सिंगापुर,(ईएमएस)। यहां आयोजित एशिया के सबसे बड़े रक्षा सम्मेलन शांग्री-ला डायलॉग में जापान और चीन के बीच जुबानी जंग एक बार फिर तेज हो गई है। सम्मेलन के दौरान जापान के रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइज़ुमी ने बिना नाम लिए चीन पर तीखा निशाना साधा। उन्होंने जापान पर लग रहे सैन्यीकरण के आरोपों पर हैरानी जताते हुए कहा कि यह बेहद अजीब है कि जिस देश के पास न तो परमाणु हथियार हैं और न ही रणनीतिक बॉम्बर विमान, उसे नया सैन्यवाद कहा जा रहा है। उनका इशारा साफ तौर पर चीन की तरफ था, जो पिछले कुछ वर्षों से अपनी सैन्य ताकत का तेजी से विस्तार कर रहा है। दरअसल, प्रधानमंत्री सना तकाइची के नेतृत्व में जापान अपनी पुरानी शांतिवादी नीति से हटकर रक्षा बजट बढ़ाने और नई सैन्य तकनीकों में निवेश करने पर जोर दे रहा है। चीन लगातार जापान की इस नई सक्रिय रक्षा नीति की आलोचना कर रहा है और उस पर क्षेत्रीय स्थिरता को खतरा पहुंचाने का आरोप लगा रहा है। जापानी रक्षा मंत्री ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि चीन खुद अपनी सैन्य क्षमताओं का विस्तार बिना किसी पारदर्शिता के कर रहा है, जो पूरे क्षेत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जापान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा, अनमैंड मिलिट्री सिस्टम और स्पेस सिक्योरिटी जैसे क्षेत्रों में पूरी पारदर्शिता के साथ अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करना जारी रखेगा। दोनों देशों के बीच बढ़ते कूटनीतिक तनाव का एक बड़ा कारण ताइवान का मुद्दा भी है। पिछले साल नवंबर में जापानी प्रधानमंत्री ताकाइची ने संकेत दिया था कि अगर चीन ताइवान पर सैन्य कार्रवाई की कोशिश करता है, तो जापान इसमें हस्तक्षेप पर विचार कर सकता है। इस बयान के बाद से ही दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट बनी हुई है। रक्षा मंत्री कोइज़ुमी ने सम्मेलन में दोहराया कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने हमेशा जापान को एक शांतिप्रिय राष्ट्र के रूप में सम्मान दिया है और कोई भी झूठा आरोप इस ऐतिहासिक सच्चाई को बदल नहीं सकता। इस बार के सम्मेलन में एक दिलचस्प बात यह भी रही कि चीन ने बेहद छोटा प्रतिनिधिमंडल भेजा और लगातार दूसरे वर्ष उसके रक्षा मंत्री डोन्ग जुन इस महत्वपूर्ण संवाद में शामिल नहीं हुए। चीनी रक्षा मंत्री की अनुपस्थिति पर जापानी रक्षा मंत्री ने निराशा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि वह चीनी रक्षा मंत्री से आमने-सामने मुलाकात कर बातचीत नहीं कर पाने से दुखी हैं। कुल मिलाकर, इस अंतरराष्ट्रीय मंच पर हुई इस बहस ने साफ कर दिया है कि आने वाले समय में पूर्वी एशिया में सैन्य संतुलन और सुरक्षा को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव और गहरा सकता है। वीरेंद्र/ईएमएस/31मई 2026