आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बनेगा शहरों का सुरक्षा कवच? - मौसम का अनुमान ही नहीं, अब हीटवेव से जंग की रणनीति नई दिल्ली (ईएमएस)। भारत में लगातार बढ़ती हीटवेव (भीषण गर्मी) अब सिर्फ एक मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि जनजीवन, स्वास्थ्य, बिजली ग्रिड और शहरी प्लानिंग के लिए एक बड़ा संकट बन चुकी है। इस चुनौती से निपटने के लिए अब मौसम एजेंसियां और विशेषज्ञ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का सहारा ले रहे हैं। मकसद सिर्फ मौसम का अनुमान लगाना नहीं, बल्कि शहरों को इस आपदा से निपटने के लिए पहले से तैयार करना है। भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने उत्तर-पश्चिम, मध्य और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में रेड और सीवियर हीटवेव अलर्ट जारी किया है, जहाँ तापमान 45 डिग्री सेल्सियस को पार कर चुका है। इस भीषण गर्मी का सीधा असर सेहत पर दिख रहा है; हाल ही में तेलंगाना में हीटस्ट्रोक से 16 लोगों की मौत हुई है और आंध्र प्रदेश में भी गर्मी से जुड़ी बीमारियाँ तेजी से बढ़ी हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, मौसम की भविष्यवाणी तो बस शुरुआत है। असली ज़रूरत शहरों के उन हिस्सों की पहचान करना है जहाँ खतरा सबसे ज़्यादा है। एआई इस काम को बखूबी अंजाम दे रहा है। सैटेलाइट तस्वीरों, हरियाली के ग्राफ, इमारतों के घनत्व और जमीन के तापमान का विश्लेषण करके एआई शहरों के बेहद गर्म इलाके की पहचान कर रहा है। इस डेटा की मदद से प्रशासन यह तय कर सकता है कि किन इलाकों में तुरंत पेड़ लगाने की ज़रूरत है, कहाँ कूल रूफ (गर्मी सोखने वाली छतें) बनाई जाएं और कहाँ छायादार सार्वजनिक स्थान विकसित किए जाएं। फ्लेम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अंजल प्रकाश के अनुसार, एआई मौसम के भारी-भरकम डेटा को स्थानीय स्तर पर काम आने वाले फैसलों में बदल सकता है। उदाहरण के लिए, एआई यह अनुमान लगा सकता है कि किस इलाके के लोग गर्मी से सबसे पहले बीमार पड़ सकते हैं, जिससे प्रशासन वहां पहले से एम्बुलेंस और अस्पताल की व्यवस्था कर सके। इसके अलावा, गर्मी में एसी और कूलरों के चलते बिजली की मांग अचानक बढ़ जाती है। एआई सिस्टम पहले ही भांप लेते हैं कि किस ग्रिड पर लोड बढ़ने वाला है, जिससे ब्लैकआउट (बिजली गुल होना) को रोका जा सकता है। फिलहाल एआई तकनीक का फायदा सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित है। इसे छोटे कस्बों और गांवों तक ले जाने में कुछ बड़ी बाधाएं हैं, जैसे कमजोर इंटरनेट, तकनीकी संसाधनों की कमी और स्थानीय स्तर पर सटीक वेदर डेटा का न होना। इस समस्या से निपटने के लिए अब स्थानीय भाषाओं में एसएमएस अलर्ट, मोबाइल ऐप्स और ऑफलाइन टूल्स पर काम किया जा रहा है। साथ ही, आशा वर्कर्स, पंचायतों और लोकल रेडियो के ज़रिए इस जानकारी को आखिरी व्यक्ति तक पहुँचाने की कोशिश हो रही है। प्लूटास एआई के संस्थापक अनुपम श्रेय का कहना है कि कई शहरों में अभी भी वार्ड स्तर पर हीट रिस्क मैपिंग नहीं है। झुग्गियों और छोटे घरों के भीतर बढ़ने वाले तापमान पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है। विशेषज्ञों ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि एआई को अधूरा या गलत डेटा दिया गया, तो उसके फैसले भी गलत हो सकते हैं। साफ है कि एआई एक बेहतरीन मददगार तो बन सकता है, लेकिन इस जंग को जीतने के लिए मजबूत सरकारी नीतियों, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और मुस्तैद स्थानीय प्रशासन की भी उतनी ही ज़रूरत है। रामयश/ईएमएस 28 मई 2026