बनने की संभावना 82 प्रतिशत तक पहुंची है। वहीं दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 के दौरान इसके बने रहने की संभावना 96 प्रतिशत है। रिपोर्ट में बताया गया हैं कि सुपर एल नीनो बनने की आशंका लगातार बढ़ रही है और कुछ मौसम मॉडल इस अत्यधिक गंभीर स्तर तक पहुंचने की संभावना जता रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार सुपर अल नीनो उस स्थिति को कहा जाता है जब प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 2 से 3 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ जाता है। समुद्र के तापमान में यह बदलाव वैश्विक मौसम प्रणाली को प्रभावित करता है। इससे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौसम का संतुलन बिगड़ जाता है और अत्यधिक गर्मी, बारिश या सूखे जैसी स्थितियां पैदा होने लगती हैं। इतिहास में 1877-78 का सुपर एल नीनो सबसे विनाशकारी माना जाता है। उस दौरान भारत, चीन, ब्राजील और अफ्रीका के कई हिस्सों में भयंकर सूखा पड़ा था। फसलों के नष्ट होने से बड़े पैमाने पर अकाल फैला और करोड़ों लोगों की मौत हुई थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इस बार भी वैसी स्थिति बनती है,तब ग्लोबल वार्मिंग के कारण इसका असर और ज्यादा गंभीर हो सकता है। भारत पर इसका सबसे बड़ा प्रभाव मानसून पर दिख सकता है। सामान्य तौर पर अल नीनो के दौरान मानसून कमजोर हो जाता है, जिससे वर्षा कम होती है और खरीफ फसलों का उत्पादन कम होता है। इससे किसानों की आय पर असर पड़ सकता है और खाद्यान्न संकट की स्थिति भी बन सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते तैयारी नहीं की गई, तब कृषि क्षेत्र को भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है। दुनिया के अन्य हिस्सों में भी इसके अलग-अलग प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। दक्षिण अमेरिका में अत्यधिक बारिश और बाढ़, ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में सूखा, अमेरिका के कुछ हिस्सों में ठंडी और नम सर्दियां तथा प्रशांत महासागर क्षेत्र में अधिक शक्तिशाली तूफानों की संभावना है। इसके अलावा समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर भी खतरा बढ़ सकता है। कोरल ब्लीचिंग, मछली उत्पादन में गिरावट और समुद्री कटाव जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। भारतीय मौसम विभाग सहित कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। भारत पर पड़ा था सबसे बुरा प्रभाव मानसून की बारिश न होने से भारत सबसे बुरी तरह प्रभावित क्षेत्रों में से एक था। यहां लंबे समय तक सूखा और अकाल जैसे हालात बने थे। एक अनुमान के मुताबिक, भारत में एक करोड़ से ज्यादा लोगों की जान चली गई थी। जबकि, उत्तरी चीन में विनाशकारी सूखे के कारण फसलें बर्बाद हो गईं। ब्राजील में नदियां सूख गई थीं और कृषि व्यवस्था ठप हुई थीं। वहीं अफ्रीका, दक्षिणपूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में भी भीषण सूखा और जंगल की आग का कहर बरपा था। सुपर अल नीनो ने सबसे बड़ी अकाल को जन्म दिया था। जिससे दुनिया भर में समाजों को कमजोर किया। वहीं कुछ क्षेत्रों में औपनिवेशिक नियंत्रण और ज्यादा सख्त कर लगे। इससे लोगों के विस्थापन और प्रवासन को गति मिली। कमजोर आबादी वाले क्षेत्रों में मलेरिया, प्लेग, पेचिश, चेचक और हैजा जैसी बीमारियों का भी प्रकोप तेजी से फैला था। क्या होता है सुपर अल नीनो? अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु पैटर्न है जो हर दो से सात साल में एक गर्म अल नीनो और एक ठंडा ला नीना स्टेज के बीच घटित होता है। अल नीनो के इस चक्र के दौरान, प्रशांत महासागर में जमा होने वाला गर्म पानी फैल जाता है और पृथ्वी के औसत सतही तापमान को बढ़ा देता है। यह गर्मी अंत में वायुमंडल में निकल जाती है, जिससे हमारे पृथ्वी का तापमान महीनों तक बढ़ जाता है। जहां समुद्र की सतह का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक होता है। इस घटना को अक्सर सुपर एल नीनो कहा जाता है। हालांकि वैज्ञानिक स्वयं इस शब्द का प्रयोग नहीं करते हैं। 1877 जैसे विनाशकारी परिणाम अब नहीं सामने आएंगे सुपर अल नीनो के संभावित प्रभाव को लेकर चिंताओं के बावजूद, विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु निगरानी और पूर्वानुमान में हुई प्रगति के कारण दुनिया अब इसके परिणामों से निपटने के लिए तैयार है। विशेषज्ञों ने कहा है कि 1877 से जुड़े विनाशकारी नुकसान आज दोहराना की संभावना नहीं है। क्योंकि, तब जैसे सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक हालात अब नहीं है। आशीष/ईएमएस 23 मई 2026