लेख
30-May-2026
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- युवाओं के भविष्य पर मंडराता तंबाकू का संकट (विश्व तम्बाकू निषेध दिवस (31 मई) पर विशेष) तंबाकू मानव स्वास्थ्य का ऐसा मौन शत्रु है, जिसकी विनाशकारी शक्ति को लेकर अब किसी प्रकार का संशय शेष नहीं रह गया है। पिछले कई दशकों में विश्वभर में हुए हजारों वैज्ञानिक अध्ययनों ने यह निर्विवाद रूप से सिद्ध किया है कि धूम्रपान अथवा किसी भी रूप में तंबाकू का सेवन शरीर के लिए घातक है। इसके बावजूद जब कम उम्र के किशोरों और युवाओं को सिगरेट, बीड़ी, ई-सिगरेट, गुटखा, पान मसाला अथवा अन्य तंबाकू उत्पादों का सेवन करते देखा जाता है तो यह केवल स्वास्थ्य का नहीं बल्कि सामाजिक और मानसिक चेतना का भी गंभीर संकट प्रतीत होता है। वास्तव में किशोरों के मन में तंबाकू को लेकर अनेक भ्रम घर कर जाते हैं। उन्हें लगता है कि धूम्रपान से तनाव कम होता है, आत्मविश्वास बढ़ता है, व्यक्तित्व आकर्षक बनता है, मन शांत रहता है या फिर यह आधुनिकता और परिपक्वता का प्रतीक है। विज्ञापनों, फिल्मों, सोशल मीडिया और मित्र समूहों के प्रभाव से यह भ्रम और भी गहरा हो जाता है जबकि वैज्ञानिक सत्य इससे बिल्कुल विपरीत है। तंबाकू न तो शक्ति देता है, न व्यक्तित्व निखारता है और न ही तनाव का स्थायी समाधान है। सच्चाई यह है कि तंबाकू एक धीमा जहर है, जो शरीर के भीतर चुपचाप अपना विनाशकारी प्रभाव छोड़ता रहता है। यह कैंसर, हृदय रोग, फेफड़ों की बीमारियों, स्ट्रोक और अनेक घातक रोगों को जन्म देकर व्यक्ति को धीरे-धीरे मृत्यु की ओर धकेलता है। इसलिए तंबाकू के विरुद्ध जागरूकता आज केवल स्वास्थ्य नहीं बल्कि भावी पीढ़ियों के अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है। लोगों को तंबाकू को छोड़ने और इसे कभी हाथ नहीं लगाने के लिए जागरूक करने के उद्देश्य से ही प्रतिवर्ष विश्वभर में 31 मई को ‘विश्व तम्बाकू निषेध दिवस’ मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य तम्बाकू सेवन के व्यापक प्रसार और नकारात्मक स्वास्थ्य प्रभावों की ओर ध्यान आकर्षित करना है, जो दुनियाभर में प्रतिवर्ष लाखों मौतों का कारण बनता है। इस वर्ष विश्व तंबाकू निषेध दिवस ‘आकर्षण का पर्दाफाश: निकोटीन और तंबाकू की लत का मुकाबला करना’ थीम के साथ मनाया जा रहा है। यह थीम निर्धारित करते समय तंबाकू उद्योग द्वारा युवाओं को टारगेट करते हुए बनाए गए मार्केटिंग के तरीकों की चिंता बढ़ाने वाली प्रवृत्ति की ओर खास ध्यान दिया गया है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार सोशल मीडिया और लाइव स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म इत्यादि के जरिये दुनियाभर में युवा तेजी से तंबाकू उत्पादों के आकर्षण और संपर्क में आ रहे हैं, जो उनके स्वास्थ्य और समाज कल्याण के लिए एक बड़ा खतरा है। दुनियाभर के सर्वेक्षण लगातार दिखा रहे हैं कि अधिकांश देशों में 13-15 वर्ष की आयु के बच्चे तंबाकू और निकोटीन उत्पादों का इस्तेमाल कर रहे हैं। वैसे तो हुक्का, गुटखा, खैनी, जर्दा इत्यादि तमाम तंबाकू उत्पाद स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं लेकिन इसका सबसे हानिकारक रूप है धूम्रपान, जो हर साल लाखों लोगों की मौत का कारण बनता है। धूम्रपान करने वालों द्वारा सालभर में सात हजार करोड़ से ज्यादा सिगरेटें फूंक दी जाती हैं। हर साल फूंकी जाने वाली इन्हीं सिगरेटों के धुएं से वातावरण भी कितना प्रदूषित होता है, इसका अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि इस खतरनाक धुएं से करीब 50 टन तांबा, 15 टन शीशा, 11 टन कैडमियम तथा कई अन्य खतरनाक रसायन वातावरण में घुलते हैं। हालांकि सिगरेटें महंगी होने के कारण भारत में बीड़ी का प्रचलन निम्न तथा मध्यमवर्गीय तबके में ज्यादा है और ऐसा अनुमान है कि देश में प्रतिवर्ष सौ अरब रुपये मूल्य से भी अधिक की बीडि़यों का सेवन किया जाता है। एक सरकारी अध्ययन के मुताबिक तम्बाकू सेवन से होने वाली बीमारियों के इलाज पर सालभर में करीब 1.04 लाख करोड़ रुपये खर्च हो जाते हैं। तीन दशक पूर्व प्रकाशित अपनी पुरस्कृत पुस्तक ‘मौत को खुला निमंत्रण’ में मैंने विस्तार से यह बताया है कि धूम्रपान वास्तव में एक ऐसा धीमा जहर है, जो हमारे शरीर में धीरे-धीरे प्राणघातक रोगों को जन्म देता है और व्यक्ति को धीमी गति से मृत्यु शैया पर पहुंचा देता है। दुनियाभर में धूम्रपान के कारण 2019 में 77 लाख लोगों की मौत हुई, जिनमें से 17 लाख मौतें इस्केमिक हार्ट डिजीज के कारण, 16 लाख सीपीओडी के कारण, 13 लाख ट्रैकियल, ब्रोंकस और फेफड़ों के कैंसर से तथा 10 लाख स्ट्रोक के कारण हुई। रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में होने वाली मौतों में से हर 5 में से 1 पुरूष की मौत धूम्रपान के कारण हो रही है। विभिन्न सर्वेक्षणों के अनुसार माना गया है कि विकसित देशों में चालीस फीसदी से ज्यादा पुरूष और इक्कीस फीसदी से ज्यादा स्त्रियां धूम्रपान करती हैं जबकि विकासशील देशों में सिर्फ आठ फीसदी स्त्रियों को इसकी लत लगी है तथा पुरूषों की संख्या पचास फीसदी से अधिक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार तम्बाकू के सेवन के कारण प्रतिदिन करीब आठ हजार व्यक्ति फेफड़ों के कैंसर के शिकार होकर मर जाते हैं। संगठन का अनुमान है कि यदि दुनियाभर में धूम्रपान की लत ऐसे ही बढ़ती रही तो बहुत जल्द धूम्रपान के कारण पचास करोड़ लोग मारे जा चुके होंगे और अगले तीस वर्षों में केवल गरीब देशों में ही धूम्रपान से मरने वालों की संख्या दस लाख से बढ़कर सत्तर लाख तक पहुंच जाएगी। संगठन का अनुमान है कि प्रतिवर्ष विश्वभर में आठ हजार से ज्यादा नवजात शिशु धूम्रपान की वजह से असमय काल के ग्रास बन जाते हैं। आंकड़ों से पता चलता है कि सभी प्रकार के कैंसर में से करीब 40 फीसदी का कारण धूम्रपान ही होता है। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि कैंसर, हृदय रोग, सांस की बीमारी, डायबिटीज इत्यादि बीमारियों में भी धूम्रपान काफी खतरनाक हो सकता है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को धूम्रपान से बचना चाहिए। बहरहाल, धूम्रपान छोड़ने के फायदों के बारे में विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि धूम्रपान छोड़ने के सिर्फ बीस मिनट के अंदर उच्च रक्तचाप में गिरावट आती है तथा बारह घंटे के बाद रक्त में कार्बन मोनोक्साइड के विषैले कणों का स्तर सामान्य हो जाता है। दो से बारह सप्ताह में फेफड़ों की कार्यक्षमता में तेजी से वृद्धि होती है तथा एक से नौ माह में खांसी तथा श्वसन संबंधी समस्याएं कम हो जाती हैं। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक मनुष्य के फेफड़ों में जादुई क्षमता होती है, जो धूम्रपान से होने वाले कुछ नुकसान को स्वयं ठीक कर देती है और जो व्यक्ति धूम्रपान छोड़ देते हैं, उनकी चालीस फीसदी कोशिकाएं ऐसे लोगों की तरह ही हो जाती हैं, जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा 33 वर्ष पूर्व नशे के दुष्प्रभावों पर ‘मौत को खुला निमंत्रण’ पुस्तक लिख चुके हैं) ईएमएस / 30 मई 26