बाल श्रमिक किसी भी मुल्क के लिए अभिशाप कहे जा सकते हैं, कयोकि इससे न केवल बाल श्रमिकों का मानसिक, शारीरिक विकास बाधित होता है, बल्कि उस मुल्क की समूची प्रगति भी एकांगी हो जाती है। सिर्फ कानूनी प्रावधानों से इस सामाजिक समस्या से मुख नहीं मोड़ा जा सकता, कयोकि यह अपने आप में कोई पृथक मसला नहीं, अन्य समस्याओं से उत्पन्न हुई समस्या है। उन बाल श्रमिकों के हिस्से में सूरज की रोशनी नहीं है। उनके दिन भी रातों की तरह स्याह है। वे बंद जगह में 15-16 घन्टे काम करते हैं और फिर उन्हीं अधेरी कोठरियों में सो जाते हैं। खाने को उन्हें सिर्फ सूखी रोटी और वासी साग मिलता है। पेड, पौधे, तितलियों से भी उन्हें कोई वास्ता नहीं है । उनका वास्ता तो उस मालिक से जिसके जहाँ वे काम करते हैं। राक्षसों की तरह क्रूर मालिक जो इन्हें मारता पीटता है और सिगरेट तक से दाग देता है। बाल श्रमिकों के दिलों दिमाग पर मलिक का खौफ हमेशा बना रहता है। जिस उम्र में बच्चे किस्से कहानियाँ सुनते हैं बाल श्रमिकों को मलिक की गालियाँ सुनने पडती है। इनकी सूनी आंखे और सहमें चेहरे देखकर ही आभास हो जाता है कि इनका जीवन कितना कठोर है। इनके हिस्से में स्कूल, स्लेट, कलम, किताबे, लाडदुलार, खेलकूद कुछ नहीं है, इनका जीवन तो निरंतर काम, मलिक की गालियाँ और पिटाई खाना ही है। 5-8 साल की उम्र से लेकर 14-15 साल तक की उम्र के बच्चे निर्धन होने का खामियाजा भुगत रहे हैं। इन्हें दलाल दूरदराज के गावों से सब्जबाग दिखाकर कारखानों तक ले आते हैं। कई जगह माता पिता द्वारा लिया कर्जा चुकाने के लिए बच्चे श्रमिक बनते हैं। बच्चे अपरहण करके भी लाये जाते हैं। बच्चो के काम करे बिना निर्धन परिवारों की जीविका नहीं चलती। 5 साल के होते ही बच्चे पैसा कमाने के घर से बाहर निकल पडते है। कयोकि गाँव में इनके लिए ् रोजगार उपलब्ध नहीं है, घरेलू और कुटीर उधोग बंद हो ग ए है। कमोबेश ऐसी स्थिति में बच्चों के सामने अमानवीय स्थिति में काम करने के अतिरिक्त कोई रास्ता ही नहीं शेष रह जाता। गाँव से हर साल हजारों बेरोजगार बच्चे काम की तलाश में निकलते हैं। आजादी के पश्चात हमने जिस तरह की विकास नीति अपनाई है उसने गाँव के आथिर्क समाजिक ढाचे को तहस नहस करके रख दिया है। बड़ी बड़ी परियोजनाओं के नाम पर काफी बड़ी संख्या में लोग विस्थापित किए गए। इनमें से काफी लोग ऐसे है जिन्हें न तो मुआवजा मिला, न ही जमीन। परिवार के परिवार मजदूरी करने पर मजबूर हो गए। जहाँ पर्यावरण का अधिक विनाश हुआ है, वहां बाल श्रमिकों की संख्या भी बढी है। दूसरी तरफ जिन क्षेत्रों में पर्यावरण विनाश कम हुआ है वहां बाल श्रमिक भी कम है। उत्तर प्रदेश में बाल श्रमिक कुल श्रम शक्ति के पांच प्रतिशत से भी कम है। लेकिन टिहरी में यह आंकड़े 10--10 प्रतिशत है। तमिलनाडु के उत्तरी अरकाट क्षेत्र का भी यही हाल है। अम्बेडकर जिले में कुछेक साल पहले कुल श्रम शक्ति में 10 प्रतिशत श्रमिक थे, भदोही मिजापुर के कालीन उद्योग में पलामू के बाल श्रमिक सबसे ज्यादा हैं। पलामू और मध्य प्रदेश के सरगुजा में जंगल और जमीन का काफी विनाश हुआ है। इससे पारम्परिक रोजगार नष्ट हो गए और परिवारों को काम की तलाश में गाँव से बाहर निकलना पडा। राजस्थान के सिरोही जिले में भी स्थिति काफी गंभीर है। यहाँ भी वन विनाश से बच्चे पलायन को विवश हुए हैं। यहाँ की कुल श्रम शक्ति में बाल श्रमिक 6.17 प्रतिशत है, जो व्यापक वन विनाश से 9.5 प्रतिशत हो गए हैं। कमोबेश यही स्थिति बनासकांठा (गुजरात) यवतमाल ( महाराष्ट्र) गुजाम( उडीसा) तथा कुडप्पा( आंध्रप्रदेश) आदि की भी है। हालांकि बाल श्रमिकों की संख्या का कोई प्रामाणिक आंकडा उपलब्ध नहीं है। शासकीय हिसाब से हमारे मुल्क में तकरीबन 1 करोड़ 90 लाख 75 हजार बाल श्रमिक है। लेकिन गैर सरकारी सूत्र यह संख्या 4 से 10 करोड़ के बीच होने का अनुमान लगाते हैं। राजधानी दिल्ली का श्रमायुक्त कार्यलय दिल्ली में 90 हजार बाल श्रमिक होने की बात कहता है। मगर दिल्ली में तकरीबन 4 लाख से ज्यादा बाल श्रमिक होने का अनुमान है। इनमें से दो तिहाई बच्चे विस्थापित परिवारों से आज है। ये बाल श्रमिक कई तरह के कामों में खपत है। इन्हें चाय की दुकानों, ढाबों, स्कूटर व कार मरम्मत की दुकानों, निर्माण कायों में मजदूरी करते देखा जा सकता है। इनकी बड़ी संख्या घरेलू नौकरों के रूप में भी महानगरों में खप जाती है। कई बच्चे रेल गाडियों, बसों में गा बजाकर अपनी जीविका चलाते हैं, उनमें से कई बूट पोलिश, कचरा बीनने अखबार बेचने या कारों के शीशे साफ करने में जुटे रहते हैं। कुछेक बच्चे तो भीख मांग कर अपना और अपने परिवार का भरणपोषण करते हैं। बाल श्रमिक काफी बड़ी संख्या दियासलाई, आतिशबाजी, रत्न पालिश, बीड़ी, कांच, हस्त शिल्प पावर लूम, नारियल रेशा, सिल्क बुनाई कढ़ाई, स्लेट पेसिल,बाल वेश्यावृत्ति ,पत्थर खुदाई, पौधरोपण और उनकी देखभाल में लगे हुए हैं। सबसे अधिक बाल श्रमिक उत्तर प्रदेश में है। इसके पश्चात आंध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, जम्मू, कश्मीर, कनाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, राजस्थान, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में भी बाल श्रमिक अधिक संख्या में है। इनमें से अधिकांश बाल श्रमिक के पास रहने को ढोर नहीं है। वे काम के दौरान बाल श्रमिकोफुटपाथ, रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड पर सोते है। बाल श्रमिक जहाँ काम करते हैं रात होने पर वही सो जाते हैं। फुटपाथ, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड पर बाल श्रमिकों को पुलिस व स्थानीय दादा लोगों के अत्याचार भी सहने पढते है। बाल श्रमिकों की एक अन्य श्रेणी भी है, जो ज्यादा खतरनाक है। जरुरतमंद बच्चे कुछ ऐसे उधोग में भी काम करने को मजबूर है, जहाँ इन्हें बीमारी और मौत का सामना करना पड़ता है। ऐसे खतरनाक उधोग में काम करने वाले बाल श्रमिकों की संख्या 40 लाख के आसपास है। काम के दौरान बाल श्रमिक तमाम तरह की बीमारियों की गिरफत में आ जाते हैं। लगातार घंटो काम करते रहने से कई तरह की शारीरिक मानसिक समस्याएं उत्पन्न हो जाती है । समय पर पर्याप्त भोजन न मिलने से वे कुपोषण तक के शिकार हो जाते हैं। बाल श्रमिक कैसे अपनी जिंदगी दांव पर लगा कर काम करते हैं, इसके लिए इन उधोग पर नजर डालना काफी होगा, फिरोजाबाद के चूड़ी उधोग में बाल श्रमिक आठ वर्ग मीटर के उबलते कमरे में दहकती भटिठयों के सामने बैठकर काम करते हैं। ये चूडियों का गर्म सिरा नंगे हाथों से जोड़कर चूड़ी बनाते हैं। स्लेट पेसिल उधोग मंदसौर में स्लेट पत्थरो के टूटने से निकलकर उडने वाली धूल इनके फेफड़ों में भर जाती है और वे सिलिकोसिस जैसी जानलेवा बीमारी का शिकार हो जाते हैं। आतिशबाजी और दियासलाई उधोग में काम करने वाले बाल श्रमिक के स्वास्थ्य पर भी काफी बुराअसर पड़ता है। दूसरे उधोग की भी यही स्थिति है कालीन बनाने के काम में लगे बाल श्रमिक को सांस लेने में परेशानी, शरीर दर्द, जोडों में दर्द, नज़र कमजोर होने जैसी समस्या का सामना करना पड़ता है। हालांकि कारखानो में बाल श्रमिक से काम कराने पर कानून रोक लगी हुई है, यह कानूनी रोक सिर्फ कागजों तक ही सिमित है। गौर तलब बात है कि श्रम एवं कल्याण संबधी संसदीय स्थायी समिति ने अपने अध्ययन में पाया कि केन्द्र या राज्य सरकार के पास बाल श्रम से संबंधित प्रामाणिक आंकड़े तक नहीं है। प्रदेश सरकार ने बाल श्रम कानून को ठीक से लागू नहीं किया है। प्रदेश सरकार इन्ही खमियो का फायदा उठाती है और केन्द्र सरकार पर उन पर म दोष मढते रहती है। स्थिति यह है कि 1986 में कानून पारित होने के पश्चात तकरीबन 5 हजार लोगों के खिलाफ कार्रवाई तो हुई लेकिन एक भी गुनाहगार को दण्ड नहीं दिया जा सका। हालांकि फिरोजाबाद के उधोग में कार्यरत बच्चों के लिए मानवधिकार आयोग के सहयोग से पुनवास योजना प्रारम्भ की गई । बाल श्रम के मामले में इन गैर सरकारी संस्थाओ की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण है। वर्तमान समय में 124 संगठन सक्रिय हैं। इसमें सबसे ज्यादा तमिलनाडु राज्य में है। इसके बाद उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, बिहार, आंध्र प्रदेश, कनाटक, गुजरात, राजस्थान, उड़ीसा और महाराष्ट्र का स्थान है। इन संगठनों का बजट 23 करोड़ 26 लाख रुपये से अधिक का है। इसके लिए इन्हें सरकारी व अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के अनुदान पर रहना पड़ता है। उक्त संगठन 163 प्रोजेक्ट में काम कर रहे हैं और अब तक 738 प्रशिक्षण कार्यक्रम चला चुके हैं। इनमें 30318 प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षित किया गया। इनका प्रयास 31,596 परिवारों के एक लाख सात हजार दो सौ छब्बीस बाल श्रमिकों तक पहुचने की है। तकरीबन 52 प्रतिशत संगठन 500 बच्चों तक सीमित है। दो प्रतिशत सगठनो के काम के दायरे में एक हजार से पांच हजार बच्चे आते हैं। इस तरह इन संगठनों की पहुच हिदुस्तान के कुल बाल श्रमिकों की एक प्रतिशत से भी कम आबादी तक ही है। वैसे भी असलियत यह है कि बाल श्रमिकों की संख्या निरतर बढती जा रही है। इनके काम करने की परिस्थितियां और भी भयानक होती जा रही है। बाल श्रमिकों की परेशानी कानून बनने के बाबजूद कम होने का नाम नहीं ले रही है। ईएमएस/28/05/2026