राष्ट्रीय
25-May-2026


हाईकोर्ट जाने की तैयारी में सदस्य और कर्मचारी नई दिल्ली(ईएमएस)।दिल्ली के ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित दिल्ली जिमखाना क्लब को खाली कराने के केंद्र सरकार के फैसले पर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सरकार ने क्लब को आगामी 5 जून तक अपनी 27.3 एकड़ जमीन और पूरी संपत्ति खाली करने का सख्त निर्देश दिया है। सरकार के इस अप्रत्याशित कदम के खिलाफ क्लब के स्थायी सदस्य और कर्मचारी अब एकजुट हो गए हैं और वे इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं। सरकार का तर्क है कि सफदरजंग रोड स्थित यह बेशकीमती जमीन ‘अत्यंत संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्र’के अंतर्गत आती है, जिसका उपयोग रक्षा ढांचे को मजबूत करने और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए किया जाएगा। हालांकि, क्लब के सदस्यों ने सुरक्षा से जुड़े सरकार के इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया है। इस कानूनी लड़ाई के लिए क्लब की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी को नियुक्त किया गया है। जानकारी के अनुसार, दिल्ली हाईकोर्ट में दो अलग-अलग याचिकाएं दायर की जाएंगी, जिनमें से एक क्लब के सदस्यों की तरफ से और दूसरी वहां काम करने वाले करीब 600 कर्मचारियों की तरफ से होगी। 113 साल पुराने इस क्लब के स्थायी सदस्यों ने हाल ही में एक आपात बैठक कर आगे की रणनीति तय की। यह बैठक भूमि एवं विकास कार्यालय (एलएंडडीओ) के उस आदेश के तुरंत बाद बुलाई गई, जिसमें परिसर खाली करने को कहा गया था। सरकारी अधिकारियों का कहना है कि सरकार लीज की शर्तों के तहत जनहित में जमीन वापस लेने का कानूनी अधिकार रखती है। यह उन दुर्लभ मामलों में से एक है, जहां सरकार ने स्थायी लीज को समय से पहले समाप्त कर ‘री-एंट्री’ की प्रक्रिया शुरू की है। इस फैसले से क्लब के सदस्यों के साथ-साथ वहां काम करने वाले सैकड़ों कर्मचारियों की आजीविका पर बड़ा संकट मंडराने लगा है। क्लब से जुड़े सेवानिवृत्त जनरल पीके सहगल ने कहा कि बिना किसी पूर्व चेतावनी के लिया गया यह फैसला 600 कर्मचारियों की नौकरी छीन लेगा। जिमखाना एम्प्लॉयी वेलफेयर एसोसिएशन ने भी इस आदेश का कड़ा विरोध किया है। एसोसिएशन के अध्यक्ष नंदन सिंह नेगी ने कहा कि कई कर्मचारी पिछले 25-30 वर्षों से यहां सेवाएं दे रहे हैं और इस फैसले से उनके परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। क्लब के पूर्व पदाधिकारियों ने सुरक्षा संबंधी तर्कों पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह क्लब 1930 के दशक से यहां स्थापित है, जबकि प्रधानमंत्री आवास बहुत बाद में इस इलाके में आया। इस बीच, देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी और पूर्व रॉ प्रमुख एएस दुलत जैसी जानी-मानी हस्तियों ने भी इस पर चिंता व्यक्त की है। किरण बेदी ने इसे देश की खेल और संस्थागत विरासत का हिस्सा बताते हुए सरकार से फैसले पर पुनर्विचार की उम्मीद जताई है। इतिहासकार स्वप्ना लिडले ने भी इसके ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित किया है। अब यह मामला कानूनी और सामाजिक स्तर पर एक बड़ा मुद्दा बन चुका है, जिस पर जल्द ही हाईकोर्ट में सुनवाई होने की उम्मीद है। वीरेंद्र/ईएमएस/25मई 2026