- हॉर्नबिल से कठफोड़वा तक, प्रकृति के ये मौन रक्षक बीज फैलाकर, कीटों को खत्म कर और हरियाली बचाकर पर्यावरण को नया जीवन दे रहे हैं - पश्चिमी घाट से गांधीसागर अभयारण्य तक पक्षियों की यह अनोखी भूमिका बता रही है कि जैव विविधता ही धरती की असली सुरक्षा कवच है धरती पर जीवन का आधार केवल मनुष्य नहीं, बल्कि प्रकृति का पूरा तंत्र है। जंगल, नदियां, पर्वत, पेड़-पौधे और जीव-जंतु मिलकर पर्यावरण का संतुलन बनाए रखते हैं। इस विशाल प्राकृतिक व्यवस्था में पक्षियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। छोटे से दिखने वाले ये जीव न केवल वातावरण को सुंदर बनाते हैं, बल्कि जंगलों को जीवित रखने में भी बड़ी जिम्मेदारी निभाते हैं। आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन, जंगलों की कटाई और बढ़ते प्रदूषण जैसी समस्याओं से जूझ रही है, तब कई पक्षी प्रकृति के मौन प्रहरी बनकर पर्यावरण को बचाने का काम कर रहे हैं। भारत के पश्चिमी घाट से लेकर मध्य प्रदेश के गांधीसागर अभयारण्य तक ऐसी कई मिसालें सामने आ रही हैं, जहां पक्षी जंगलों को फिर से हरा-भरा बनाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। पश्चिमी घाट में इंडियन हॉर्नबिल को आज “जंगलों का किसान” कहा जा रहा है। इसकी वजह है इसकी अनोखी आदत। हॉर्नबिल स्थानीय फलों को खाता है और उनके बीज दूर-दूर तक फैला देता है। ये बीज घने जंगलों के भीतर गिरकर नए पौधों का रूप लेते हैं। इस तरह यह पक्षी प्राकृतिक तरीके से जंगलों का विस्तार करता है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हॉर्नबिल न हों, तो पश्चिमी घाट की कई दुर्लभ वनस्पतियां धीरे-धीरे समाप्त हो सकती हैं। यही कारण है कि कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में पर्यावरण प्रेमियों ने हॉर्नबिल के पसंदीदा पेड़ों के बगीचे तैयार करने शुरू कर दिए हैं। कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के मनोहर उपाध्याय जैसे लोग बरगद, पीपल, जामुन, आम और महुआ जैसे स्थानीय पेड़ों को बड़े पैमाने पर लगा रहे हैं। इन पेड़ों पर फल लगते हैं, जिन्हें हॉर्नबिल बड़े चाव से खाते हैं। इसके बाद यह पक्षी जंगलों के भीतर उड़ते हुए बीजों को नई जगहों तक पहुंचा देता है। प्रकृति के इस चक्र से बिना किसी कृत्रिम प्रयास के जंगलों में नए पौधे उगने लगते हैं। यही कारण है कि पश्चिमी घाट के कई क्षेत्रों में फिर से हरियाली लौटती दिखाई दे रही है। विशेषज्ञ बताते हैं कि हॉर्नबिल केवल बीज फैलाने का काम नहीं करता, बल्कि वह जंगलों की जैव विविधता को भी मजबूत बनाता है। जब नए पेड़ उगते हैं, तो वहां छोटे जीव-जंतु, कीट, तितलियां और दूसरे पक्षी भी लौटने लगते हैं। इससे पूरा पारिस्थितिक तंत्र मजबूत होता है। पश्चिमी घाट जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में यह प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। वहां रहने वाले लोग भी अब समझने लगे हैं कि यदि पक्षियों को सुरक्षित रखा जाए, तो जंगल खुद को दोबारा जीवित कर सकते हैं। इसी तरह मध्य प्रदेश के गांधीसागर अभयारण्य में कठफोड़वा और अन्य कीटभक्षी पक्षी जंगलों को बीमार होने से बचा रहे हैं। पेड़ों की सबसे बड़ी समस्या लकड़ी को नुकसान पहुंचाने वाले कीट होते हैं। दीमक, लकड़ी भेदक भृंग और छाल के भीतर रहने वाले कई छोटे कीड़े धीरे-धीरे पेड़ों को खोखला कर देते हैं। बाहर से हरे दिखाई देने वाले पेड़ अंदर से कमजोर हो जाते हैं और कुछ समय बाद सूखने लगते हैं। ऐसे में कठफोड़वा प्रकृति के डॉक्टर की तरह काम करता है। कठफोड़वा अपनी मजबूत चोंच से पेड़ों के तनों पर लगातार चोट करता है। वह छाल के भीतर छिपे कीड़ों को पहचान लेता है और उन्हें निकालकर खा जाता है। इससे पेड़ सुरक्षित बने रहते हैं। गांधीसागर अभयारण्य में पाए जाने वाले ब्लैक-रम्प्ड फ्लेमबैक यानी सुनहरे कठफोड़वा की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। वन अधिकारियों के अनुसार, यह पक्षी लाखों पेड़ों को दीमक और हानिकारक कीड़ों से बचा रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञ बताते हैं कि एक विकसित पेड़ सालभर में लगभग 118 किलो ऑक्सीजन छोड़ता है। गांधीसागर अभयारण्य के लगभग डेढ़ करोड़ पेड़ हर वर्ष करोड़ों किलो ऑक्सीजन वातावरण में छोड़ते हैं, जो लाखों लोगों की जरूरत पूरी करने में सक्षम है। यदि ये पेड़ कीड़ों की वजह से नष्ट होने लगें, तो पर्यावरण संतुलन पर गंभीर असर पड़ सकता है। ऐसे में कठफोड़वा जैसे पक्षी अप्रत्यक्ष रूप से मानव जीवन की भी रक्षा कर रहे हैं। सिर्फ कठफोड़वा ही नहीं, बल्कि कई अन्य छोटे पक्षी भी जंगलों को स्वस्थ बनाए रखने में योगदान दे रहे हैं। ट्रीक्रीपर पेड़ों की छाल में छिपे छोटे कीड़े खोजकर खाते हैं। वार्बलर पत्तियों पर लगे कीड़ों को खत्म करते हैं। टिट और छोटी चिड़ियां टहनियों पर मौजूद कीटों को खाकर पेड़ों को सुरक्षित रखती हैं। कुछ पक्षी हवा में उड़ते कीड़ों को पकड़ लेते हैं, जिससे कीटों की संख्या नियंत्रित रहती है। प्रकृति ने हर पक्षी को एक विशेष भूमिका दी है और सभी मिलकर जंगलों की रक्षा करते हैं। आज वैज्ञानिक भी मान रहे हैं कि पक्षियों की संख्या में कमी सीधे पर्यावरणीय संकट का संकेत है। जहां पक्षियों की विविधता अधिक होती है, वहां जंगल अधिक स्वस्थ माने जाते हैं। लेकिन शहरीकरण, पेड़ों की कटाई, रासायनिक प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण कई पक्षियों का प्राकृतिक आवास तेजी से खत्म हो रहा है। हॉर्नबिल जैसे पक्षियों को बड़े पुराने पेड़ों की जरूरत होती है, जिनमें वे घोंसले बना सकें। यदि ऐसे पेड़ काट दिए जाएं, तो उनकी संख्या घटने लगती है। इसी तरह कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से कीटभक्षी पक्षियों के भोजन का स्रोत भी प्रभावित हो रहा है। भारत में अब कई स्थानों पर पक्षियों के संरक्षण को लेकर नई पहल शुरू हुई है। गांवों और कस्बों में स्थानीय प्रजातियों के पेड़ लगाए जा रहे हैं। जंगलों के आसपास रहने वाले लोगों को पक्षियों के महत्व के बारे में जागरूक किया जा रहा है। स्कूलों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से बच्चों को भी प्रकृति संरक्षण से जोड़ा जा रहा है। यह समझ विकसित हो रही है कि केवल बड़े वन अभियान चलाने से पर्यावरण नहीं बचेगा, बल्कि पक्षियों और जैव विविधता की रक्षा करना भी उतना ही जरूरी है। पक्षी प्रकृति के ऐसे साथी हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के धरती को जीवित रखने में लगे हुए हैं। वे बीज फैलाते हैं, कीट नियंत्रित करते हैं, जंगलों को स्वस्थ रखते हैं और पर्यावरण संतुलन बनाए रखते हैं। मनुष्य यदि इन पक्षियों की रक्षा करेगा, तो वही पक्षी भविष्य में पृथ्वी को हराभरा और जीवन से भरपूर बनाए रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाएंगे। पश्चिमी घाट का हॉर्नबिल और गांधीसागर का कठफोड़वा हमें यही संदेश देते हैं कि प्रकृति का हर जीव महत्वपूर्ण है और पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों की नहीं, बल्कि समाज और प्रकृति के साझा सहयोग की जिम्मेदारी है। (L 103 जलवन्त टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार-स्तम्भकार) ईएमएस / 28 मई 26