कोलकाता (ईएमएस)। पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर वैसा ही ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिल रहा है, जैसा पहले भी राज्य के राजनीतिक इतिहास में दर्ज हो चुका है। इस साल हुए विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड जीत और सुवेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के बाद से तृणमूल कांग्रेस के भीतर गंभीर अस्थिरता साफ दिखाई दे रही है। ममता बनर्जी के नेतृत्व में 2011 में वामपंथी सरकार को उखाड़ फेंकने के बाद टीएमसी ने करीब 15 साल तक राज्य की सत्ता संभाली। सत्ता में आते ही ममता बनर्जी ने वामदलों को संगठनात्मक रूप से बेहद कमजोर कर दिया था, लेकिन आज वही संकट खुद टीएमसी के सामने खड़ा हो गया है। पार्टी के नेता और कार्यकर्ता लगातार साथ छोड़ रहे हैं और भाजपा की तरफ झुकाव बढ़ा रहे हैं, हालांकि भाजपा ने अभी अपने दरवाजे पूरी तरह नहीं खोले हैं। टीएमसी की सांगठनिक स्थिति इतनी नाजुक हो चुकी है कि टिकट मिलने के बावजूद उम्मीदवार मैदान छोड़कर पीछे हट रहे हैं। फाल्ता विधानसभा क्षेत्र में मतदान से महज कुछ घंटे पहले टीएमसी प्रत्याशी जहांगीर के मैदान छोड़ने से पार्टी को बड़ा झटका लगा। इसके अलावा, नंदीग्राम के उपचुनाव में तो टीएमसी को उम्मीदवार तक नहीं मिल पा रहा है। ममता बनर्जी अभी तक अपना प्रत्याशी तय नहीं कर पाई हैं क्योंकि कोई भी भाजपा का मुकाबला करने को तैयार नहीं है। ममता बनर्जी ने अपने पुराने चुनाव एजेंट सुफियान को मैदान में उतारना चाहा, लेकिन उन्होंने भी इनकार कर दिया। नंदीग्राम शुरू से ही बंगाल की राजनीति का सबसे संवेदनशील केंद्र रहा है, जिसने 2007 के भूमि आंदोलन से लेकर हालिया चुनावों तक राज्य की सत्ता को बदलने में अहम भूमिका निभाई है। इसी नंदीग्राम में सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को मात दी थी और 2026 के चुनाव में भी वे लगातार तीसरी बार यहां से विजयी हुए। चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम सीट से इस्तीफा दे दिया है और वे अब ममता बनर्जी के मजबूत गढ़ माने जाने वाले भवानीपुर निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करेंगे। सुवेंदु अधिकारी का यह कदम बेहद प्रतीकात्मक है, जो राज्य की बदलती राजनीतिक दिशा को दर्शाता है। सत्ता बदलते ही टीएमसी के भीतर बगावत के सुर तेज हो गए हैं और नेता खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। सांसद काकोली घोष दस्तीदार का सांगठनिक पदों से इस्तीफा देना इसी आंतरिक कलह का नतीजा माना जा रहा है। कयास लगाए जा रहे हैं कि कई अन्य सांसद और विधायक भी पाला बदलने की तैयारी में हैं, जिससे पार्टी के टूटने का खतरा मंडरा रहा है। यह पूरी स्थिति साल 2011 के उस दौर की याद दिलाती है जब टीएमसी के सत्ता में आते ही वाम मोर्चा बिखर गया था। तब हजारों की संख्या में वामपंथी कार्यकर्ता और पार्षद टीएमसी में शामिल हो गए थे। वामदलों की तरह ही टीएमसी का पूरा ढांचा भी विचारधारा के बजाय मुख्य रूप से सत्ता, क्लब कल्चर, पंचायतों पर नियंत्रण और सरकारी योजनाओं के प्रभाव पर टिका हुआ था। अब जब सत्ता हाथ से निकल चुकी है, तो पुराना पैटर्न दोबारा दोहराया जा रहा है। निचले और मध्यम स्तर के कार्यकर्ताओं का पलायन तेजी से जारी है, जिससे पार्टी का मनोबल पूरी तरह टूट चुका है। अतीत में वाममोर्चा सरकार के मंत्री रहे गौतम देव जैसी हस्तियों ने भी हार के बाद टीएमसी का दामन थाम लिया था, और हाल ही में कई अन्य नेताओं ने भी पाला बदला था। लेकिन आज सत्ता केंद्र बदलते ही वही होड़ भाजपा की तरफ दिखाई दे रही है। ममता बनर्जी के लिए इस उम्र और स्वास्थ्यगत परिस्थितियों में बिना सत्ता के अपने संगठन को एकजुट रखना एक बेहद कठिन और अनिश्चित चुनौती बनता जा रहा है। वीरेंद्र/ईएमएस/28मई 2026