लेख
30-May-2026
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देश की सबसे बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल नीट को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। पिछले तीन वर्षों से नीट परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होने की बात सामने आती रही है। इसमें लाखों परीक्षार्थी शामिल होते हैं। परीक्षा केंद्रों पर अनियमितताएँ और लाखों छात्रों के भविष्य पर मंडराते संकट के बीच अब सरकार सेना और वायुसेना की सहायता लेने की खबर आई है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय और नीट परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था प्रश्नपत्रों के सुरक्षित परिवहन और निगरानी के लिए सरकार सैन्य संसाधनों का उपयोग करने जा रही है। इसके पहले कभी भी सेना का उपयोग इस तरह से नहीं हुआ है। पिछले 75 वर्षों के इतिहास में जब कानून व्यवस्था की स्थिति में बहुत जरूरत होने पर ही सेना को कुछ समय के लिए तैनात किया जाता है। पहली बार परीक्षा मे सेना और वायु सेना का उपयोग होने की बात सामने आ रही है। यह निर्णय दो तरह के प्रश्न खड़े करता है। पहला, क्या सरकार की नीट की परीक्षा के प्रश्न पत्र बार-बार लीक हो रहे हैं, उसकी गंभीरता और समस्या से निपटने के लिए लिया गया है? दूसरा, क्या यह सरकार ने मान लिया है संबंधित मंत्रालय और परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था, प्रशासन राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल है? सरकार और उसके समर्थकों का तर्क है, लाखों परीक्षार्थियों के भविष्य की रक्षा के लिए सेना की मदद ली जा रही है, इसमें गलत क्या है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा मंडल के परीक्षा परिणाम को लेकर भी लाखों छात्रों का भविष्य अंधकार में हो गया है। सरकार शायद इस बात से घबरा गई है कि नीट पेपर लीक और सीबीएसई परीक्षा परिणाम को लेकर लाखों छात्र सड़क पर उतरकर अपना विरोध जाता रहे हैं। इस विरोध को दबाने के लिए तथा परीक्षार्थियों का विश्वास बना रहे। हाल के वर्षों में पेपर लीक और संगठित नकल गिरोहों ने परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता को लगभग समाप्त कर दिया है। इस स्थिति में छात्रों और युवाओं के विरोध को नियंत्रित करने के लिए सरकार सेना की विश्वसनीयता का सहारा लेकर इस विवाद को शांत करने की कोशिश कर रही है। छात्रों और अभिभावकों का मानना है, परीक्षा आयोजित करने की जिन्हें जिम्मेदारी दी गई है उसमें बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार होने के कारण तथा प्रवेश परीक्षाओं के माध्यम से चयनित कर करोड़ों रुपए की कमाई करने का यह नया धंधा शुरू हो गया है और यह सरकार की मिलीभगत से ही संभव हो पा रहा है। इसलिए छात्रों और अभिभावकों में भारी गुस्सा देखने को मिल रहा है। दूसरी ओर यह सवाल भी उठने लगा है कि जब परीक्षा तक सरकार नहीं करा पा रही है, और दावे किए जा रही, अब इसको लेकर सरकार की आलोचना बड़े पैमाने पर शुरू हो गई है। सेना का काम सीमाओं की सुरक्षा करना है। नाकि प्रश्नपत्रों की ढुलाई करना तथा पेपर लीक होने से रोकना है। देश की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा कराने वाली संस्थाएँ इतनी कमजोर हैँ अथवा वह भ्रष्ट हो चुकी हैं। परीक्षा संचालन के लिए सैन्य सहायता, प्रशासनिक असफलता का सबसे बड़ा प्रतीक भी माना जा रहा है। शिवसेना नेता संजय राउत ने इसे “गवर्नेंस फेल्योर” तथा भ्रष्ट व्यवस्था निरूपित किया है। असल समस्या केवल प्रश्नपत्र लीक की नहीं है। पूरी परीक्षा प्रणाली भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी है। नीट परीक्षा के माध्यम से हर साल कोचिंग सेंटर और परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था द्वारा करोड़ों रुपए कि भ्रष्टाचार और मिलीभगत के कई कहानियां सामने आ चुकी है। जिसमें चयन के लिए लाखों रुपए लेकर एम्स और सरकारी अस्पतालों में प्रवेश दिया गया है। इसी तरह से अन्य परीक्षाओं में भी लाखों करोड़ों रुपए लेकर उन लोगों का चयन किया जाता है जो पैसा देने में सक्षम होते हैं। इस काम में राजनीतिक हस्तक्षेप तथा जिन लोगों को यह काम सोपा गया है उन्हें प्राथमिकता और साक्षमता के अनुसार काम न देकर ऐसे लोगों को जिम्मेदारी दी गई है जो इस भ्रष्ट तंत्र को संरक्षित करने का काम करते हैं। नेशनल टेस्ट एजेंसी की स्थापना पारदर्शी और तकनीकी रूप से सक्षम परीक्षा प्रणाली के लिए की गई थी। पिछले वर्षों में लगातार विवादों और लाखों रुपए की अवैध वसूली से नेशनल टेस्ट एजेंसी की साख को भारी नुकसान हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है, केंद्रीकृत परीक्षा व्यवस्था, कमजोर निगरानी, निजी एजेंसियों पर निर्भरता कोचिंग संस्थाओं के साथ मिली भगत और जवाबदेही तय नहीं होने से यह संकट इतना बढ़ गया है। सरकार को सेना की सहायता लेकर अपना विश्वास आम जनता के बीच में बनाना पड़ रहा है। इस पूरे विवाद का सबसे दुखद पहलू यह है, इसका बोझ छात्रों पर पड़ रहा है। दक्षिण के राज्य लगातार इसका विरोध कर रहे हैं। नीट परीक्षा में केंद्रीयकृत भ्रष्टाचार होने का आरोप लगने लगा है। लाखों युवा वर्षों तक तैयारी करते हैं। परिवार कर्ज लेते हैं। मानसिक तनाव झेलते हैं। अंत में परीक्षा में गड़बड़ी कर अयोग्य छात्रों का प्रवेश सरकारी मेडिकल कॉलेज और एम्स में हो जाता है। यहां पर नाम मात्र की फीस लगती है। निजी मेडिकल कॉलेज की लाखों रुपए प्रतिवर्ष की फीस होती है। जिसके कारण नीट परीक्षा में हर साल करोड़ों रुपए के अवैध लेनदेन का आरोप लगने लगा है। यह केवल एक परीक्षा का संकट नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था को लेकर आमजनों में रोष देखने को मिल रहा है। सरकार यदि सेना की सहायता लेकर परीक्षा को सुरक्षित कराने में सफल भी हो जाती है, तब भी यह स्थायी समाधान नहीं है। वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब ऐसी व्यवस्था बने जिसमें पारदर्शिता, तकनीकी सुरक्षा, जवाबदेही और संस्थागत क्षमता मजबूत हो। लोकतंत्र में संस्थाओं के कामकाज में पारदर्शिता और उनकी निष्पक्षता विश्वसनीय होती है। सेना की सहायता लेना सरकार और प्रशासन की असफलता का प्रतीक है प्रशासनिक कार्यों में यदि इस तरह से सेना का उपयोग होगा इससे सेना का हस्तक्षेप नागरिक प्रशासन पर बढ़ेगा। जिस तरह के हालत पाकिस्तान में है, ठीक उसी तरह के हालात भारत में भी हो सकते हैं। इस ओर सरकार तथा न्यायपालिका को ध्यान देने की जरूरत है। ईएमएस / 30 मई 26