पश्चिम बंगाल के राजनीतिक परिणाम के बाद देश की राजनीति एक बार फिर अपने बदलते स्वरूप को लेकर चर्चा में है। क्षेत्रीय दलों की भूमिका और उनकी राजनीतिक पकड़ को लेकर नए सिरे से सवाल उठने लगे हैं कि क्या भारतीय राजनीति धीरे-धीरे राष्ट्रीय दलों के केंद्र में सिमटती जा रही है। भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों की भूमिका लंबे समय तक निर्णायक रही है। एक समय ऐसा था जब केंद्र की सत्ता तक पहुँचने के लिए किसी भी राष्ट्रीय दल को क्षेत्रीय दलों के समर्थन की जरूरत पड़ती थी। गठबंधन सरकारों का दौर इसकी सबसे बड़ी मिसाल रहा है। नब्बे के दशक से लेकर दो हजार के शुरुआती वर्षों तक तेलुगू देशम पार्टी, द्रमुक, अन्नाद्रमुक, समाजवादी दल, वामपंथी दल, जनता दल और अन्य क्षेत्रीय ताकतें केंद्र की राजनीति का संतुलन तय करती थीं। उस समय सरकारें अक्सर क्षेत्रीय सहयोग के आधार पर ही खड़ी होती थीं। लेकिन पिछले एक दशक में यह राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलता दिखाई दिया है। भाजपा के लगातार विस्तार ने कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों की स्थिति को प्रभावित किया है। महाराष्ट्र, बिहार, पंजाब और असम जैसे राज्यों में राजनीतिक समीकरण बदले हैं और कई क्षेत्रीय दल या तो कमजोर हुए हैं या सीमित प्रभाव तक सिमट गए हैं। एक समय अकाली दल, शिवसेना, जनता दल यूनाइटेड, असम गण परिषद, द्रमुक, अन्नाद्रमुक, तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसी क्षेत्रीय ताकतें राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। लेकिन आज इनकी भूमिका अधिकतर राज्य स्तर तक सीमित होती दिखाई दे रही है। भाजपा का विस्तार केवल हिंदी पट्टी तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि उसने पूर्वोत्तर और पश्चिम भारत के कई राज्यों में भी मजबूत उपस्थिति दर्ज की है। दूसरी ओर कांग्रेस भी अपने संगठन को पुनर्गठित करने की कोशिश में जुटी है, जिससे राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अधिकतर दो राष्ट्रीय ध्रुवों के बीच केंद्रित होती दिखाई दे रही है। हालाँकि इसका यह अर्थ नहीं है कि क्षेत्रीय दल पूरी तरह समाप्त हो गए हैं। तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और कुछ अन्य राज्यों में क्षेत्रीय दल अभी भी मजबूत स्थिति में हैं। दक्षिण भारत में क्षेत्रीय पहचान, भाषा और स्थानीय मुद्दों का प्रभाव आज भी राजनीति को गहराई से प्रभावित करता है। इसके बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय दलों की वह निर्णायक भूमिका, जो कभी गठबंधन सरकारों के दौर में दिखाई देती थी, अब पहले जैसी नहीं रही है। इन परिस्थितियों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि देश धीरे-धीरे दो प्रमुख राजनीतिक ध्रुवों की दिशा में बढ़ रहा है, जहाँ एक ओर भाजपा और दूसरी ओर कांग्रेस प्रमुख केंद्र के रूप में उभर रही हैं। क्षेत्रीय दल या तो इन दोनों में से किसी एक धुरी के साथ जुड़ते नजर आ सकते हैं या फिर अपने-अपने राज्यों तक सीमित रह सकते हैं। हालाँकि भारत जैसे विविधताओं वाले देश में पूरी तरह दो दलीय व्यवस्था स्थापित हो जाएगी, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि यहाँ समीकरण तेजी से बदलते रहे हैं। कभी कांग्रेस का एकछत्र प्रभाव था, फिर गठबंधन युग आया और अब भाजपा का विस्तार दिखाई दे रहा है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि राजनीति एक स्थिर ढांचे में नहीं रहती, बल्कि लगातार परिवर्तनशील रहती है। बंगाल का हालिया राजनीतिक परिदृश्य केवल एक राज्य की घटना नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक परिवर्तन का संकेत भी है जो भारतीय राजनीति के स्वरूप को नए तरीके से परिभाषित कर रहा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भारत वास्तव में दो ध्रुवों की राजनीति की ओर बढ़ता है या फिर क्षेत्रीय दल एक बार फिर किसी नए राजनीतिक संतुलन की नींव रखते हैं। (राजनीतिक लेखक / टिप्पणीकार) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) ईएमएस / 30 मई 26