भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां सत्ता का अंतिम स्रोत जनता मानी गई है। संविधान ने नागरिकों को केवल अधिकार ही नहीं दिए, बल्कि राज्य की शक्तियों की सीमाएं भी निर्धारित की हैं। विधायिका कानून बना सकती है, कार्यपालिका उनका क्रियान्वयन कर सकती है और न्यायपालिका उनकी संवैधानिक समीक्षा कर सकती है, लेकिन इन तीनों संस्थाओं के ऊपर संविधान सर्वोच्च माना गया है। इसी कारण मौलिक अधिकारों को लोकतंत्र की आत्मा कहा गया है। संविधान स्पष्ट रूप से यह व्यवस्था करता है कि कोई भी ऐसा कानून या प्रशासनिक आदेश वैध नहीं माना जा सकता जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता हो। न्यायपालिका को इसी उद्देश्य से न्यायिक समीक्षा का अधिकार दिया गया ताकि वह संविधान की मूल भावना की रक्षा कर सके। भारतीय इतिहास में अनेक अवसरों पर सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों ने सरकारों के निर्णयों को असंवैधानिक घोषित करते हुए नागरिक अधिकारों की रक्षा की है। आपातकाल का उदाहरण भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे विवादास्पद अध्याय माना जाता है। 1975 में लगाए गए आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए थे, हजारों राजनीतिक कार्यकर्ताओं को नजरबंद किया गया और प्रेस की स्वतंत्रता सीमित कर दी गई। हालांकि संविधान में आपातकाल का प्रावधान मौजूद था, लेकिन बाद में जनता ने चुनाव के माध्यम से अपनी असहमति व्यक्त की और सत्ता परिवर्तन हुआ। यह घटना इस बात का प्रमाण भी बनी कि लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता के हाथ में होता है। वर्तमान समय में भी विभिन्न कानूनों, जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली, लंबी न्यायिक प्रक्रियाओं, बेरोजगारी, परीक्षा घोटालों और प्रशासनिक सख्ती को लेकर समाज के अलग-अलग वर्गों में असंतोष दिखाई देता है। युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी तथा आंदोलनों पर बल प्रयोग जैसी घटनाओं ने अविश्वास का वातावरण पैदा किया है। जब नागरिकों को यह महसूस होने लगे कि उनकी समस्याओं का समाधान संस्थागत माध्यमों से नहीं हो रहा, तब सामाजिक तनाव बढ़ने लगता है। हालांकि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह आवश्यक है कि आलोचना तथ्यों और संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर हो। न्यायपालिका, चुनाव आयोग, संसद, मीडिया और प्रशासन जैसी संस्थाओं पर विश्वास लोकतंत्र की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण होता है। यदि इन संस्थाओं के प्रति व्यापक अविश्वास उत्पन्न होता है, तो समाज में अराजकता और भीड़तंत्र की स्थिति पैदा होने का खतरा बढ़ जाता है। पिछले एक दशक में संवैधानिक संस्थाओं एवं कार्यपालिका के प्रमुख पदों पर बैठे लोग सरकार के दबाब में काम करते थे। अब यही आरोप न्यायपालिका पर भी लगने लगे हैं। अदालतें सरकारी और पूंजीपतियों के दबाब में निर्णय करती है। यह धारणा आमजन को बनने लगी है। इससे बार-बार लोकतंत्र एवं संविधान खतरे में है। इस तरह की धारणा बनने लगी है। लोकतंत्र केवल कानूनों से नहीं चलता, बल्कि जनता के विश्वास, संवाद और संस्थाओं की निष्पक्षता से चलता है। सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे नागरिक अधिकारों का सम्मान करें, पारदर्शिता बनाए रखें और युवाओं की समस्याओं का समाधान करें। वहीं नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि वे अपने अधिकारों की लड़ाई लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीकों से लड़ें। संविधान का मूल उद्देश्य सत्ता और जनता के बीच संतुलन बनाए रखना है, और यही संतुलन लोकतंत्र को मजबूत बनाता है। ईएमएस / 28 मई 26