राष्ट्रीय
27-May-2026
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नई दिल्ली,(ईएमएस)। चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। यादव ने आरोप लगाया है कि शीर्ष अदालत ने संवेदनशील मामले में संवैधानिक अदालत के बजाय एक उपभोक्ता मंच की तरह काम किया है। उन्होंने दावा किया कि अंतिम फैसला बहुत पहले ही तय हो चुका था। यादव ने कहा कि वे अंतिम फैसला सुनने के लिए अदालत नहीं गए, क्योंकि उनके विचार में सिर्फ लिखित दस्तावेज और बारीकियाँ ही बाकी थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि तीन दिनों की सुनवाई के बावजूद, पीठ ने एसआईआर की संवैधानिकता की जांच करने के बजाय शिकायत निवारण और मध्यस्थता पर ध्यान केंद्रित किया। यादव के अनुसार, जब सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) को एसआईआर के बाद मतदाता सूचियों में कथित खामियों को दूर किए बिना ही बिहार चुनाव कराने की अनुमति दे दी, तभी मामला प्रभावी रूप से तय हो गया था। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को एसआईआर प्रक्रिया संचालित करने की शक्ति को बरकरार रखा है, यह कहकर कि यह लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया को नई जान देती है। यह फैसला चुनाव आयोग पर लगे उन आरोपों के बीच आया है, जिसमें आलोचकों ने मतदाता सूची के शुद्धिकरण के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाने के पीछे राजनीतिक मकसद होने का दावा किया था। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने बताया कि मतदाता सूची से नाम हट जाना नागरिकता खोने के समान नहीं है। यादव ने दावा किया कि जब अदालत मामले की सुनवाई जारी रखे हुए थी, ईसीआई ने एसआईआर के क्रमिक चरणों को आगे बढ़ाया, जिससे यह प्रक्रिया एक अंततः सिद्ध तथ्य बन गई। उन्होंने पीठ के उन बयानों की भी आलोचना की, जिसमें कहा गया था कि मतदाता सूचियों से बाहर किए गए मतदाता अगले चुनाव में भाग ले सकते हैं। आशीष दुबे / 27 मई 2026