अंतर्राष्ट्रीय
31-May-2026
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इस्लामाबाद(ईएमएस)। पाकिस्तान की विदेश नीति में कुछ ऐसे संवेदनशील मुद्दे हैं जो दशकों बीत जाने के बाद भी जस के तस बने हुए हैं। इजरायल को आधिकारिक रूप से मान्यता देने का सवाल भी उन्हीं में से एक है। दिलचस्प बात यह है कि जिन अरब देशों को कभी फिलिस्तीन का सबसे बड़ा पैरोकार माना जाता था, उनमें से संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मोरक्को जैसे कई देश अब इजरायल के साथ खुले तौर पर राजनयिक और व्यापारिक संबंध स्थापित कर चुके हैं। इसके बावजूद पाकिस्तान आज भी अपने उसी पुराने रुख पर अड़ा दिखाई देता है, जिसे उसने साल 1948 में अपनाया था। यह बहस मई 2026 में एक बार फिर उस समय तेज हो गई, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब्राहम एकॉर्ड्स के विस्तार की वकालत करते हुए पाकिस्तान समेत कई प्रमुख मुस्लिम देशों पर कूटनीतिक दबाव बनाया। ट्रंप का संदेश बिल्कुल साफ था कि पश्चिम एशिया की क्षेत्रीय शांति और ईरान से जुड़े नए समीकरणों में उन देशों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होगी जो इजरायल के साथ सामान्य संबंध बनाने को तैयार हैं। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर इस समझौते को आगे बढ़ाने की बात कही, जिसमें पाकिस्तान का नाम शामिल होने से अंतरराष्ट्रीय बिरादरी का ध्यान तुरंत इस्लामाबाद की ओर गया। इसके बावजूद पाकिस्तान ने इस दिशा में कोई सकारात्मक संकेत नहीं दिया। इसके उलट वहां के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ और विदेश मंत्री इशाक डार ने देश के पुराने रुख को ही दोहराया। इससे साफ हो गया कि इस्लामाबाद के लिए यह सिर्फ विदेश नीति का सामान्य फैसला नहीं है, बल्कि इसके पीछे घरेलू राजनीति, जनता की धार्मिक भावनाएं, कश्मीर का मुद्दा और क्षेत्रीय रणनीति जैसे कई गहरे स्तर जुड़े हुए हैं। पाकिस्तान का हमेशा से यह आधिकारिक रुख रहा है कि जब तक पूर्वी यरुशलम को राजधानी बनाकर एक संप्रभु और स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना नहीं हो जाती, तब तक वह इजरायल को मान्यता नहीं दे सकता। पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक सहायता और सैन्य सहयोग के लिए अमेरिका पर निर्भर रहा है, लेकिन साथ ही उसने खुद को मुस्लिम दुनिया की बुलंद आवाज के रूप में भी पेश किया है। यही कारण है कि इजरायल का सवाल आते ही वह अमेरिकी दबाव और घरेलू धार्मिक पहचान के बीच दो विपरीत दिशाओं में खिंचता नजर आता है। हालांकि समय-समय पर दोनों देशों के बीच गुप्त संपर्कों और बैक-चैनल वार्ताओं की खबरें भी उड़ती रही हैं, लेकिन मौजूदा भू-राजनीतिक हालातों को देखते हुए फिलहाल पाकिस्तान की इस नीति में किसी बड़े बदलाव की गुंजाइश नजर नहीं आती। वीरेंद्र/ईएमएस 31 मई 2026