बेंगलुरु(ईएमएस)। कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के संभावित इस्तीफे की अटकलों के बीच राज्य की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने संभावित पद त्याग से ठीक एक दिन पहले राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक सर्वेक्षण रिपोर्ट को आधिकारिक तौर पर स्वीकार कर लिया है। इसे आम तौर पर कर्नाटक जाति जनगणना रिपोर्ट कहा जाता है। राजनीतिक हलकों में इसे महज एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सिद्धारमैया का एक बड़ा राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। इसके जरिए वे पद छोड़ने से पहले खुद को पिछड़े वर्गों के सबसे बड़े हिमायती के रूप में स्थापित करना चाहते हैं, जिससे राज्य में उनके अहिंदा (अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित) वोटबैंक पर उनकी पकड़ और मजबूत हो सके। कर्नाटक में इस जातिगत सर्वे का इतिहास काफी लंबा और विवादित रहा है। सिद्धारमैया ने साल 2013 से 2018 के अपने पहले मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान इस सर्वे का आदेश दिया था, लेकिन राज्य में लगातार बदलती सरकारों के कारण यह ठंडे बस्ते में चला गया था। इससे पहले जब जयप्रकाश हेगड़े आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी थी, तब राज्य के दो सबसे प्रभावशाली समुदायों वोक्कालिगा और लिंगायत के नेताओं ने इसके आंकड़ों को पुराना और अवैज्ञानिक बताते हुए भारी विरोध किया था। इस कड़े विरोध को देखते हुए राज्य सरकार ने मधुसूदन नायक की अध्यक्षता में नए आयोग का गठन किया और नए सिरे से सर्वे करवाया। अब इसी नए आयोग की रिपोर्ट पर मुख्यमंत्री ने अंतिम मुहर लगा दी है। नए नेतृत्व के लिए बड़ी सियासी चुनौती राज्य में इस समय कांग्रेस के भीतर मुख्यमंत्री का पद डीके शिवकुमार को सौंपे जाने की चर्चाएं जोरों पर हैं। ऐसे समय में सिद्धारमैया द्वारा इस रिपोर्ट को स्वीकार करना नए आने वाले मुख्यमंत्री के लिए एक बड़ी सियासी चुनौती बनने वाला है। इस रिपोर्ट को अब आगामी कैबिनेट बैठक में रखा जाएगा, जहाँ मंत्रिपरिषद की मंजूरी के बाद ही इसके आधार पर आरक्षण या नीतियों में बदलाव तय होंगे। यदि आगामी सरकार इस रिपोर्ट को लागू करती है, तो राज्य के प्रभावशाली समुदायों का विरोध बढ़ सकता है और आरक्षण के नए गणित पर विवाद छिड़ सकता है। इसके विपरीत, यदि सरकार इस रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डालती है या टालने की कोशिश करती है, तो पिछड़ा वर्ग संगठनों और अहिंदा समर्थकों की नाराजगी बढ़ जाएगी, जिससे कांग्रेस की सामाजिक न्याय वाली राजनीति पर ही सवाल खड़े होने लगेंगे। वीरेंद्र/ईएमएस/28मई 2026