लेख
31-May-2026
...


तंत्र ( सिस्टम ) का राजनीतिक गठजोड़ या कतिपय कारण से तंत्र का प्रभावित होना न्याय व्यवस्था की विफलता का कारण बन गया है । सौभाग्यवश हम एक संवैधानिक लोकतंत्र में श्वांस ले रहे हैं । लोकतंत्र में सिस्टम (तंत्र) सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है । तंत्र से तात्पर्य है शासन के ऐसे विभिन्न विभाग जो प्रत्यक्षतः जनकल्याण से संबंधित हैं । सामान्य नागरिक के जीवन पर पुलिस,राजस्व,न्याय,स्वास्थ्य, शिक्षा आदि विभाग एवम् स्थानीय प्रशासन सीधा प्रभाव कारित करते हैं और इसका परिणाम स्पष्टतःसमाज में परिलक्षित भी होता है। भारत में कानून का शासन (रूल आफ लॉ) या न्याय का शासन (रूल आफ जस्टिस) है । वर्तमान के ज्वलंत प्रकरण प्रमाण हैं कि इन विभागों के द्वारा कहीं ना कहीं अपनी भूमिका निभाने में कोताही बरती जा रही है जिससे मानव जीवन संकटापन्न हो रहा है । इन विभागों में से प्रत्येक का रिस्पांस पीरियड (अनुक्रिया/प्रतिक्रिया काल) जीरो होना चाहिए तथा उनकी किसी भी त्रुटि के प्रति शासन के द्वारा जीरो टॉलरेंस (अक्षम्य नीति)अवश्यंभावी है। मैं मुक्त कंठ से अपने अनुभव के आधार पर यह कहना चाहूंगा कि सिस्टम को हल्के में मत लीजिए यह एक नारा नहीं अपितु प्रशासनिक संस्कार है। हम गुड गवर्नेंस की बात करते हैं वस्तुतः इन विभागों की जवाब देही सुशासन की रीड है । सिस्टम में सुधार आदेश से नहीं अपितु इरादे से होता है । सिस्टम बहाने नहीं रिजल्ट चाहता है। तंत्र को अब रिएक्टिव (प्रतिक्रियात्मक)नहीं अपितु प्रोएक्टिव (पूर्व क्रियात्मक) होना पड़ेगा। लापरवाही अब गलती नहीं अपराध मानी जानी चाहिए । संदेश स्पष्ट हो कि काम करो या हटो, जिम्मेदारी निभाओ या पद छोड़ो । प्रत्येक अधिकारी- कर्मचारी के लिए कुर्सी नहीं जिम्मेदारी बड़ी होना चाहिये। हम प्रायःकानून व्यवस्था पर भी चर्चा करते हैं । एक सभ्य समाज में व्यवस्था आवश्यक हैं और इसलिए यह कानून में परिलक्षित होती है । इसका मुख्य उद्देश्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना एवम् अराजकता को रोकना है ।भारत में कानून व्यवस्था बनाए रखना राज्य का विषय है संविधान की अनु.246 एवम् सातवीं अनुसूची की सूची 2 ( 2 ) के अनुसार इस हेतु राज्य पुलिस को अधिकार प्राप्त है। कानून का राज तभी होगा जब हमारा तंत्र कानून से ऊपर नहीं होगा । नीति तभी काम करती है जब नियत साफ हो व तंत्र संचालकों की मंशा,चाल-चलन एवं चरित्र पारदर्शी हो । सिस्टम जनता के लिए है,न कि जनता सिस्टम के लिए। कोई भी नागरिक कानून से बड़ा नहीं है,न ही कानून के नीचे l राजनीतिक लाभ हेतु रेवड़ी बांटना या देश के 80 करोड लोगों को मुफ्त राशन और पैसे देने से दैनिक कार्यों में प्रत्यक्ष कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इसी संदर्भ में देश की सबसे बड़ी अदालत ने शहरी क्षेत्र में बेघर व्यक्तियों के आश्रय के अधिकार से संबंधित एक जनहित याचिका में यह टिप्पणी की है कि लोगों को मुख्य धारा में सम्मिलित करने की अपेक्षा हम उन्हें परजीवियों का एक वर्ग तो नहीं बना रहे हैं ! निरंतर होते नीट पेपर लीक काण्ड एवम् अन्य प्रतियोगिता एवम् विद्यालयीन, महाविद्यालयीन परीक्षाओं में होती षड्यंत्रकारी धांधलियों ने विद्यार्थियों एवम् नवयुवकों के भविष्य को गर्त में डाल दिया है तथा शिक्षा विभाग को भी प्रश्नांकित कर दिया है। इंदौर का हनिट्रैप काण्ड हो अथवा भोपाल का ट्विशा शर्मा प्रकरण। पुलिस तंत्र ने प्राथमिक साक्ष्य संग्रह, साक्ष्य की श्रृंखला निर्धारित करने,इलेक्ट्रॉनिक एवम् डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने,प्रिजर्वेशन ऑफ़ क्राइम सीन के प्रति घोर लापरवाही की जाना आरोपित है। कमिश्नर ऑफ़ पुलिस,इंदौर द्वारा अपने अधिकार का उपयोग न करना या न कर पाना,उन्हें अपने अधिकार का ज्ञान ही ना होना या ज्ञान का न होना प्रदर्शित करना संस्थागत कार्य में किसी सशक्त बाहरी प्रभाव के होने का संदेह प्रकट करता है। तंत्र का इस प्रकार प्रभावित होना कई बार तंत्र की संलिप्तता भी इंगित करता है व अविश्वसनीयता का कारण बन रहा है व इस घाल-मेल से पीड़ित पक्ष न्याय से वंचित हो रहा है । अब चूंकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी उक्त प्रकरणों में की गई कार्यप्रणाली पर टिप्पणियां की जा रही है अतः इन विभागों को शासन का पूर्ण विधिक संरक्षण प्राप्त होना एवं यह सुनिश्चित होना कि उनके विधि सम्मत कार्यों में अवांछनीय हस्तक्षेप न हो, अपरिहार्य हो गया ही। विषयांकित युक्ति तभी सार्थक हो सकेगी। इस विसंगति पर क्या कहें कि इससे फर्क नहीं पड़ता कि किसी ने अपराध किया है या नहीं ! यदि वह अपराधी है व उसका अपराध प्रमाणित नहीं होता,तो उसने अपराध किया ही नहीं है। ऐसे उद्धरणों को हम मूक दर्शक की भाँति देखने को विवश हैं। सिस्टम को अब स्वतः सशक्त होना होगा अन्यथा उस पर से जनता का बचा कुचा विश्वास भी पूर्णतः समाप्त हो जायेगा और यह क्रम मत्स्य न्याय ( छोटी मछलीं,बड़ी मछली ) या माइट इस राइट के सिद्धांत को प्रोत्साहित करेगा । मै बोलता हूँ तो इल्ज़ाम है बगावत का । मै चुप रहूँ तो बड़ी बेबसी सी होती है । ईएमएस/31/05/2026